सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 25 जून 2013

मुद मंगलमय संत समाजू

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संत स्वभाव गहोंगो 
 कबहुँक हौं यह रहनि रहोंगो ?

मन में मात्र एक स्वप्न संजोये
कि उनका स्वभाव संतों सा हो जाए



हमारे "बाबू" ने अथक प्रयास एवं अभ्यास द्वारा 
अन्ततोगत्वा "संतत्व" पा ही लिया
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पूज्यनीय बाबू  ने संतसगत से संतों का  स्वभाव ग्रहण किया ! जीवन में केवल एक दिवस अथवा दो दिवस ही नहीं वह  आजीवन "संतों" स दृश्य ही जिए , संतों जैसी रहनी रहे ! संतों के अनुरूप अपना जीवन बनाने की चेष्टा में उन्होंने असंख्य सद्ग्रन्थ पढे ,संत महात्माओं के प्रवचन् सुने, उनका सारतत्व  ग्रहण किया और उसके अनुसार अपने दैनिक जीवन को साधनामय बनाया !

संत समागम एवं सत्संगति के पावन प्रसाद को आत्मसात कर "बाबू"  ने  अपने जीवन का प्रेय ओर श्रेय दोनों ही प्राप्त करने की इच्छा से   अपने अभ्युदय एवं कल्याण का मार्ग निर्धारित किया ! इस राह पर अग्रसर होकर उन्होंने जहाँ एक ओर अपना जीवन दिव्य बनाया वहीं दूसरी ओर हमारे जैसे "निपट गंवार"के जीवन की मैली चादर भी चमका दी ! 

उपरोक्त विषय पर अधिक विस्तार से पाठकों को अवगत कराने के लिए मैं पूज्य "बाबू" के पुत्र तथा उनके शिष्य 
इंजीनीयर श्री अजेय श्रीवास्तव . बी टेक.[इलेक्ट्रिकल] से पाठकों को परिचित करवा रहा हूँ  
  
अजेय जी अधिक समय तक बिरला ग्रुप के "हिंडाल्को" तथा "रेनू सागर" पावर इत्यादि प्रोजेक्य्स से सम्बंधित रहे हैं तथा वहाँ  से रिटायरमेंट के बाद विश्व की विविध विख्यात देसी और विदेशी कम्पनियों के टेक्निकल एवं मेनेजमेंट कंसल्टेंट रह चुके हैं !

  
अजेय जी "बाबू" के शिष्य होने के कारण उनके आत्मिक एवं आतंरिक सद्गुणों के वास्तविक ज्ञाता हैं  तथा उनके आदर्शों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के विषय में हम सबसे अधिक ,"फर्स्ट हेंड" जानकारियाँ रखते हैं; उनसे  प्राप्त  पत्र को मैं यहाँ ज्यों का त्यों उदधृत कर रहा हूँ ! 

संत समागम से "बाबू" ने क्या सीखा 

मैंने पूज्य बाबूजी से  संभवतः सन 2003 के प्रारंभ में " संतों से क्या सीखा ? " लिखने का अनुरोध किया था । वे तब व्यक्तित्व विकास पुस्तक का तीसरा पुष्प लिख रहे थे ! जैसा की उनका style था, उन्होंने मुझसे संतों की लिस्ट बनाने का निर्देश दिया ।कालांतर में जब अशोक दादा ने पूज्य बाबूजी की स्मारिका में श्रद्धांजलि लिखने का निर्देश दिया तो 2003 के होम वर्क के सहारे पूज्यबाबूजी पर संतों के प्रभाव की झलकियाँ लिखी गयीं थी ।

पूज्य बाबूजी ने जो भी संतों से सीखा उसे चार्ट या लेख, अथवा पुस्तक के फॉर्म में लिख कर सबको  प्रार्थना-सत्संग के समय बताया और कथा-प्रसाद के पत्र के साथ लिखा । उनकी punch line  थी -


"जो भी सीखा है, वह यदि साधना,स्वास्थ्य या स्वकर्म की उन्नति में सहायक-उपयोगी नहीं है, तो वह मात्र  बुद्धि का व्यायाम है "

He practiced what he preached. His adaptibility to change was simply amazing. He not only changed his routine but also life style with greater impact for everyone to see. 

एक बात और वे स्वामी शरणानन्दजी के  विचार से सहमत थे कि  इस संसार में 
वस्तु, व्यक्ति (मानव-जीव-जंतु), परिस्थिति के आलावा कुछ भी नहीं है 

In his view, our communication pertains to 'people','events' or 'issues' Although people and events are important; but ISSUES are vital.


