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शनिवार, 4 जून 2011

मो सम दीन न दीनहित तुम समान रघुवीर # 3 7 7

मो सम दीन न दीन हित तुम समान रघुबीर .
अस बिचारि रघुबंस मणि हरहु विषम भव भीर ..

कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम .
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ..


एहि कलि काल न साधन दूजा ! जोग न जग्य जप तप व्रत पूजा !!

रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि ! संतत सुनिअ राम गुण गायहि !!

रामचरित मानस के अंतिम छोर पर, उत्तर कांड के आखरी दो दोहों, १२९ तथा १३० (क , ख) में तुलसीदास जी ने एक शाश्वत सत्य उजागर किया है ! उन्होंने कहा कि "इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत, और पूजन आदि ईशोपासन का और कोई साधन कारगर नहीं होगा ! केवल श्रीराम (आपके अपने इष्ट) का नाम स्मरण करने और निरंतर उनका गुण गान करने और उनके गुण समूहों के सुनने से मानव को वही सुफल प्राप्त हो जाएगा जो योगियों को वर्षों की गहन तपश्चर्या के उपरांत मिलता है ! रे मूर्ख मन कुटिलता को त्याग कर तू श्री राम का भजन कर !"

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते ॥1॥

रे पगले मन सुन, पतितों को भी पवित्र करने वाले श्री राम को भजकर किसने परम गति नहीं पाई ? श्री राम ने गनिका, अजामील, गीध आदि अनेकों दुष्टों को तार दिया ! यवन, किरात, चंडाल आदि भी एक बार उनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं !

रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥
सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।
दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै ॥2॥

जो मनुष्य रघुवंश भूषन श्री रामजी का चरित्र कहते,सुनते और गाते हैं , वे कलियुग के पाप और अपने मन का मल धोकर बिना कोई श्रम किये "उनके" धाम चले जाते हैं अधिक क्या कहें यदि मनुष्य उनके चरित्र की पांच सात चौपाइयां ह्रदय में धारण कर लें तो उनके पांचो प्रकार की अविद्या तथा उनसे उत्पन्न विकारों को रामजी हर लेते हैं !

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदास हूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ ॥3॥

केवल श्री राम जी ही ऐसे हैं जो बिना किसी शर्त के अनाथों से प्रेम करते हैं ! "वह" परम सुंदर ,सुजान, और कृपानिधान हैं ! उनकी लेशमात्र कृपा से ही मंदबुद्धि तुलसीदास ने परम शांति पा ली ! श्री रामजी के समान कोई और प्रभु है ही नहीं !

इसलिए जैसे लोभी को धन सम्पदा प्राणों से भी प्रिय लगती है और वह सतत उसी का चिन्तन -मनन करता है वैसे ही प्रत्येक जीवधारी यदि सतत अपने परमसत्य-स्वरूप "इष्ट" का ध्यान करे, "उनका" निरंतर स्मरण और चिन्तन करते हुए समस्त जगत-व्यवहार करे, तो वह चाह कर भी पाप-कर्म नहीं कर पायेगा, वह केवल सत्कर्म ही करेगा ! तभी जीव की जय होगी, मानवता की विजय होगी, जग जीवन सार्थक होगा !
 

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निवेदक: व्ही . एन.  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा श्रीवास्तव
श्रीमती श्री देवी कुमार 
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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

"HIS GRACE"- --its identification & means to secure

"प्रभुकृपा" की पहचान और प्राप्ति के साधन. :

हम साधारणतः जीवन में अनुकूल परिस्थियों की प्राप्ति और प्रतिकूल परिस्थियों से मुक्ति को "प्रभु कृपा" का फल मानते हैं.. पर ये तो बहुत छोटी उपलब्धियां हैं जो जीवन में हमारे द्वारा किये उचित/अनुचित कार्यों के फलस्वरूप हमे प्राप्त होती हैं. इन छोटी सफलताओं अथवा असफलताओं को "प्रभु कृपा" कहना उचित नही है. ये तो मात्र "कर्म फल" हैं. प्रियजन, यथार्थ "प्रभु कृपा" इन भौतिक प्राप्तियों से बहुत उंची उपलब्धि है..


जब हमारा मन जड़तासे दूर जाने के लिए और चिन्मयता की प्राप्ति के लिए आकुल हो उठे एवं साधनमें लगने लगे और संत दर्शन तथा सत्संगों में सम्मिलित होने की लालसा मन में तीव्रता से जाग्रत हो जाये तब समझिये की हमे "प्रभुकी अहैतुकी कृपा" मिल रही है. यही है वास्तविक "प्रभुकृपा".


