सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 28 नवंबर 2012

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दीक्षा  

गतांक से आगे

संत महात्माओं की जीवनी  हमे उनके द्वारा अनुभूत प्रेरणादायक दिव्य तथ्यों का बोध  कराती हैं ! सिद्ध-सार्थक-गुरूजन  किस  प्रकार  अपने शिष्यों को दीक्षा प्रदान करते हैं इस का ज्ञान हमे इन जीवानीयों के पठन से प्राप्त होता है !

हमने संतों की बहुत सी जीवनियाँ तो नहीं पढीं लेकिन जो दो चार  पढीं उनसे यह जाना कि सच्चे जिज्ञासु शिष्यों के लिए " प्रभु / हरि / परमेश्वर , द्वारा  नियुक्त विशेष गुरुजन , अपने अपने शिष्यों को कभी स्वप्न में तो कभी साक्षात उनके समक्ष उपस्थित हो कर उन्हें मंत्र दीक्षित करते हैं ! अपने अपने गुरु से प्राप्त सदोपदेश के सहारे ये शिष्य आध्यात्म के क्षेत्र में अग्रसर होते हैं , उनकी "वृत्ति" , "परमतत्व" से जुड़ जाती है , उनके हृदय में सुमधुर आस्तिक भाव का संचार होता है और उनके द्वारा "ईश प्रेम भाव"  के प्रसारण से जगत का कल्याण होता है !

प्रियजन , जो जीवनियां हमने पढीं उनमे से "दीक्षा" सम्बन्धी जो बातें हमें अभिनंदनीय और प्रेरणा प्रदायक लगीं ,उनमें से कुछ का उल्लेख  हम इस ब्लॉग में कर रहे हैं !

महापुरुषों के दीक्षा सम्बन्धी अनुभव 

संत कबीर दास जी की दीक्षा 

इतिहास साक्षी है - काशी के घाट पर ब्रह्म मुहूर्त में ,गंगा स्नान कर के लौटते  सिद्ध संत रामानंदजी के गीले चरणों की ठोकर खाकर तथा उनके मुख से , स्वभावतः ही निकले सुमधुर "राम राम" शब्द  को सुन कर ,उस "राम नाम" को ही अपना "गुरु -मंत्र" मान बैठा एक साधारण अनपढ़ जुलाहा ,चरण प्रहार से प्राप्त राम नाम मंत्र के सतत जाप से  कालान्तर में संत "कबीरसाहब" बन गया !

हमारे गुरुदेव स्वामी सत्यानन्द जी ने कबीर साहब के सद्गुरु संत श्री  रामानंद जी की दीक्षा पद्धति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि " रामानंद जी  वाणी , स्पर्श एवं चिंतन तीनों विधियों द्वारा गुरु मंत्र दिया करते थे और फिर अपने शिष्य के कल्याण का सब भार उठा लेते थे ,वे उनके जहाज़ बन कर उन्हें 'बिनुश्रम' भवसागर पार करवा देते थे !

नाम जगाता "कथन" से "छूकर" आशीष साथ, 
शक्ति जगाता  जनों में "चिंतन" कर जग नाथ

गुरु था भक्त कबीर का वही संत मुनिराज   
गंगातट पर  नाम दे , उसका बना जहाज

[ भक्ति प्रकाश से ]

गुरु की ठोकर से प्राप्त "राममंत्र" से उस साधारण जुलाहे को इतना विलक्षण ज्ञान प्राप्त हुआ कि उन्होंने गूढ़ और अगम्य आध्यात्मिक विषयों की व्याख्या संजोये अनेकों रचनाएँ कर डालीं ! उनकी "साखियों" में मानव धर्म के अत्यंत रहस्यमय गूढतत्वों का समावेश है जिनसे आज तक विश्व के असंख्य कबीर पंथियों को मार्ग दर्शन मिल रहा है !

समर्थ गुरु बाबा रामदासजी  की दीक्षा 

ज्ञानी संन्यासी समर्थ रामदास जी को स्वप्न में मिला '"श्री राम जय राम जयजय राम " का गुरु मंत्र , जिसके सतत जाप से उन्हें आत्म -ज्ञान हुआ और अन्ततोगत्वा उन्हें ईश्वर की प्राप्ति हुई , साक्षात प्रभु के दर्शन हुए !

कहते हैं कि रामदास जी को स्वप्न में दर्शन देकर गुरुमंत्र देने वाले उनके गुरु वही रामानंद जी थे जिन्होंने जुलाहे कबीर को कबीर साहब बनाया था !

इन समर्थ गुरु रामदास जी के प्रिय  शिष्य क्षत्रपति शिवाजी को कौन नहीं जानता  ?

