सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

रविवार, 29 जनवरी 2012

"बच्चन जी" का गीत [२] : गायक - "भोला"

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क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?
[बच्चन]

आपको बता चुका  हूँ कि कैसे ,आज से तीन  वर्ष पूर्व हमारे "प्यारे प्रभु" ने भारत के एक   सुप्रसिद्ध होस्पिटल के 'क्रिटिकल वार्ड' में ' निर्जीव से पड़े आपके इस स्नेही स्वजन को लाइफ सपोर्ट' के सहारे,'परमधाम' के प्रमुख द्वार से 'बैरंग' लौटा दिया और साथ में तभी यह फरमान भी जारी कर दिया कि " वत्स ,जीवन के शेष दिवसों का सदोपयोग करो ! अपनी आत्म कथा लिख डालो "! सो, लगभग दो ढाई वर्ष से आत्म कथा लिख रहा हूँ !

स्वजनों , १६ जुलाई १९२९ को मेरे जन्मोपरांत ,ग्राम- 'डोकटी बाजिदपुर' ,जिला- 'बलिया' [यू पी] ,के तथाकथित प्रकांड विद्वान ज्योतिषी पंडित रमेसर पांडे द्वारा बनाई गई मेरी जन्मकुंडली में "चन्द्र" गृह - "तुला" राशि में स्थित दिखाया गया और तदनुसार  उस राशि के आधार पर मेरा राशिनाम - "तुलसी" लिखा गया !

प्रियजन ,मेरे उपरोक्त कथन से ,ये न सोच बैठना कि आपका यह स्नेही सखा - 'भोला'', किसी भांति , मानसकार रामभक्त तुलसीदास जी से  बराबरी करने का अहंकारिक प्रयास कर रहा है ! ऐसा कुछ नहीं है भैया !

आपको याद ही होगा कि मैंने निज "अहंकार" का "केचुल", १९७४ में ही उतार कर , श्रीश्री माँ आनंदमयी के आदेशानुसार सदा सदा के लिए उनके श्री चरणों पर अर्पित कर दिया था   [ इस ब्लॉग के ऊपरी "डेश बोर्ड" पर अंकित श्री श्री 'माँ' विषयक मेरे संदेशों के लिंक पर जाकर ,"माँ कृपा" की पूरी कथा पढ़ें ]

श्रीहरि कृपा और आप महात्माओं के सत्संग ने मुझे मेरी " खद्योती" औकात भुलाने का अवसर ही नहीं दिया ! जब भी 'अहंकार' ने मेरे मन में अपना "फन" उठाया , दैवी चरणों ने उसे तुरंत ही कुचल दिया !  इसी बात से "तुलसी" का वह कथन याद आया :

कवि न होऊं नहिं चतुर कहाऊँ , 'मति' अनुरूप राम गुन गाऊँ 

"तुलसी" के ही शब्दों में "मति"गति ,रति और शक्ति सभी का आधार हैं "राम"  !:

'मति' रामहिं सो, गति रामहिं सों ,रति राम सों ,रामहि को बलु है 
    सबकी न  कहे ,तुलसी के मते , इतनो  जग जीवन  को  फलु है !!


 मेरी मान्यता और मानसिक धारणाएं भी श्री हरि कृपा से कुछ ऐसी ही है  
जैसा मैंने अपनी आत्म कथा में अन्यत्र  व्यक्त भी किया है  ;

करता हूँ केवल उतना ही , जितना "मालिक" करवाता है,
लिखता हूँ केवल वो बातें, जो "वह"  मुझसे लिखवाता है,
मेरी करनी  मत कहो इसे , सब "उसकी"  कारस्तानी है !!


प्रियजन मैंने जैसा कहा , स्वयं मैं कुछ करता नहीं ! अब आप ही कहो "उसके" अतिरिक्त और कौन है जो हमारे इस जर्जर घिसे पिटे शरीर में बैठा हुआ , हमसे इस उम्र में, ऐसे ऐसे कार्य करवा रहा है जो इस काया ने आज से पूर्व कभी किये ही नहीं थे ! ६० वर्ष की अवस्था तक सरकारी मुलाजिमत से रिटायर होने के दिन तक , अपने पी.एस. ,पी.ए. और स्टेनोग्राफर्स से पत्राचार करवाने वाला यह बूढा "भोला" आज ८२ का होकर , अपनी दुखती उँगलियों और झुकी कमर पर "मूव" रगड रगड कर "तोशिबा" के नये वाले लैप टॉप पर झुका बैठा स्वयं अपनी लम्बी चौडी आत्म कथा टंकित कर रहा है !