पर यह सब हो कैसे ? इसका एकमात्र साधन है- कुसंग का त्याग एवं सत्पुरुषों और संतों का "समागम" . जिसकी प्राप्ति के लिए भी हमारे लिए आवश्यक है "प्रभुकृपा "का सहारा. तुलसी ने कहा : . .

"गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन, :
बिनु हरि कृपा ना होइ सो गावही बेद पुराण" ,

अन्यत्र भी तुलसी ने इसी विषय में कहा है

"संत बिसुद्ध मिलहिं पर तेही . चितवहिं राम कृपा कर जेही " 


-------क्रमश: ----------

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

प्रभु की महती कृपा-प्रसाद - "सद्गुरु रूपिणी माँ"

The divine gift "Mother" - as "Sadguru"

"हरि अनंत हरि कथा अनंता"

प्रियजन, केवल हरि ही नही, हरि की अनन्य कृपा स्वरुप प्राप्त "माँ" भी अनन्य है, और उनकी महिमा अनंत है. जैसा मैंने अन्यत्र कहा है, "माँ", सत्य, प्रेम तथा करुणा की साकार मूर्ति हैं, "परहित" उनका धर्म है. एकमात्र "हिंदी" के अक्षर-ज्ञान वाली हमारी माँ ने केवल तुलसीदास की रामायण ही पढ़ी तथा उसमें दिए "धर्म" के लक्षणों को अपनी जीवन शैली में ज्यों का त्यों उतार लिया.

जब हम छोटे थे, हमारा सिर अपनी गोद में लेकर वह मानस की इन सारगर्भित पंक्तियों का गायन करती थी और उनका भावार्थ हमें बताती थीं. वह अपने साथ हम से भी उन चौपाइयों का सस्वर गायन करवाती थीं. हमसे "पाठ" सुनकर वह बहुत प्यार से भोजपुरी भाषा में कहतीं, "बबुआ, तोहार गला ता खूब मीठा बा, काल फेर सुनहीआ".

देखा आपने, भारत के सबसे पिछड़े प्रदेश की एक अशिक्षित महिला किस चतुराई से अपने नन्हे बालक को जीवनोपयोगी मानव धर्म के लक्षण सिखा रही है और साथ साथ उसको "गायन" के लिए प्रोत्साहित कर रही है. मानस की जो चौपाइयां उन्होंने बचपन में सिखायीं और जबरदस्ती बार बार गवा कर भली भांति याद करवा दीं _

धरम न दूसर सत्य समाना . आगम निगम पुरान बखाना ..
परम धरम श्रुति बिदित अहिंसा . पर निंदा सम अघ न गरीसा ..
पर हित सरिस धरम नहि भाई . पर पीड़ा सम नही अधमाई ..
अघ की पिसुनता सम कछु आना . धरम की दया सरिस हरि जाना ..

प्रभु कृपा से मिली मेरी "प्यारी माँ" ने इस प्रकार लोरी सुनाते, गाते बजाते, खेल खेल में, हमें मानव "धर्म" के आधार तत्वों सत्य, प्रेम, करुणा तथा सेवा से न केवल परिचित कराया वरन उनकी अमिट छाप हमारे मानस पर अंकित कर दी.

क्रमशः

रविवार, 25 अप्रैल 2010

The only way to pay HIM back - नाम जाप, भजन, कीर्तन

हमारा सौभाग्य है कि हम इस कलिकाल में धरती पर आये हैं. बात यह है की भारत भूमि पर हजारों वर्ष पूर्व प्रगटे युग-दृष्टा मनीषियों - ऋषि मुनियों ने उस काल में ही यह उद्घोषित कर दिया था कि सतयुग, त्रेता एवं द्वापर युग के जीवों के द्वारा मुक्ति प्राप्ति हेतु की जाने वाली कठिन चेष्टाओं - (तपश्चर्या -यज्ञ आदि) से, कलि युग के जीव मुक्त हैं. उन्हें मोक्ष प्राप्ति हेतु उतनी कठिन साधना नही करनी है. भारतीय पौराणिक धर्म ग्रन्थ "श्री मद् भागवत " में इसका उल्लेख है

आधुनिक काल के गोस्वामी तुलसीदास कृत "रामचरितमानस" मे "छहों शास्त्र सब ग्रंथन को रस" समाहित है. युगदृष्टा तुलसी ने इसमें अपने निजी अनुभवों के आधार पर हमे यह विश्वास दिलाया है कि कलि काल के जीवों को गाते बजाते केवल नाम जाप, सुमिरन और भजन , कीर्तन से मुक्ति मिल जायेगी.  उन्होंने कहा है:

"कलिजुग केवल नाम अधारा ,सिमिर सिमिर नर उतरहिं पारा .
चहु जुग चहु श्रुति नाम प्रभाउ ,कलि बिशेस नहीं आन उपाऊ .."