वे निरर्थक चर्चा से बचते थे ।

 He was allergic to useless discussions. At times, he would pause the discussions to ask : " Can we NOT do without this ?"

While details of Pujya Babuji's meeting with saints and sages would be very interesting,  taking a cue from the aforesaid thoughts, it would be worth-while to document impact made by these enlightened souls on Pujya Babuji -( My Gurudev) and Shri Ram Parivar .


संतों सन्यासियों के नाम          -      बाबूजी ने उनसे क्या सीखा 


परम सिद्ध्संत गुरुमहाराज महंत }    अरदास , ऋष आश्रम,   रानूपाली गुरुद्वारा,                        
दान प्रवृत्ति, निर्भयता ,

बाबा नारायणराम जी महाराज  }       -अयोध्या तीर्थ के प्रति प्रेम एवं अनेक बार  यात्रा


स्वामी सत्यानन्दजी महाराज          -  अधिष्ठान, अमृतवाणी, रामनाम,ध्यान-जप  साधना, पंचरात्रि सत्संग,
 साप्ताहिक कीर्तन, अमृतवाणी व्याख्या,  श्रीराम शरणम् 

स्वामी शरणानन्दजी महाराज         -   शरणागति पथ, आध्यात्म भाषा, मानव सेवा संघ ,जीवन शैली,


श्री श्री आनन्दमयी माँ                 -   मौन नित्य एकत्व साधना, गृहस्थ का आदर्शजीवन, नाम                                                           


स्वामी शिवानन्दजी महाराज          -    पारिवारिक प्रार्थना, Divine literature, ऋषिकेश तीर्थ यात्रा


स्वामी शांतानन्दाजी सरस्वती         -  Spiritual letters writing,  महामृत्यंजय मंत्र साधना, Spiritual literature for Children, "पढ़ो पोथी में राम" --, नाम-धुन


स्वामी अखंडानन्दजी महाराज        -  
सत्संग भगवत चर्चा कथा , Motivation to renew legal practice ,"
श्री कृष्णाय वासुदेवाय"                                                                  मन्त्र का महातम्य, अपार साहित्य  

स्वामी सत्यमित्रानन्दजी महाराज     -  आध्यात्म  में राष्ट्रप्रेम,गृहस्थ संत का सम्मान, परस्पर स्नेह उदारता ,समंन्वय  परिवार का सामीप्य एवं आदर्श गुरु रूप !                                                                                                             


स्वामी चिन्मयानन्दजी महाराज       -  Discourses in English, गीता ज्ञानयज्ञ , रविवार सत्संग


स्वामी शुकदेवानन्दजी  महाराज       -  परमार्थ निकेतन सत्संग-नियम,बाबा-दादी की स्मृति में कमरा


स्वामी भजनानन्दजी महाराज         -  आसन - प्राणायाम, अनुशासन प्रिय विनोदी स्वभाव


स्वामी प्रकाशानन्दजी महाराज        -   सौम्यता एवं आत्मीयता


स्वामी सदानन्दजी महाराज            -  आतिथ्य, रोचक कथाएँ  तथा संपादक के गुण


श्री मंजुलजी                             -  भजन एवं प्रवचन शैली


श्री दीनानाथ भार्गव ' दिनेश'          -  श्री सत्यनारायण कथा पुस्तक से प्रतिमास पूजाकथा ,' हरिगीता ' से प्रतिवर्ष जन्माष्टमी को सामूहिक गीता पाठ, तथा परिवार के बच्चों द्वारा "श्रीहरि गीता" के नाट्यरूपांतर का मंचन ! 


श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार            -  रामचरित मानस का नियमित पाठ, 'कल्याण' मासिक पत्रिका


श्री राधा बाबाजी                       -  अनुशासन, नवधा भक्ति जीने की प्रेरणा, " रोम रोम का प्यार " आशीर्वाद                                         

 
किलाधीश महंत सीताराम शरणजी  -    "राम परिवार" नाम, राग रागनियों में मानस का गायन तथा राम चरित्र से संबंधित प्रसंगों पर लोक धुनों में रचित , फागुन में होली , सावन में झूले तथा मंगलमय शुभ अवसरों पर बधाई - " बधइयां बाजे आंगने में " का गायन ! 