क्षत्रपति शिवाजी की दीक्षा 

हमारे सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी ने क्षत्रपति शिवाजी की दीक्षा पर प्रकाश डालते हुए  कहा कि रामदास जी ने अपने  प्यारे शिष्य शिवा को राम मंत्र ही दिया !

ऎसी सुशिक्षा दी सुखकारी ,रामदास ने बहुत बिचारी 
प्यारे राम नाम धुन लाओ कर्म योग से सब सुख पाओ

[ 'गुरुमंत्र' के सतत जाप तथा निष्काम सेवा एवं सूझबूझ युक्त कठिन श्रम से 'शिवा' कालान्तर में क्षत्रपति शिवाजी बना और उसने देश द्रोहियों को नाकों चने चबवा दिए]

जिसने अपने तेज से जन बल लिए महान 
सुदेश जाति की रक्षा की करके नीति विधान

सांस मिला हरिजनों को मिली म्लेच्छ से त्राण
शान्ति -धर्म स्थापित हुए ,निर्भय जान अजान
[भक्ति प्रकाश से ]
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संत तुकाराम की दीक्षा 


संत तुकाराम जी को  स्वप्न में सद्गुरु मिले और स्वप्न में ही उन्होंने तुकाराम जी को गुरु मंत्र दिया -"जय जय  राम कृष्ण हरि"! तुकाराम जी द्वारा उद्घोषित  इस अतिशय मंगलकारी मंत्र नें कितने जीवों को उबारा,  कितने साधकों को भक्ति -रस का आस्वादन कराया ,उसका अनुमान लगाना असंभव है ! हमारे सद्गुरु स्वामी जी का कथन है

तुकाराम ने स्वप्न में संत शिरोमणि देख
सीखी उससे साधना ऐसा मिलता लेख

गूंजा उसके कांन  में राम नाम शुभ आप ,
आत्मा उसका हो सजग करने लगा सुजाप 
                            (भक्ति -प्रकाश से )
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ठाकुर रामकृष्णदेव परमहंस जी की दीक्षा 

ठाकुर की जीवनी असाधारण है ! सांसारिक दृष्टि से श्री  रामकृष्णदेव जी निगुरे थे ! उनके कोई एक औपचारिक सद्गुरु थे ही नहीं ! ब्राह्मण कुल में जन्मे 'गदाधर' निरक्षर थे और देखने में बिलकुल गंवार लगते थे लेकिन वह अनंत दिव्य शक्तियों से युक्त थे !

वे जगन्मात जगदम्बे "माँ काली" को ही अपना  एकमात्र "गुरु" मानते थे ! माँ काली ही उनकी जीवनी शक्ति, उनकी सदगुरु ,उनकी  मार्ग दर्शक  थीं !  ! दक्षिणेश्वर की "माँ काली" से अक्सर वह रो रो कर प्रार्थना करते थे :-

"माँ आप के अतिरिक्त इस संसार में मेरा अन्य कोई मार्गदर्शक नहीं है !, एक आप ही मेरी गुरु हैं ! मुझे आपके अतिरिक्त किसी और से कुछ भी नहीं सीखना ! ,मैं केवल वही सीखूंगा जो आप  मुझे सिखाएंगी ! माँ मैं केवल वही करूँगा जो आप मुझसे करवाएंगी ! "माँ  आपही मेरी सर्वस्व हैं , आप का द्वार छोड़ कर मैं अन्यत्र कहीं नही जाउंगा !"

प्रियजन ,इन माँ बेटे की प्रीति इकतरफा नहीं थी ! माँ भी बेटे को उतना ही चाहती थी जितना बेटा मा को ! ठाकुर अपने सारे कर्म  ही माँ की प्रेरणा और उनके आदेशानुसार करते थे लेकिन माँ की एक सिखावन; जिस का पालन ठाकुर ने आजीवन किया ;वह था  " कनक ,कामिनी और कीर्ति ,इन तीनों से सर्वथा बचो" ,  और यह तो जगजाहिर है कि ठाकुर ने आजीवन माँ के इस आदेश का कितनी तत्परता से पालन किया !

माँ के आदेश से ठाकुर ने सिद्ध महापुरुष तोतापुरी महाराज से अद्वैत वेदांत की शिक्षा पायी  तथा  विश्व के अन्यान्य सभी प्रमुख धर्मों का, उनकी विशिष्ट  प्रणालियों के द्वारा विधिवत अनुष्ठान किया और आप को आश्चर्य होगा यह जान कर कि केवल तीन तीन दिन की साधना से उन्होंने उन सभी धर्मों में भी सिद्धि प्राप्त कर ली !