मानस में ही तुलसी ने अन्यत्र कहा है:

"एही कलि काल न साधन दूजा, जोग जग्य जप तप व्रत पूजा.
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि संतत सुनीअ राम गुन ग्रामहि.."

---------------राम भजे गति केहि नही पाई

इस प्रकार हम सौभाग्यशाली जीव, गाते बजाते , ब्लॉग लिखते लिखाते और इसी बहाने अपने इष्ट का स्मरण करते तथा ब्लॉग पढने वालों को उनके इष्ट का स्मरण कराते, स्वयं भी मुक्त हो जायेंगे और सहपाठियों को भी साथ ले जायेंगे..देखिये कितनी बड़ी कृपा की है हमारे प्यारे प्रभु ने हम- कलियुगी जीवों पर..

एक बात और है. प्रियजनों. मैं यह नही चाहता कि आप मेरे कहने पर अपने इष्ट के स्थान पर "मेरे राम'" को भजें. आप अपने इष्ट, जिन पर आपको श्रद्धा है कृपया उन्ही को याद करें, उन्ही का भजन कीर्तन करे, पर प्लीज़ जो भी करिये, पूरी श्रद्धा और पूरे विश्वास के साथ करिये .

फिर देखिये चमत्कार ----- सर्वत्र आनंद वर्षा, परम विश्राम की प्राप्ति

रविवार, 11 अप्रैल 2010

अपनी बातें पहले

गतांक से आगे:


मेरे पास प्रियजनों के अनुरोध आ रहे हैं कि दूसरों के दृष्टांत जानने से पहले मैं पहले अपने जीवन में घटी अथवा अपने पूर्वजों को प्राप्त हुई कृपा-उपलब्धियों का उल्लेख करूँ. जानता हूँ कि ऎसी अनुभूतियों को जग जाहिर करना उचित नही है. क्यों कि नाना प्रकार के आक्षेपों का कारण बन सकती हैं ये बातें .

लेकिन मुझे आज अपने इस मानव जीवन के अंतिम पड़ाव में , ८१ वर्षा की प्रौढ़ अवस्था में, अब भय से अधिक इसकी उत्सुकता है कि मैं ये सारी बातें अपने सभी प्रियजनो से शेअर करूँ- जिससे लाभान्वित हो मेरे सभी स्वजन उस करुना सागर -कृपानिधान के कृपा पात्र बन सकें.

यूँ तो संपूर्ण मानवता प्रभु की कृपा का अनुभव अपने जन्म से मृत्यु तक प्रति पल ही करती रहती है लेकिन बिरले ही यह स्वीकार करते हैं. प्रभु की पहली कृपा तो यह ही है की हमें नर तन मिला है, हमें कीड़े मकोड़ों ,पशुओं पंछियों अथवा वनस्पतियों की योनि नहीं प्राप्त हुई. कितनी कृपा है उनकी. कोटिश धन्यवाद प्रभु तेरा.

मानस में तुलसी ने कहा है :-

"कबहुक करि करुना नर देही देत ईश बिनु हेत सनेही,
बड़े भाग मानव तन पावा सुर दुर्लभ सब ग्रंथिहि गावा"


क्रमशः

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

महावीर बिनवौं हनुमाना

युगों युगों से असंख्य विश्वासी आस्तिकों को अपनी कृपा दृष्टि से अनुग्रहित कर उन्हें सभी दैहिक, दैविक भौतिक तापों से मुक्ति प्रदान करवाने वाले संकट मोचन, दुःख भंजन , "श्री हनुमान जी" को गोस्वामी तुलसीदास ने "राम चरित मानस " के बालकाण्ड के वन्दना प्रकरण में "महावीर" नाम से संबोधित किया हैI उन्होंने श्री हनुमान जी की वन्दना में कहा है की मैं उस महावीर हनुमान की वंदना करता हूँ जिस की यशगाथा का गायन स्वयं मर्यादा- पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र जी ने अनेकों बार किया है - "राम जासु जस आप बखाना "

सुंदर काण्ड के आरंभिक श्लोकों में तुलसी ने स्पष्ट शब्दों में हनुमान जी के , उन गुणों का उल्लेख किया है जिन के कारण वह एक साधारण कपि से इतने पूजनीय हो गये.

