सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

नाम महिमा

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नाम जाप त्रय ताप निवारे
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प्रेम भाव से सिमरिये परम मधुर शुभ "नाम"
तीन ताप त्रिदोष हर देवे शान्ति विश्राम
(भक्ति प्रकाश )

कठिन परिस्थिति में हमारे घनिष्ठ से घनिष्ठ साथी हमारा साथ छोड़ देते हैं ! हमें असहाय कर देते हैं ! ऐसे में , नीली छतरी वाले "कारण बिनु कृपालु - प्रभु" ,अक्सर हमारे पुकारने के पहले ही , दोनों बांह पसारे हमारी सहायतार्थ दौड़ पड़ते हैं और हमारी उंगली थाम कर हमारा मार्ग दर्शन कर देते हैं ! कभी कभी की छोड़िये वो "दीनदयालु" "कृपानिधान" एकेवाद्वितीय "परमेश्वर" ,वास्तव में सदैव ही इन तीनों कष्टप्रद भवतापों से हमारी रक्षा करते हैं !


प्रियजन ये महापुरुषों से सुने सुनाये सूत्र नहीं हैं !यह अनुभूत सत्य है ! इस सृष्टि में प्रत्येक प्राणी के जीवन में पल पल ऐसा हो रहां है , आपके और हमारे जीवन में भी , खेद तो इसका है कि अधिकतर प्राणी "उनकी" इस अहेतुकी कृपा का लाभ तो उठाते रहते हैं ,लेकिन अपने इस लाभ के लिए उस दाता - "परम" को , तनिक भी "मान" (क्रेडिट) नहीं देते !

अब तक के अपने ८२ वर्ष के जीवन में मैंने , निजी जीवन तथा अपने आसपास वालों के जीवन में "प्रभु" की ऐसी अहेतुकी कृपा के अनेकों दृष्टांत देखे सुने हैं ! अपनी आत्मकथा में मैंने अपने जीवन में घटीं ऐसी अनेक घटनाएँ बतायी हैं जिनमे हमे अपने प्यारे प्रभु के द्वारा हमारे ऊपर की हुई अनेकों अहेतुकी कृपा के प्रमाणों के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं !

अपने एकाध अनुभव यहाँ सुना देता हूँ! प्रियजन , अभी मुझे याद आ रही है अपने विद्यार्थी जीवन की एक घटना : १९४२-४३ में ,गांधी जी का असहयोग आंदोलन कहीं कहीं हिंसक हो रहा था ! उन्ही दिनों मैं एक रात कानपूर से आगरा जाने के लिए अन्य वरिष्ठ (सीनियर) विद्यार्थियों के साथ ट्रेन में खिड़की की सीट पर बैठा ! एक सीनियर ने मुझे जबरदस्ती वहाँ से हटा दिया और दो टॉयलेटो के बीच की सकरी गली में बक्सों का बेड बना कर उसपर सोने का फरमान जारी कर दिया ! मैं बक्सों पर दुबक कर बैठ गया ! तभी , प्लेटफार्म पर ,ठीक हमारे डिब्बे के सामने ही एक भयंकर बम् विस्फोट हुआ , अफरा तफरी मच गयी , बत्तियाँ गुल हो गयीं , घायलों की दर्द भरी चीखें और कराहने की आवाज़ ,तथा स्टेशन की एस्बसट्स की छत के टूट टूट कर गिरने की आवाज़ कान में पड़ती रहीं और मैं सांस रोके हुए , चुप चाप दोनों टोयलेट्स के बीच की गली में सुरक्षित बैठा रहा ! जब बत्तियाँ जली तब पता चला कि मेरी जगह जो व्यक्ति खिड़की पर बैठा था , वह बम बारी में बुरी तरह घायल हो गया और उसे रेलवे होस्पिटल ले जाया गया है ! किसने बचाया मुझे ? प्यारे प्रभु के उन अदृश्य हाथों के अतिरिक्त कौन हो सकता है इतना कृपालु ? अनेक और ऐसी घटनाएँ मेरे जीवन में हुईं जब "उन्होंने" मुझको भयकर आपदाओं की मार से बचा लिया ! इनका विस्तृतविवरण मैं अपनी आत्मकथा में अन्यत्र दे चूका हूँ ! अतः यहाँ नहीं दुहराऊंगा !