आप सब जानते ही हैं कि परमहंस श्री रामकृष्णदेव के विश्वविख्यात मनस्वी शिष्य स्वामी विवेकानंद  ने भारतीय वेदांत और संस्कृति के उदात्त स्वरुप को विश्व के सभी विकसित पाश्चात्य देशों में प्रतिष्ठित किया !

अगले अंक में हम उन्ही स्वामी विवेकानंद जी की दीक्षा के विषय में , "ऊपर वाले"  से हाल में मिली प्रेरणाओं के आधार पर ,अपने विचार लिखेंगे ! प्रियजन ,बस आपको थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी और साथ साथ हनुमान जी से यह प्रार्थना भी कि ,           

हे बजरंगबली ,
"बल बुधि विद्या देहु "भोला" के हरहु कलेश बिकार" 

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प्रियजन , आप जानते ही हैं 

नहीं चलती हमारी कलम तो हरगिज़ नहीं चलती 
मगर जब चल पडे तब रोकना इसको बहुत मुश्किल 

"उन्होंने" खेंप भेजी प्रेरणा की भर के कंटेनर 
कहाँ रक्खे इसे "भोला",जगह की है बहुत मुश्किल 
[ भोला ]
             
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निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग :- श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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सोमवार, 19 नवंबर 2012

गुरू कृपा से नाम दीक्षा

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गुरू दीक्षा

(गतांक से आगे)
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           गुरु दीक्षा पर वार्ता प्रारम्भ करने से पूर्व , आपसे एक अपनी बात कहने की इच्छा है :   

प्रियजन ,    हमने बार बार कहा है कि ज्येष्ठ सम्बन्धियों और गुरुजन से विरासत में प्राप्त शुभ संस्कारों और दिव्य ज्ञान के अतिरिक्त हमारी झोली में आध्यात्मिकता का कोई अन्य एक दाना भी नहीं है ! और हम उनमे से केवल वो बातें हीं आपको बताते हैं जिनकी सच्चाई की अनुभूति हमे स्वयम इस जीवन में हुई है ! 

एक बात और बतानी है भैया कि पिछले लगभग १० वर्षों से ,यहाँ की तेज तर्रार, विशुद्ध ,विलायती  औषधियों के सतत सेवन ने हम दोनों की "स्मृति" [स्मरण शक्ति] बहुत क्षीण कर दी है ! आप माने न माने कभी कभी तो हम ,नाती पोतों की कौन कहे , अपने ही नाम भूल जाते हैं !

ऐसे में अवश्य ही हम अनेको बार कमेंट्स पर किये अपने "वादे" भी भूल जाते हैं और हमारी  वे कथाएँ जो हम स्वयम आपको सुनाना चाहते हैं , अधूरी छूट जाती हैं ! इस प्रकार हमारी अपनी ही इच्छा हम पूरी नहीं कर पाते और आपसे कहीं अधिक निराशा और हताशा  हम महसूस करते हैं !

अस्तु  हमारे अतिशय प्रिय पाठकगण हमारी भूल चूक माफ कर के कृपया हमे याद दिलायें वे प्रसंग जो हम ने अधूरे छोड़ दिए हैं ! 
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आइये देखें आज "गुरू दीक्षा" पर क्या लिखवाते हैं हमारे "ऊपर वाले" 

संत-महापुरुषों से हमने सुना है कि सच्चे सदगुरु द्वारा अपने शिष्यों की वृत्तियों को परमतत्व से जोड़ने की क्रिया "दीक्षा" है ! 

सद्गुरु स्वामी सत्यानन्दजी महाराज ने इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए समझाया है कि गुरुजन तीन विधियों से अपने योग्य शिष्यों को दीक्षित करते हैं !

[१] स्पर्श से ,
[२] दृष्टि अथवा  देखने से , तथा
[३] ध्यान से

इन तीनों विधियों में से किसी एक का अथवा दो का या तीनों का एक साथ ही प्रयोग कर के गुरुजन अपने शिष्यों के अंतर्घट में दिव्य आनंदप्रद तरंगें पैदा कर देते हैं !

इस संदर्भ में स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने कहा है कि
" सूक्ष्म जगत में दीक्षा इन तीनों प्रकार से होती है !  स्थूल जगत में प्रगति भी इन तीन प्रकारों से ही होती है तथा जीवों में बुराई भी इन तीन प्रकारों - स्पर्श ,दृष्टि और ध्यान से ही आती है !"

चलिए इन तीनों दीक्षा पद्धितियों पर कुछ प्रकाश डालें

स्पर्श दीक्षा 

प्रियजन यह दीक्षा सर्वाधिक दुर्लभ है ! सच पूछो तो सच्चे सद्गुरु के दर्शन होना ही अति कठिन है  ! जब तलक जीव पर  हरि की विशेष कृपा न हुई हो ,जब तक किसी जीव का पूर्ण भाग्योदय न हुआ हो, उसे सच्चा सद्गुरु मिल ही नहीं सकता ! हम साधारण जीव किस खेत की मूली हैं ?  