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजबनकृशानुम ग्यानिनामअग्रगण्यम
सकल गुण निधानं वानारानामधीशं
रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि

तुलसी ने कहा "अतुलित बल के धाम, स्वर्ण के समान कान्तियुक्त कायावाले , दैत्यों के संहारक (दैत्य वन के लिए दावानल के समान विध्वंसक ), ज्ञानियों में सर्वोपरि , सभी श्रेठ गुणों से युक्त समस्त वानर समुदाय के अधीक्षक और श्री रघुनाथ जी के अतिशय प्रिय भक्त महावीर हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ".

अन्यत्र भी उनके स्थूल रूप की व्याख्या करते हुए तुलसी ने कहा कि हनुमान जी देखने में कपि - एक अति चंचल पशु हैं, उछलते कूदते वृक्षों की एक शाखा से दूसरी शाखा पर सुगमता से जा सकते है . मानस के उत्तर -काण्ड में हनुमानजी ने स्वयं ही अपना परिचय देते हुए भरत जी से कहा है:

"मारुत सुत मै कपि हनुमाना
नाम मोर सुनु कृपा निधाना "

सराहनीय है “महावीर विक्रमबजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी”, कपि-तन-धारी हनुमान जी का यह विनय और उनकी यह नम्रता . उनके अनेक सद्गुणों में यह एक विशेष गुण है जिसने उन्हें देवतुल्य बना दिया. हनुमान जी के सभी गुण अनुकरणीय हैं . आज का मानव जिसका जीवन मूल्य कहीं कहीं पशुता के स्तर से भी बहुत नीचे गिर चुका है, अपना स्वरुप सुधारने के लिए हनुमान जी के इन सद्गुणों को यदि अपनी जीवन शैली में उतार सके तो मानवता का कल्याण हो जाए. .

रविवार, 4 अप्रैल 2010

हनुमान जी के अनुकरणीय सद्गुण

हनुमान जी "अहंकार" मुक्त हैं . कर्तापन का "अभिमान" उन्हें कभी हुआ ही नहीं . उन्हें जीवन में जो कुछ कार्य करने को मिले उन्होने सभी कार्य "राम काज" समझ कर किये ." कर्ता " वह केवल अपने स्वामी "श्री राम " को ही मानते थे और स्वयं को "राम काज करिबे को आतुर" एक आज्ञाकारी सेवक! अपने स्वामी की क्षमताओं में उन्हें पूरा भरोसा था .

रीछराज जामवंत के प्रेरणाप्रद प्रोत्साहन से की "हे बलवान हनुमान , तुम क्यों चुप साधे बैठे हो ? तुम्हारा बल-"पवन" के समान है ! "राम काजि लग तव अवतारा " सुनते ही वह पर्वताकार हो गए. अपने से जेष्ठ- वयस्क गुरु जनों की मंत्रणा "बिनहि बिचारि "स्वीकार कर लेना भी भारतीय संस्कृति की एक अनुकर्णीय परम्परा है.

और वह स्वयं अडिग "आत्मविश्वास" और "सकारात्मक सोच" के धनी थे. हनुमान ने सीताजी की खोज प्रारंभ करने से पहले भरपूर आत्मविश्वास से सिंहनाद किया "मै इस खारे सागर को खेल खेल में ही लांघ सकता हूँ, पर गुरुजन उचित सलाह दें की मैं क्या करूँ". विभिन्न परिस्थियों में उनके स्वभाव की शालीनता और सौम्यता सराहनीय है .

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में हनुमान जी को "बुद्धि विवेक विज्ञानं निधाना" की उपाधि दी है और "हनुमान चालीसा" के प्रारंभिक दोहे में "पवन कुमार "का सुमिरन करते हुए उनसे प्रार्थना की है : "बल बुधि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेश विकार " .

अवश्य ही श्री हनुमान जी के पास "बल,बुद्धि,विद्या, विवेक और विज्ञान" तथा "रिद्धि सिद्धि " का अनंत भण्डार हैं तभी तो युगों युगों से संतजन उनसे इन सद्गुणों की मांग करते जा रहे हैं और "वह" उनकी यह मांग अविलम्ब पूरी किये जा रहे हैं. प्रत्येक हनुमान भक्त को जीवन में कभी न कभी हनुमान जी की ऐसी अहेतुकी कृपा का अनुभव होता ही होता है. इसमें कोई संदेह नहीं .