सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 28 नवंबर 2012

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दीक्षा  

गतांक से आगे

संत महात्माओं की जीवनी  हमे उनके द्वारा अनुभूत प्रेरणादायक दिव्य तथ्यों का बोध  कराती हैं ! सिद्ध-सार्थक-गुरूजन  किस  प्रकार  अपने शिष्यों को दीक्षा प्रदान करते हैं इस का ज्ञान हमे इन जीवानीयों के पठन से प्राप्त होता है !

हमने संतों की बहुत सी जीवनियाँ तो नहीं पढीं लेकिन जो दो चार  पढीं उनसे यह जाना कि सच्चे जिज्ञासु शिष्यों के लिए " प्रभु / हरि / परमेश्वर , द्वारा  नियुक्त विशेष गुरुजन , अपने अपने शिष्यों को कभी स्वप्न में तो कभी साक्षात उनके समक्ष उपस्थित हो कर उन्हें मंत्र दीक्षित करते हैं ! अपने अपने गुरु से प्राप्त सदोपदेश के सहारे ये शिष्य आध्यात्म के क्षेत्र में अग्रसर होते हैं , उनकी "वृत्ति" , "परमतत्व" से जुड़ जाती है , उनके हृदय में सुमधुर आस्तिक भाव का संचार होता है और उनके द्वारा "ईश प्रेम भाव"  के प्रसारण से जगत का कल्याण होता है !

प्रियजन , जो जीवनियां हमने पढीं उनमे से "दीक्षा" सम्बन्धी जो बातें हमें अभिनंदनीय और प्रेरणा प्रदायक लगीं ,उनमें से कुछ का उल्लेख  हम इस ब्लॉग में कर रहे हैं !

महापुरुषों के दीक्षा सम्बन्धी अनुभव 

संत कबीर दास जी की दीक्षा 

इतिहास साक्षी है - काशी के घाट पर ब्रह्म मुहूर्त में ,गंगा स्नान कर के लौटते  सिद्ध संत रामानंदजी के गीले चरणों की ठोकर खाकर तथा उनके मुख से , स्वभावतः ही निकले सुमधुर "राम राम" शब्द  को सुन कर ,उस "राम नाम" को ही अपना "गुरु -मंत्र" मान बैठा एक साधारण अनपढ़ जुलाहा ,चरण प्रहार से प्राप्त राम नाम मंत्र के सतत जाप से  कालान्तर में संत "कबीरसाहब" बन गया !

हमारे गुरुदेव स्वामी सत्यानन्द जी ने कबीर साहब के सद्गुरु संत श्री  रामानंद जी की दीक्षा पद्धति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि " रामानंद जी  वाणी , स्पर्श एवं चिंतन तीनों विधियों द्वारा गुरु मंत्र दिया करते थे और फिर अपने शिष्य के कल्याण का सब भार उठा लेते थे ,वे उनके जहाज़ बन कर उन्हें 'बिनुश्रम' भवसागर पार करवा देते थे !

नाम जगाता "कथन" से "छूकर" आशीष साथ, 
शक्ति जगाता  जनों में "चिंतन" कर जग नाथ

गुरु था भक्त कबीर का वही संत मुनिराज   
गंगातट पर  नाम दे , उसका बना जहाज

[ भक्ति प्रकाश से ]

गुरु की ठोकर से प्राप्त "राममंत्र" से उस साधारण जुलाहे को इतना विलक्षण ज्ञान प्राप्त हुआ कि उन्होंने गूढ़ और अगम्य आध्यात्मिक विषयों की व्याख्या संजोये अनेकों रचनाएँ कर डालीं ! उनकी "साखियों" में मानव धर्म के अत्यंत रहस्यमय गूढतत्वों का समावेश है जिनसे आज तक विश्व के असंख्य कबीर पंथियों को मार्ग दर्शन मिल रहा है !

समर्थ गुरु बाबा रामदासजी  की दीक्षा 

ज्ञानी संन्यासी समर्थ रामदास जी को स्वप्न में मिला '"श्री राम जय राम जयजय राम " का गुरु मंत्र , जिसके सतत जाप से उन्हें आत्म -ज्ञान हुआ और अन्ततोगत्वा उन्हें ईश्वर की प्राप्ति हुई , साक्षात प्रभु के दर्शन हुए !

कहते हैं कि रामदास जी को स्वप्न में दर्शन देकर गुरुमंत्र देने वाले उनके गुरु वही रामानंद जी थे जिन्होंने जुलाहे कबीर को कबीर साहब बनाया था !

इन समर्थ गुरु रामदास जी के प्रिय  शिष्य क्षत्रपति शिवाजी को कौन नहीं जानता  ?

क्षत्रपति शिवाजी की दीक्षा 

हमारे सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी ने क्षत्रपति शिवाजी की दीक्षा पर प्रकाश डालते हुए  कहा कि रामदास जी ने अपने  प्यारे शिष्य शिवा को राम मंत्र ही दिया !