हम साधारण जीवों के लिए सद्गुरु के "इतने निकट" पहुँचने का सौभाग्य कि हम उनके श्रीविग्रह का स्पर्श कर सकें या वे ही हमे छू सकें दुर्लभ ही नहीं , असंभव है !, ऎसी दीक्षा तो बिरले सौभाग्यशालियों को ही प्राप्त होती है !

दृष्टि दीक्षा

जैसे कछुआ अपने अण्डों को अपनी आँखों से लगातार उसकी ओर देख कर ही "सेता" है इसी प्रकार संत -जन भी अपने से दूर बैठे जिज्ञासु साधकों को केवल देख कर ही अथवा दृष्टि द्वारा ही उन पर प्रभाव डालते हैं, उन्हें सेते हैं ,उनका पालन पोषण करते हैं!

ध्यान दीक्षा

स्वामी सत्यानान्द्जी महाराज का कथन है कि "  मच्छ ध्यान मात्र से अपने बच्छों को  सेता है !  इसी प्रकार सद्गुरु अपने दूर देशस्थ साधक को ध्यान द्वारा ही सहायता की खेंप पहुंचाता रहता है ! (प्रवचन -पीयूष) ! ज़रा सोचें ,वैसे स्थानों तक जहां दृष्टि नहीं पहुंच पाती ,जहाँ शब्द भी नहीं पहुँच सकते वहाँ केवल ध्यान द्वारा ही पहुँच कर गुरुजन अपने शिष्यों  का मार्ग -प्रदर्शन और उनकी सहायता कर देते हैं !

प्रियजन ध्यान दीक्षा का अनुभव इस दास को तथा इसके परिवार के सभी सदस्यों को आजीवन हुआ है ! वर्षों श्री राम शरणम के अपने इन महान गुरुजन से बहुत बहुत  दूर रहकर भी हम लोग इन कृपालु गुरुजन की कृपाओं से वंचित नहीं रहे ! अपनी "आत्म कथा" में हमने  साउथ अमेरिकन प्रवास के दिनों में हमारे ऊपर सद्गुरु श्री प्रेमनाथ जी  महाराज की "ध्यान"  द्वारा  की हुई अनन्य कृपाओं का विस्तृत वर्णन दिया है ! तदनंतर सद्गुरु डॉक्टर विश्वामित्र जी महाराज ने भी हमारे ऊपर पल पल  यह ध्यान जनित कृपा ही बरसाई !  और देखा आपने स्वामी जी के कहे अनुसार ,यह दासानुदास तथा उसका पूरा परिवार "मच्छ शिशुओं" के समान गुरुजन की "ध्यान दीक्षा" से  ही प्रतिपालित हुआ !

सद्गुरु की पहचान 


इस विषय में , स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने कहा है 

सद्गुरु की पहचान यह ,उपरति प्रेम विचार ! 
वीतरागता सुजान्ता ,रहित हठ पक्ष विकार !!
शान्ति भक्ति संतोष का कोश  ,रोष से पार !
राम नाम  में लीन जो , प्रतिमा  प्रेम  प्यार !!
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प्रियजन ,

                          अपने इस जीवन में हमने ऐसे अनगिनत 'गुरू' देखें हैं 
जो देश की भोली भाली साधारण जनता को लच्छेदार बातों से लुभा कर   
 उनसे कीमत वसूल करके उन्हें अपनी चमत्कारी' ? दीक्षा" देते हैं ! 
ये गुरूजन  साधकों की 'पाकेट' की गरमी से प्रोत्साहित होते हैं 
और धनवान साधकों को पास बुला कर , उन्हें गले लगाकर  
अति आदर सहित उन्हें दीक्षित करते हैं ! 
  समझदार साधकों को ऐसे गुरुजन से बचना चाहिए !

अस्तु  -



प्रियजन, गुरु  को खोजिये राम शरण में जाय !
प्रभु कृपा  से स्वयम दर्शन देवेंगे  गुरु   आय  !!  

