सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 21 नवंबर 2011

शरणागति

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परम धर्म है प्रेम


"धर्म" के विषय का मेरा ज्ञान उतने तक हीं सीमित है जितना जीवन के इन बयासी वर्षों में मैंने संत-महात्माओं के सत्संगों में पाया है ! यह मेरे पारिवारिक संस्कार , जन्म जन्मान्तर के संचित प्रारब्ध , गुरुजन से प्राप्त शिक्षा दीक्षा के कारण तथा परमात्मा की कृपा से हुआ !

हमारे सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महराज ने " प्रवचन पीयूष" मे कुछ ऐसा कहा है , "धर्म" अनुभव है ,जो वैज्ञानिकता के सम्मिश्रण और विश्लेषण प्रक्रिया से नहीं जाना जा सकता ! आत्मा प्रेम स्वरूप है ! "प्रेम" ही वास्तविक "धर्म" है !

परम प्रीति से राधना ,प्रभु परम आधार !
अपनी हिंसा टारना यही धर्म का सार!!

प्रीति लगाओ लगन से,परम पुरुष से नेह !
अपना आप सुदान कर कीजे परम सनेह!!

भक्ति भजन तव धर्म है कर्म योग है काम !
पथ तो तेरा प्रेम है परम भरोसा राम !!
(भक्ति -प्रकाश)
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संत रविदास ,कबीरदास ,नरसी भगत , तुकाराम , मीरा और चैतन्य महाप्रभु आदि अनेकों महात्मा इसी प्रेमपथ पर चल कर अपने प्रेमास्पद तक पहुंचे ! हरी नाम का प्याला पी पी कर वे खुद तो छके ही ,उन्होंने सबको वह आनंद रस पिलाया भी !
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Swami Sharnanandji

वृन्दाबन -मथुरा के "मानव सेवा संघ के संस्थापक प्रातः स्मरणीय प्रज्ञाचक्षु संत स्वामी शरणानंदजी महराज का यह दृढ़ मत था कि यह मानव जीवन प्रेम योनि है ! इस जीवन में ही मनुष्य को प्रेम की प्राप्ति होती है और किसी योनि में प्रेम की प्राप्ति नहीं होती !

स्वामी शरणानन्द जी के दर्शन तो मैं नहीं कर पाया लेकिन उनसे मेरा परिचय १९५६ में अपने विवाह के पश्चात हुआ ! मुझे याद है जब ससुराल के घर के मंदिर में स्वामी जी का चित्र दिखाकर मेरी धर्मपत्नी कृष्णा जी ने मुझे इन विलक्षण संत के विषय में बताया था ! उन्होंने बताया कि बचपन में जब वह सातवीं या आठवीं कक्षा में पढती थीं तब वह एकबार अपनी अम्मा के साथ ऋषिकेश गयीं और ,वहाँ वह "गीता भवन" में ठहरीं थीं जहां उन दिनों स्वामी शरणानंद भी ठहरे हुए थे ! हर शाम को गंगा आरती के पहले स्वामी जी वहाँ समीपवर्ती गंगातट पर सत्संग करते थे ! तेजस्वी मुखमंडल वाले उन नेत्रहीन संत का प्रथम दर्शन कृष्णा जी को वहीं हुआ !

उस सत्संग में कृष्णाजी ने देखा कि श्रद्धालु भक्तजन स्वामीजी के मुख से निकले प्रत्येक वचन को सुनते ही अपनी डायरी में अंकित कर लेते थे ! साधक गण प्रश्न पूछते थे और महाराज जी जटिल से जटिल अध्यात्मिक प्रश्न का हास्य परिहास्य के साथ सरलतम उत्तर दे देते थे ! स्वामी जी के उत्तर सरल के साथ साथ सरस भी थे ! कृष्णा जी को भी उस प्रश्नोत्तर में आनन्द आने लगा और वह भी डायरी लेकर स्वामी जी के द्वारा दिए धर्म विषयक प्रश्नोत्तरों को नोट करने लगीं ! स्वामी जी के एकाध उत्तर तो उन्हें तभी कंठस्थ हो गए थे और उस दिन भी उन्हें याद था ! कृष्णा जी ने उनमे से कुछ बताया भी !

परमात्मा को जानने की अपेक्षा उसे मानो !
उसे सर्वशक्तिमान मान कर जीवन को ऐसे जियो कि भगवान से प्रेम हो जाये ! इस एक साधना में सब कुछ आ जाएगा

किसी साधक के इस प्रश्न पर कि "प्यारे प्रभु हमे कहाँ मिलेंगे ? ,स्वामी जी का उत्तर था "सबसे प्रेम करो ;सबको सुखी रखो ;सबकी सेवा करो ;उन्हीं में तुम्हे प्रभु मिल जायेंगे!

स्वामी जी ने अपने प्रवचनों में "प्यारे प्रभु" का परिचय देते हुए साधकों को बताया कि :
"प्रेमियों में प्रेम वे ही हैं, ज्ञानियों में ज्ञान वे ही हैं, योगियों में योग वे ही हैं । सब कुछ वे ही हैं,और कुछ है नहीं । कोई और है नहीं, हो सकता नहीं, कभी होगा नहीं । वे ही वे हैं, वे ही वे हैं । उनका प्यारा प्रेमी साधक कह्ता है कि "तुम ही तुम हो, सब कुछ तू है, सब कुछ तेरा है, न मैं हूँ, न मेरा है; केवल तू है और तेरा है" । यह प्रेमियों का सहज स्वभाव है ।यह स्वभाव भी प्रेमियों को उन्हीं का दिया हुआ है!
अपने प्रेमास्पद (प्यारे प्रभु) सदैव अपने में ही हैं यदि उनमे हमारी अविचल आस्था है ! प्रेमास्पद के अस्तित्व तथा महत्व को स्वीकार कर उनसे आत्मीय सम्बन्ध बनाना अत्यन्त आवश्यक है । आत्मीय सम्बन्ध से ही साधक में प्यारे प्रभु के प्रति अखण्ड स्मृति तथा अगाध प्रियता की अभिव्यक्ति होती है ।

प्यारे प्रभु से ऐसा अटूट सम्बन्ध बनाने के लिए प्रियजनों

जोड़े रहो तुम तार प्यार का प्रभू के साथ
फिर देखो कैसे प्यार से वह थामता है हाथ
(भोला)
क्रमशः
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निवेदन : श्रीमती कृष्णा श्रीवास्तव एवं व्ही. एन. श्रीवास्तव
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और सटीक कहा स्वामी जी ने…………प्रेम वालो ने कब वक्त पूछा , उनकी पूजा मे सुन ले रे उधो , यहाँ यहाँ दम दम मे होती है पूजा , सिर झुकाने की फ़ुरसत नही है, ये तो प्रेम की बात है उधो , बन्दगी तेरे बसकि नही है।

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  2. काकाजी - काकी जी प्रणाम ! समयाभाव से ब्लॉग पर नहीं आ पा रहा हूँ - कम ही ऐसा है ! आज की प्रस्तुति और प्रभु की खोज बहुत ही सहज ढंग से आप ने की है ! इसे प्रतेक जन को अपने जीवन में अनुसरण करनी ही चाहिए ! बाकि प्रभु --की हाथ ..सबके साथ !

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  3. जोड़े रहो तुम तार प्यार का प्रभू के साथ
    फिर देखो कैसे प्यार से वह थामता है हाथ

    बहुत सही लिखा है आपने ....आभार

    उत्तर देंहटाएं

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