ऎसी सुशिक्षा दी सुखकारी ,रामदास ने बहुत बिचारी 
प्यारे राम नाम धुन लाओ कर्म योग से सब सुख पाओ

[ 'गुरुमंत्र' के सतत जाप तथा निष्काम सेवा एवं सूझबूझ युक्त कठिन श्रम से 'शिवा' कालान्तर में क्षत्रपति शिवाजी बना और उसने देश द्रोहियों को नाकों चने चबवा दिए]

जिसने अपने तेज से जन बल लिए महान 
सुदेश जाति की रक्षा की करके नीति विधान

सांस मिला हरिजनों को मिली म्लेच्छ से त्राण
शान्ति -धर्म स्थापित हुए ,निर्भय जान अजान
[भक्ति प्रकाश से ]
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संत तुकाराम की दीक्षा 


संत तुकाराम जी को  स्वप्न में सद्गुरु मिले और स्वप्न में ही उन्होंने तुकाराम जी को गुरु मंत्र दिया -"जय जय  राम कृष्ण हरि"! तुकाराम जी द्वारा उद्घोषित  इस अतिशय मंगलकारी मंत्र नें कितने जीवों को उबारा,  कितने साधकों को भक्ति -रस का आस्वादन कराया ,उसका अनुमान लगाना असंभव है ! हमारे सद्गुरु स्वामी जी का कथन है

तुकाराम ने स्वप्न में संत शिरोमणि देख
सीखी उससे साधना ऐसा मिलता लेख

गूंजा उसके कांन  में राम नाम शुभ आप ,
आत्मा उसका हो सजग करने लगा सुजाप 
                            (भक्ति -प्रकाश से )
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ठाकुर रामकृष्णदेव परमहंस जी की दीक्षा 

ठाकुर की जीवनी असाधारण है ! सांसारिक दृष्टि से श्री  रामकृष्णदेव जी निगुरे थे ! उनके कोई एक औपचारिक सद्गुरु थे ही नहीं ! ब्राह्मण कुल में जन्मे 'गदाधर' निरक्षर थे और देखने में बिलकुल गंवार लगते थे लेकिन वह अनंत दिव्य शक्तियों से युक्त थे !

वे जगन्मात जगदम्बे "माँ काली" को ही अपना  एकमात्र "गुरु" मानते थे ! माँ काली ही उनकी जीवनी शक्ति, उनकी सदगुरु ,उनकी  मार्ग दर्शक  थीं !  ! दक्षिणेश्वर की "माँ काली" से अक्सर वह रो रो कर प्रार्थना करते थे :-

"माँ आप के अतिरिक्त इस संसार में मेरा अन्य कोई मार्गदर्शक नहीं है !, एक आप ही मेरी गुरु हैं ! मुझे आपके अतिरिक्त किसी और से कुछ भी नहीं सीखना ! ,मैं केवल वही सीखूंगा जो आप  मुझे सिखाएंगी ! माँ मैं केवल वही करूँगा जो आप मुझसे करवाएंगी ! "माँ  आपही मेरी सर्वस्व हैं , आप का द्वार छोड़ कर मैं अन्यत्र कहीं नही जाउंगा !"

प्रियजन ,इन माँ बेटे की प्रीति इकतरफा नहीं थी ! माँ भी बेटे को उतना ही चाहती थी जितना बेटा मा को ! ठाकुर अपने सारे कर्म  ही माँ की प्रेरणा और उनके आदेशानुसार करते थे लेकिन माँ की एक सिखावन; जिस का पालन ठाकुर ने आजीवन किया ;वह था  " कनक ,कामिनी और कीर्ति ,इन तीनों से सर्वथा बचो" ,  और यह तो जगजाहिर है कि ठाकुर ने आजीवन माँ के इस आदेश का कितनी तत्परता से पालन किया !

माँ के आदेश से ठाकुर ने सिद्ध महापुरुष तोतापुरी महाराज से अद्वैत वेदांत की शिक्षा पायी  तथा  विश्व के अन्यान्य सभी प्रमुख धर्मों का, उनकी विशिष्ट  प्रणालियों के द्वारा विधिवत अनुष्ठान किया और आप को आश्चर्य होगा यह जान कर कि केवल तीन तीन दिन की साधना से उन्होंने उन सभी धर्मों में भी सिद्धि प्राप्त कर ली !

आप सब जानते ही हैं कि परमहंस श्री रामकृष्णदेव के विश्वविख्यात मनस्वी शिष्य स्वामी विवेकानंद  ने भारतीय वेदांत और संस्कृति के उदात्त स्वरुप को विश्व के सभी विकसित पाश्चात्य देशों में प्रतिष्ठित किया !

अगले अंक में हम उन्ही स्वामी विवेकानंद जी की दीक्षा के विषय में , "ऊपर वाले"  से हाल में मिली प्रेरणाओं के आधार पर ,अपने विचार लिखेंगे ! प्रियजन ,बस आपको थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी और साथ साथ हनुमान जी से यह प्रार्थना भी कि ,           

हे बजरंगबली ,
"बल बुधि विद्या देहु "भोला" के हरहु कलेश बिकार" 

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प्रियजन , आप जानते ही हैं 

नहीं चलती हमारी कलम तो हरगिज़ नहीं चलती 
मगर जब चल पडे तब रोकना इसको बहुत मुश्किल 

"उन्होंने" खेंप भेजी प्रेरणा की भर के कंटेनर 
कहाँ रक्खे इसे "भोला",जगह की है बहुत मुश्किल 
[ भोला ]
             
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निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग :- श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. भोला जी आपकी हर प्रस्तुति हमें आध्यात्म के नए रंगों में सराबोर कर deti है .थोडा विलम्ब तो हो जाता है इनके अवलोकन में लेकिन हम जानते हैं की हमारी इस ध्रिष्ट्ता को आप क्षमा कर देते होंगे.आभार

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  2. बेटा जी , इतनी व्यस्तता में भी समय निकाल कर आपने हमारा लेख पढ़ा ,आपको बहुत बहुत धन्यवाद ! क्षमा तो हमे आप सब ब्लोगर बंधुओं से मांगनी चाहिए ,क्यूंकि बहुत चाह कर भी हम ,आँखों की कमजोरी के कारण आप सब के सारे आलेख पढ़ नहीं पाते ! पुनः आभार व्यक्त करते हुए , शुभाकांक्षी - "भोला - कृष्णा"

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