 "भोला"



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क्रमशः 
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निवेदक :-  व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला" 
सहयोग :-  श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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रविवार, 11 नवंबर 2012

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महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं ---- नमस्तुभ्यं दयानिधे 
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 मेरे अतिशय प्रिय सभी स्वजन
जय श्रीराम
------------ 
दीपावली के इस मंगलमय शुभ पर्व पर  
हमारी हार्दिक शुभ कामनाएं स्वीकारें 

प्रियजन , 
मेरी माने तो इस दीपावली ===, 

मनमंदिर में  ज्योति  जगाकर ,  औरों के  घर  दीप  जलाओ !!
जगमग दीप जगा कर चहुदिश ,निज पथ का तम दूर भगाओ !
निर्भय आगे बढ़ते जाओ , दीप जलाओ दीप जलाओ

गहन   अँधेरे   में  जग  डूबा  ,  चहु  दिसि   उजियारा  फैलाओ !
अपना  घर  चमका के  प्रियजन , दुखी जनों के मन  चमकाओ !!
उनके घर भी दीप जलाओ ,
दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

किसकी  झुग्गी  अन्धियारी है ,  कौन  कहाँ  है  भूखा  प्यासा ?
देवालय से पहिले ,प्रियजन उस दरिद्र   को   भोग    लगाओ  !! 
उस भूखे की भूख मिटाओ  , 
दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

'अर्थ'  नहीं है फिर क्या ?  अपना अंतर  घट  तो  प्रेम  भरा  है !      
अक्षय है वह , प्यारे तुम बस ,   वही 'प्रेमरस'  पियो  पिलाओ !!
स्वयम छको औ उन्हें छ्काओ ,
दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

तरस् रहें जो 'खील बताशे' को वे प्यारे प्यारे बच्चे ! 
बुझे हुए चेहरे ,जरजर तन वाले ये दुखियारे बच्चे !
फुटपाथों पर भटक रहे हैं जो अनाथ मनमारे बच्चे !
उनके मुखड़ों पर प्रियजन तुम प्यारे प्रभु का नूर खिलाओ !!

गुरुजन ने जो दिया "नामरस", स्वयम पियो औ उन्हें पिलाओ 
प्रेम प्रीति की अलख जगाओ , 
दीप जलाओ , दीप जलाओ !!

[  भोला ]
"दीपावली
ब्रूक्लाइन , (एम्.ए.. यू.एस.ए) 
नवम्बर ११, २०१२ 
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निवेदक : व्ही . एन..श्रीवास्तव "भोला"
एवं 
श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव  
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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

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"दीक्षा" 

दृष्टि , वाणी ,स्पर्श, एवं ध्यान द्वारा "दीक्षा"

पिछले पखवाड़े , "हरिकेन सेंडी" का भयंकर उत्पात झेल रहा था अमेरिका का यह भू खंड ;जहाँ विगत १२ वर्षों से हम दोनों अपने दो ज्येष्ठ पुत्रों और उनके परिवार के साथ , प्यारे प्रभु "श्री राम" के  सुखद संरक्षण में रह रहें हैं !

प्रियजन , कबीर साहेब का यह सूत्रात्मक कथन कि  :"दुःख में सुमिरन सब करें ,सुख में करे न कोय" ,की सच्चाई, उन दिनों की हमारी रहनी में अक्षरशः प्रमाणित हुई  !  उस भयानक प्राणघातक प्राकृतिक प्रकोप से बचने के लिए सभी आस्थावान व्यक्ति किसी न किसी रूप में अपने अपने इष्टदेव और गुरुजन का स्मरण कर रहें थे ! सद्गुरु-स्मृति के साथ ही आस्तिक मानव के हृदयाकाश में दामिनी के समान कौंध रहां था ,"सद्गुरु" से "दीक्षा" में प्राप्त उनका "गुरुमंत्र" !  

मुझ जैसे  साधारण व्यक्ति को भी ऐसे में अपने  सद्गुरु का स्मरण आना स्वाभाविक ही था ! "सद्गुरु"  की स्मृति के साथ मुझे १९५९  की पंचरात्री सत्संग के किसी प्रवचन में स्वामी जी  का यह वक्तव्य साफ़ साफ़ याद आया ! [ मेरी शब्दावली कदाचित भिन्न हो  , लेकिन उसमे व्यक्त भावनायें पूर्णतः वास्तविक हैं ] - महाराज जी ने कुछ ऐसा कहा था :

" जीवन में विपत्तियां आजाती हैं ! हम संकट में घिर जाते हैं ! ऐसे में यदि विमल भाव से हम उचित पुरुषार्थ के साथ साथ निष्काम प्रार्थना करें तो भयंकर से भयंकर तूफ़ान में डगमगाती किश्ती से  भी  पार उतर जाएंगे !" 

यहाँ "सेंडी" के आगमन पर अपनी निजी असमर्थताओं के होते हुए भी , प्यारे प्रभु की अहेतुकी अनुकम्पा एवं अपने गुरुजन के स्नेहाशीर्वाद और शुभचिंतकों की दुआओं के सहारे तथा इस देश की समुचित आपातकालीन व्यवस्था की मुस्तेदी के कारण  अमरीका के इस भू खंड ,मेसाच्यूटीस में हमारी नैया भी उस भयंकर तूफ़ान में  आखिरकार पार लग ही गयी !