इधर पिछले दो सप्ताह से टंकन थोड़ा अवरोधित है तो आज उसकी जगह "केसियो" सिंथेसाईंजर के "की बोर्ड" पर उंगलियां थिरक रही हैं ! रात रात भर खांस खांस कर पड़ोसियों की नींद खराब करने वाला बूढा "भोला", जिसके मुख से रोगों के कारण कभी कभी बोल भी नहीं फूटते , आज अचानक पुनः मुखरित हो रहा है , गाने बजाने लगा है ! उसकी स्मरण शक्ति भी पुनर्जीवित हो गयी है ! पूरानी पुरानी बातें याद आने लगी हैं उसे और ५०-६० वर्ष पूर्व के स्वरचित गीत , तथा अन्य कवियों के गीतों की बनाई हुईं धुनें एक एक करके उसके मष्तिष्क पटल पर उभर रही हैं , न जाने कब कब की ,क्या क्या बातें याद आ रही है !
एक और आश्चर्य की बात है - पिछले ४० - ५० वर्षों से , केवल भजन रचने , धुन बनाने ,   स्वयं गाने तथा अधिक से लोगों को सिखाकर उन के साथ देवमन्दिरों में झूम झूम कर गाने से अपनी ईशोपासना सम्पन्न करने वाला ,यह बूढा 'रामनामी' तोता- "भोला" इधर १०-१५ दिनों से  ,"बच्चन जी" के वे प्रेम गीत ,जिन्हें उसने पिछली अर्धशताब्दी में एक बार भी गुनगुनाया तक नहीं , इनदिनों अचानक ही गाना शुरू कर दिया है !  क्यूँ ?

मेरी ओर से इस प्रश्न का उत्तर एक ही है और वो है - "उनकी इच्छा" और "उनसे मिली प्रेरणा "के कारण ! अपने सभी कार्यकलाप  केवल "उनकी"  प्रेरणा तथा निर्देशन से ,यंत्रवत करने वाला "मैं" किसी कीमत पर ''उनके" आदेश के बिना "बच्चन जी" की याद नहीं कर सकता था !अब  प्रश्न यह है कि "उन्होंने" क्यूँ ऐसा आदेश पारित किया ?  वास्त्विकता तो भैया "वह" ही जानें !

पर मुझे आज जो पता चला उसे जान कर आप भी चकित हो जायेंगे ! गाना रिकोर्ड करने और उनके शब्द अपने सन्देश में डालने से पहले मैंने उचित समझा कि "गूगुल खोज" से उसकी शब्दावली कन्फर्म करलूँ ! यही कर रहा था कि अनायास ही खोज में "बच्चन जी" का बायोडेटा सामने आ गया !

नाम : हरिवंश राय बच्चन : जन्म -  २७ नवम्बर , निधन - १७ जनवरी   

आप कहेंगे कि इसमें क्या चमत्कार है ? तो सुनिए कि ,उपरोक्त दोनों तारीखें हमारे लिए अति महत्वपूर्ण हैं ! " २७ नवम्बर " को हम दोनों का विवाह हुआ था ,और २७ नवम्बर को ही मेरे प्यारे प्रभु ने मुझे हस्पताल में मुझे यह आत्मकथा लिखने का आदेश दिया था ! और सुने एक और चमत्कारिक सत्य :

१७ जनवरी को "बच्चनजी" का निधन हुआ और इस वर्ष १७ जनवरी को ही मैंने -५० -६० वर्षों से भुलाया हुआ "बच्चनजी" का वह गीत गुनगुनाया ,गाया, रिकोर्ड किया और अपने ब्लॉग में प्रेषित किया !

अभी भी बच्चन जी के गीतों का नशा बरकरार है ! फलतः अपनी कथा पर पूर्ण विराम लग गया है ! जो भी हो रहा है , "उनके" आदेश से हो रहा है अस्तु कोई गम नही ,"नो प्रॉब्लम"

चमत्कार कहें या "जस्ट ए  कौय्नसीडेंस",जो भी नाम दें इसे , आपकी मरजी ! मुझसे तो जो कुछ "उन्होंने" लिखवाया मैंने लिख दिया !

आत्मकथा की श्रंखला में कितनी ही आनंदमय अनुभूतियों जुडी ,तो कितने अवसादों के क्षण भी आये - गए ! आज जो "बच्चनजी" का गीत गाने जा रहा हूँ ,उसे  भी १९५४-५५  में छोटी बहन माधुरी के रेडियो प्रोग्राम के लिए स्वरबद्ध किया था ! कृष्णाजी कहती हैं कि माधुरी ने उसे इसी धुन में गाया  था और उसकी बहुत प्रसंशा भी हुई थी ! आज मैं  इस अवस्था में अपनी ही उस पुरातन धुन के साथ कितना न्याय कर पाउँगा ? मुझसे अधिक "वह परम" जाने जो प्रेरणा देकर मुझे गवा रहा है  ! आप भी सुनिए :


क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ? 
अगणित उन्मादों के क्षण हैं ,अगणित अवसादों के क्षण हैं 
जीवन की सूनी घडियों को किन किन से आबाद करूं मैं ?
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं    

   



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क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?

अगणित उन्मादों के क्षण हैं ,अगणित अवसादों के क्षण हैं ,
जीवन की सूनी घडियों को किन किन से आबाद करूं मैं ?
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?  

याद सुखों के आंसूँ लाती , दुःख की दिल भारी कर जाती ,
दोष किसे दूँ जब अपने से अपने दिन बर्बाद करूं मैं
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?  

दोनों कर के पछताता हूँ , सोच नहीं पर मैं पाता हूँ ,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आज़ाद करूं मैं ,
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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