प्रियजन आपको भी तो , जीवन में इस प्रकार के अनेक अनुभव हुए होंगे ! इस बुज़ुर्ग शुभचिंतक की एक बात मानिए , थोड़ी देर को अपनी आँख मूंद कर अपने "इष्ट" का स्मरण कर लीजिए और अपने ऊपर की हुई "प्रभु" की कम से कम एक महती कृपा को याद करके "उन्हें" अपार श्रद्धा से हार्दिक धन्यवाद दीजिए !

कर्म करो त्यों जगत के धुन में धारे राम
हाथ पाँव से काम हो , मुख में मधुमय नाम

(भक्ति प्रकाश)

माता पिता एवं गुरुजनों के आदेशानुसार आस्तिकता का मार्ग अपना कर अपने जीवन में सात्विकता ,अनुशासन और प्रेम का संचार करें ! "राम नाम" के प्रति अटूट श्रद्धा मन में भर कर नाम का सिमरन कीजिए "उनकी" कृपा दृष्टि आपको निहाल कर देगी !

इधर कुछ दिनों से हाई ब्लड प्रेशर झेल रहा था , सिस्टोलिक १६० - १८० से नीचे नहीं आ रहा था ! सारी दवाइयां विधिवत चल रही थीं फिर भी 'बी पी' कंट्रोल में नही आ रहा था ! अपनी आखरी दवाई है "भजन" , आज वह दवा ली , अब कुछ ठीक महसूस कर रहा हूँ ! लीजिए आप भी सुन लीजिए वह भजन ----

राम राम काहे ना बोले , व्याकुल मन जब इत उत डोले



राम राम काहे ना बोले
राम राम काहे ना बोले , व्याकुल मन जब इत उत डोले
राम राम काहे ना बोले

लाख चौरासी भुगत के आया , बड़े भाग मानुष तन पाया ,
अवसर मिला अमोलक तुझको , जनम जनम के अघ अब धोले
राम राम काहे ना बोले , व्याकुल मन जब इत उत डोले
राम राम काहे ना बोले

नाम जाप से धीरज आवे , मन की चंचलता मिट जावे ,
परमानंद हृदय बस जाने , यदि तू एक नाम का होले ,
राम राम काहे ना बोले , व्याकुल मन जब इत उत डोले
राम राम काहे ना बोले

इधर उधर की बात छोड़ अब, राम नाम से प्रीति जोड़ अब ,
राम धाम में स्वागत करने श्री गुरुदेव खड़े , पट खोले ,
राम राम काहे ना बोले , व्याकुल मन जब इत उत डोले
राम राम काहे ना बोले

(शब्दकार स्वरकार और गायक
"भोला")
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निवेदक: व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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4 टिप्‍पणियां:

  1. लाख चौरासी भुगत के आया , बड़े भाग मानुष तन पाया ,
    अवसर मिला अमोलक तुझको , जनम जनम के अघ अब धोले
    राम राम काहे ना बोले , व्याकुल मन जब इत उत् डोले
    राम राम काहे ना बोले
    सही कह रहे है आप …………वो तो हर पल कृपा कर रहा है बस उसे समझना चाहिये मगर इंसान इस गहराई तक उतरता ही नही जब कुछ अच्छा हो जाये तो कहता है उसने अच्छा किया और जब गलत हो जाये तो कहेगा भगवान ने किया …………बस यही जीव की सोच का फ़र्क उसे आत्मानंद से दूर किये रहता है।

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  2. धन्यवाद वन्दना जी काश आपके समान सब यह समझ पाते कि ,"वह" (प्रभु) हर पल हम सब पर कृपा कर रहा है"! --"भोला कृष्णा"

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  3. पतली डी विलेज - मेरे भजन में व्यक्त सभी विचार पौराणिक सत्य हैं ! इनका प्रचार प्रसारण हो सके यही उद्देश्य है !- "भोला-कृष्ण"

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महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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