आपको विदित ही है कि "सेंडी" के आगमन के बहुत पहले से ही मेरा मन, अपने सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की दिव्य स्मृति और उनसे मिली नाम दीक्षा के विचारों से भरा हुआ था !  सम्भवतः उसके फलस्वरूप ही मैंने उन्ही भावनाओं से ओत-प्रोत अपना पिछला आलेख , इत्तेफाक से ,जी हाँ बिलकुल इत्तेफाक से प्रेषित किया था "तीन नवम्बर" को ! 

प्रियजन ,"तीन नवम्बर " मेरे जीवन के एक अति महत्वपूर्ण दिवस की अंग्रेजी तारीख है और मुझे देखिये , मैं इस महत्वपूर्ण तारीख को भूला हुआ था ! अब सुनिये कि आज सहसा कैसे  याद आगई - "तीन नवम्बर" की : 

आज प्रातः कृष्णा जी ने अपनी "ट्रेवेलिंग तिजोरी" खोली . जिसमें हीरे मोतियों की जगह पड़े हैं ,दीमकों द्वारा कुतरे हुए मेरे कुछ उन पत्रों के भग्नावशेष जो मैंने  ,धर्मपत्नी - कृष्णा जी के पास , १९६४- ६५ में लन्दन के भारतीय छात्रावास से अपने एकाकी प्रवास के दौरान भेजे थे ! कृष्णा जी ने उन पुराने पत्रों के साथ साथ अपने उस कागजी खजाने से निकाले थे मेरी पुरानी डायरियों [ रोजनामचों ] के चंद बचे खुचे पृष्ठ !  

हाँ तो आज कृष्णाजी ने उसमें  से निकाल कर मुझे पढ़ने को दिया ,मेरी १९५९ वाली डायरी का  "तीन नवम्बर" वाला पृष्ठ !  अर्ध शताब्दी से भी पुराना वह बदरंग भूरा ,काल कवलित ,मटमैला  जर्जर कागज और उसके अधिकाँश भाग पर मेरे द्वारा लिखित एक धुंधलाती अस्पष्ट  शब्दावली , जिसे पूरी तरह पढ़ पाना भी आज मेरे लिए कठिन है !


उस् "तीन नवम्बर १९५९" वाले पृष्ठ पर चमचमाती लाल रोशनाई में अंकित दिखा मेरा  एक बयान जो आज भी उतना ही दैदीप्तिमान है जितना तब - आज से ५३ साल पहले रहा होगा ! मैं उसे  पढ़ सका ,अस्तु आपको भी बता रहा हूँ , 

मंगलवार - कार्तिक -शु. ३, वि. २०१६ -                          तदनुसार ३. नवम्बर १९५९ ई.

हम 'जनता' से ग्वालियर आये ! दोपहर बाद दादा के साथ , ( शर्मा बिल्डिंग ,लश्कर से परमेश्वर भवन ) , मुरार गये श्री स्वामी जी के दर्शन करने तथा पंच रात्रि सत्संग में सम्मिलित होने की आज्ञा प्राप्त करने !
आज्ञा मिल गयी !
आज सायंकाल श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने हमे "नाम दीक्षा"  दी ! कितना "सुख" मिला ? कौन वर्णन कर सकता है ?

ग्वालियर  - ३-११-१९५९ 

प्रियजन , आप अब तो जान ही गये हैं कि यह तारीख - "तीन नवम्बर"   मेरे लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है !  



प्रातः स्मरणीय श्री स्वामी सत्यानन्द जी सरस्वती महाराज 

आज से ठीक ५३ वर्ष पहले , ( ३ नवम्बर १९५९)  को , 'मुझे' -[ आपके इस वयोवृद्ध ८३ वर्षीय शुभ चिंतक को , जिन्हें आप 'व्हीएन','विश्वम्भर' ,'श्रीवास्तवजी' 'भोला' आदि नामों से जानते हैं ] ,अपने जन्म जन्मान्तर के संचित पुण्य के  फलस्वरूप ,प्यारे प्रभु की विशेष कृपा से , सद्गुरु स्वामी श्री सत्यानन्द जी महाराज के प्रथम दर्शन हुए थे ! 

कितना सत्य है यह सूत्र कि जिस् व्यक्ति को उसका सद्गुरु मिल गया उसके जीवन का अन्धकार सदा सदा के लिये मिट गया और उसके सौभाग्य  का भानु  उदय हो गया  !