श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर 'फ़कीर'  - श्री अरविन्द का साहित्य, नैनीताल कैंप, सूफ़ी शायरी व हास्य- विनोद युक्त माहौल                                           


मैंने अपनी सीमित स्मृति से Facts एकत्रित कर, अपनी सीमित बुद्धि से Opinion भी डाल दी है।

इस विषय पर अधिकारिक रूप से तो केवल पूज्य बाबूजी और पूज्य अम्मा ही बता सकते थे।

पूज्य बाबूजी यद्यपि कुछ संत-महापुरुषों से नहीं मिले थे, पर उनके साहित्य और विचार धारा से वे बहुत प्रभावित थे।उनमे स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, श्री अरविन्द एवं गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर सर्वोपरि हैं।


परिवार में भी उन्हें अध्यात्म का पाठ पूज्य दादी, पड़दादी, बाबा एवं नानाजी से पग-पग पर मिला।


उनके role model पूज्य बाबा के अलावा " noble profession " से डॉक्टर साहेब बाबा ( डॉक्टर भगवत सहाय - ग्वालियर राज्य में प्रथम मेडिकल कौलेज  के प्रणेता )और मुरार हाई स्कूल के हेड मास्टर पूज्य श्री पी मुखर्जी साहेब [बाबा ] थे, जिन्होंने हमारे बाबा-बाबू-चाचा तीनों को ही पढ़ाया था और ग्वालियर राज्य द्वारा दिया गया इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ स्कूल का पद ठुकरा दिया था ।


Mukharji "Baba" really moulded the attitude studends. He would say, " I make MAN !"

[ हेड मास्टर श्री मुखेर्जी जी  से सीखी उपरोक्त बात बता कर पूज्यनीय बाबू हम सब से अक्सर कहते थे कि साधक को सतत "अच्छा मानव --[अच्छा इंसान ]" बनने का प्रयास करते रहना चाहिए ] "भोला" 

बड़ों को सादर चरण स्पर्श एवं सभी को जय सीताराम !
आपका शुभाकांक्षी,


अजेय

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इस संदर्भ में यह बताना अनिवार्य सा है कि उपरोक्त  संतजनों के अतिरिक्त मानस मर्मज्ञ अंजनी नंदन शरण जी , मानस के अमर प्रेमी  श्री राम किंकर जी महाराज , स्वामी ध्यानानन्दजी , बाबा नीम करोली ,संत शिरोमणि डोंगरे जी महाराज , श्री श्री देवराह  बाबा, गायत्री परिवार शांति निकुंज हरिद्वार के संस्थापक श्री राम शर्मा जी ,स्वर्गाश्रम के विभिन्न संतजन  कहाँ तक नाम गिनूँ ,समकालीन सभी दिव्य आत्म बिभूतियों के सदैव स्नेही पात्र रहे शिव दयालजी को इनसे  आध्यात्मिक विचारों का आदान-प्रदान करने का सुअवसर मिला,मानव -मूल्यों के विचार रत्न मिले , साधना प्रशस्त करने का पथ मिला  ,जिसे जीवन में चरितार्थ करके निजी  अनुभूति के आधार पर उन्होंने  हम जैसे प्रियजनों के लिए अनुकरण -अनुसरण  करने के तथा जीवन का सर्वांगीण विकास करने के  अनमोल सूत्र  प्रदान किये  !

पुरुषार्थ ,प्रेम ,भक्ति ,न्याय और सत्य की जीवंत  मूर्ति माननीय  श्री शिव दयालजी की मूलभूत मान्यता रही कि संसार की दिव्य विभूतियों के जीवन से  जब भी जहाँ कहीं भी जो सार तत्व , जो  सत्व गुण  सीखने को मिले ,उसे तत्क्षण अपने जीवन में उतारें और साधन धाम मानव जीवन को सार्थक बनाएँ !

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निवेदक: व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. जय श्रीराम ,धन्यवाद बेटा ,आपकी आध्यात्म और संगीत में रूचि है तो पिछले अंक भी देख लीजियेगा तथा "यू ट्यूब" पर "भोला-कृष्णा चेनेल" पर हमारे अनेक नये भजन भी सुन लीजिए ! अपने "इष्ट" का गुण गान सुन , किसी प्रकार भी "इष्ट" के साथ बने रहने से मन की त्रासदी घटती है तथा शान्ति और अन्ततोगत्वा परमानंद की प्राप्ति होती है !हनुमत कृपा तो वैसे ही आप जैसे आस्थावान व्यक्ति पर सतत बरसती रहती है !सदा प्रसन्न रहें - वी. एन.श्रीवास्तव "भोला" तथा श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला ,बोस्टन ,यू.एस.ए.

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