सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 19 मई 2010

J A G D I I S H

Print Friendly and PDF गतांक से आगे

जगदीश

"प्रभु की इस दुनिया में कोई सुखी और कोई दुखी क्यों है "

सच कहता हूँ , इस जीवन के ८१ वर्षों में अब तक तो मुझे इसका कोई सर्वमान्य संतोषजनक उत्तर नही मिल पाया है. बहुत ग्रन्थ मैंने नही पढ़े. पर अनेक सिद्ध संतों महात्माओं के दर्शन और उनकी सारगर्भित सरस वाणी सुनने का सुअवसर , हमको इस जीवन में,प्रभु-कृपा से बार बार मिला है. . प्रियजन उन मनीषियों के प्रवचनों से जो थोड़ा बहुत समझ पाया उसका सारांश यहाँ दुहराने का प्रयास कर रहा हूँ.

" ईश्वर ने इस सुन्दर सृष्टि का निर्माण अपनी प्रिय संतान "मानव" को सुखी और आनंदित रखने के लिए किया है . प्रभु की इस सृष्टि में उपलब्ध सब सुविधाओं का उचित ,संतुलित और मर्यादित उपभोग करनेवाला व्यक्ति सुखी होता है और मोह-प्रलोभनt में पड़ कर प्राप्त सुविधाओं से नाजायज़ लाभ प्राप्ति की लालसा करने वाला व्यक्ति दुखी होता है."

नरसिंह भगवान ने प्रहलाद को यह तथ्य समझाते हुए कहा " परमात्मा ने संसार के सारे पदार्थ जीव को सुखी करने के लिए बनाए हैं मनुष्य यदि अमर्यादित हो कर आसक्ति पूर्वक इन पदार्थों का उपभोग करे और दुखी होता रहे तो इसमें ईश्वर का क्या दोष है? "

अभाव,वियोग और प्रतिकूल परिस्तिथियाँ दुःख का कारण होंती हैं , संत मिलन से सत्कर्म की प्रेरणा होती है जिससे अन्ततोगत्वा मानव को अतुलित सुख की प्राप्ति होती है गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है :

नहीं दरिद्र सम दुःख जग माही
संत मिलन सम सुख जग नाहीं


भौतिक सुविधाओं एवं आध्यामिक ज्ञान का आभाव मानव को दरिद्र बना देता है जिसके कारण वयक्ति दुखी हो जाते हैं. सतसंग में गुरुजन से प्राप्त उपदेशों के प्रभाव से यह आभाव मिट जाता है दुःख दूर हो जाते हैं और इन्सान सुखी हो जाता है..


प्रियजन अपनी सीमित जानकारी के अनुसार हमने ये विचार व्यक्त किये हैं. हमारा अनुरोध है की आप भी इस अनूठे "ब्लोगिक" सत्संग में अपना योग दान करे और अपनी जानकारी और अनुभव के आधार पर अपनी बात भी हमे बताएं. .

क्रमश : ---
--निवेदन :श्रीमती डॉ कृष्णा एवं :व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

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