हाँ तो मैं सुना रहा था स्वामीजी महाराज के प्रथम दर्शन की कथा  ! उस दिव्य प्रथम दर्शन के साथ साथ स्वामी जी ने मुझे दीक्षित करके  " परम कृपा स्वरूप, परमप्रभु ,"श्रीराम" के   शुभ मंगलमय नाम का गुरू मंत्र भी दे दिया था ! 

वह "दीक्षा" इस मानव जन्म में मेरी प्रथम और अंतिम  गुरू दीक्षा थी ! उस समय मैं नहीं  कह सकता था कि मेरी वह दीक्षा स्पर्श,दृष्टि ,वाणी एवं ध्यान "दीक्षा", में से कौन सी थी !  क्यूंकि 

दीक्षा के समय मैंने क्या देखा , क्या सुना , क्या किया मुझे ठीक से याद नहीं ! याद है तो केवल यह कि मैं उस समय श्री महराज जी की तेजस्वी आभा से ऐसा सकपकाया हुआ था कि मुझे स्वामी जी महाराज के मुखमंडल की ओर आँख उठाकर देखने का साहस ही नहीं हुआ ! मैं  केवल उनके गुलाबी गुलाबी नव् विकसित कमल कलिकाओं जैसे श्री चरणों की ओर लालची भंवरे के समान निहारता रहा ! 

प्रियजन , उस दिन  महाराज जी के एकाकी सानिध्य ने मेरे मन को परमानंद से भर दिया था ! मेरा प्यासा साधक मन , स्वामी जी की मधुर वाणी से नि:सृत अमृत कंण से सिंचित हो रहा था ! श्री चरणों के आलावा मैं और कुछ देख नहीं सका था लेकिन मुझे उस समय अपने मस्तक पर स्वामी जी महाराज के वरद हस्त का कल्याणकारी स्पर्श  अवश्य ही महसूस हुआ था  ! निश्चय ही उस समय स्वामीजी ने  अति करुणा करके मुझे अपनी मंगलमयी कृपा दृष्टि से देखा होगा ! इस प्रकार , वाणी ,स्पर्श एवं कृपा दृष्टि द्वारा श्री स्वामी जी महाराज ने  मुझे दीक्षित कर के मेरा यह मानव जन्म सुधार दिया !

आइये आज हम अपने अपने "इष्ट" और "सदगुरू" से यह प्रार्थना करें कि कृपा करके वो   हमारे जीवन के शेष क्षणों में भी हमारे मस्तक पर अपना वरद हस्त फेरते रहें जिससे  हमारे मन का आस्तिक भाव दिन प्रति दिन दृढ़ होता जाये और हम अपने "परम प्रिय इष्ट" को एक पल के लिए भी नहीं भूलें ------- 


क्रमशः 
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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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शनिवार, 3 नवंबर 2012

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सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज

एवं उनकी करुणा से जीवन में समय समय पर मिले अन्य गुरुजनों की कृपा =================================================  

सद्गुरु स्वामी सत्यानन्दजी  महाराज से बिछोह की बात करते करते मैं अपने पिछले आलेख में भावावेग में भूल से लिख गया था कि स्वामी जी " थे " ! 

प्रियजन , वह  मेरी गलत बयानी थी ! वास्तविकता क्या है वह मैं आपको अपनी ८३ वर्षों की अनुभूतियों के आधार पर आज  पूरे भरोसे के साथ बता रहा हूँ : 

स्वामी जी महांराज ही नहीं वरन उनके बाद एक एक करके ,गुरुदेव प्रेम जी महाराज तथा मेरे अतिशय प्रिय गुरुदेव डॉक्टर विश्वामित्तर जी महाराज हमारे जीवन के आध्यात्मिक  अन्धकार को परमानंद की ज्योति से भरने को आये और चले भी गये !  स्थूल रूप में हमसे दूर होते हुए भी उनमे से कोई भी हमसे एक पल को भी विलग नहीं हुआ ! 

ये  तीनों गुरुजन  हर समय मेंरे साथ रहे ,वे अभी भी मेंरे साथ हैं और भविष्य में भी पल पल मेंरे साथ ही रहेंगे ! 

प्रियजन यह मात्र मेरा ही अनुभव नहीं है ! श्री रामशरणम के अनेक वयोवृद्ध साधको ने जिन्हें स्वामी जी महाराज के सानिध्य का सौभाग्य मिला था , मुझे अपनी अपनी अनुभूतियों की कुछ ऐसी ही कथायें सुनाईं जिनसे मेरी उपरोक्त धारणा और पुष्ट हुई !  इन महात्माओं को भी ,गोलोक गमन के उपरांत श्री स्वामी जी महाराज ने साक्षात  दर्शन दिए और कितनी बार सूक्ष्म रूप में प्रगट होकर उनका मार्ग दर्शन किया ,उन्हें प्रेरणात्मक सुझाव दिए और उन्हें उनके अभियान में सफलता दिलवाई ! स्वामी जी महाराज के शब्दों में -

पथ प्रदर्शक "वह" कहा ,परमारथ की खांन !
कर दे पूरन  कामना , दे कर भक्ति सुदान !!


प्रियजन , संत महापुरुषों से सुना है ," जिस साधक को अपने इष्ट-स्वरूप सद्गुरु का ही एकमात्र  भरोसा हो , जिसको  केवल  उनका ही आश्रय हो ,उस साधक के सभी शुभ संकल्प उसके इष्ट-गुरुजन के आशीर्वाद एवं उनके प्रेरणात्मक  मार्ग -दर्शन से  अविलम्ब सिद्ध  हो जाते हैं !

गुरुजनों ने इस संदर्भ में हमारा ध्यान श्रीमदभगवत गीता के दूसरे अध्याय के ४८वें श्लोक [ "योगस्थ कुरु कर्माणि -------- योग उच्चते"  ]  की ओर आकर्षित करते हुए हमे पूर्ण समर्पण भाव से अपने सभी कर्म करते रहने की प्रेरणा दी और इस प्रकार हमे सफलता की एक और कुंजी प्रदान कर दी !

श्री गीताजी के उपरोक्त श्लोक का सरल हिन्दी अनुवाद , 

आसक्ति सब तज सिद्धि और असिद्धि मान समान ही 
   योगस्थ  होकर   कर्म कर ,  है   योग  समता  ज्ञान ही !!

[ श्री दीना नाथ दिनेश जी की, "श्री हरि गीता" से ] 

महापुरुषों के अनुभवों  से  मैंने जाना कि इस स्थिति को पाने के लिए इन्होने अपने प्रत्येक "क्रिया" में अपनी समग्र क्षमताओं का पूरी ईमानदारी के साथ प्रयोग किया और कर्म करते समय उन्होंने अपना "गुरुमंत्र" पल भर को भी नहीं भुलाया !  

इसके अतिरिक्त मेरा एक और अनुभूत सत्य यह है कि "सदगुरुजन अपने कर्मठ भरोसे वाले - विश्वासी शिष्यों पर पडी विषम परिथितियों से उन्हें उबारने के लिए किसी न किसी रूप में उनके निकट पहुंच जाते हैं और कभी स्थूल रूप में तो  कभी सूक्ष्म रूप में  अपने  साधकों को  प्रेरणात्मक परामर्श प्रदान करते  रहते हैं !

मुझे स्वयम इस प्रकार के अनेक अनुभव हुए हैं ! परमगुरू श्री राम के -निर्देश से मेरे सभी गुरुजनों ने ,न केवल भारत भूमि पर वरन स्वदेश से हजारों मील दूर इंग्लेंड में (१९६३ से ६६) , साउथ अमेरिका के एक करेबियंन देश में (१९७५ से ७८) तथा यहाँ यू.एस.ए में २००१ से आज २०१२ के नवम्बर मॉस तक , कभी सूक्ष्म रूप में उपस्थित होकर और कभी किसी अन्य शरीर के स्थूल रूप में  प्रगट होकर मुझे न केवल दर्शन दिये वरन निज करकमलों से मेरे वे कार्य पूरे कर दिए ,जिन्हें न कर पाने के कारण उनके इस प्यारे शिष्य की जग हंसाई की नौबत आ गई थी !

मैंने उनमें से कुछ अनुभूतियों का उल्लेख  अपनी इस ब्लॉग श्रंखला "महाबीर बिनवौं हनुमाना" के निम्नाकित अंकों में सविस्तार किया है !

हनुमत -कृपा,
सद्गुरु -कृपा ;
श्री श्री  माँ आनंदमयी  की कृपा ;
गुरू कृपा;
हमारी गुरू माँ !  --- आदि , आदि !

प्रियजन  यदि आप विस्तृत  वृतांत जानना चाहें तो मेरे ब्लॉग के उपरोक्त अंश पढ़ लें !

स्वानुभूतियों के सहारे आज जीवन की सांझ तक पहुंच कर मेरी यह दृढतम धारणा हो गयी है कि ---

अवलम्बन ले राम का ,जो सब ऊपर एक!
आशा और विश्वास की ,है वह ऊँची टेक !!

जो जन हरि के हो रहें ,हरि की करते कार !
योग क्षेम उनका सभी ,करता हरि संभार !!

[ श्री स्वामी जी महाराज के "भक्ति प्रकाश" से ]

पाठकगण , प्रार्थना है कि आप भी "श्री हरि" के बन जाइए और "उनके" संरक्षण में आ कर चिंता मुक्त हो जाइए  !

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क्रमशः 
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निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती  कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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