सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 8 सितंबर 2010

JAI JAI JAI KAPI SUR ( Sep,8,'10)

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हनुमत् कृपा-निज अनुभव 

गतांक  से आगे

चहचहाती  है न  चिड़िया   चाव से  , लहलहाती हैं न  उल्ही बेलिया 
हरि  गुणो को यह सुबह है गा रही सुन हुई वो मस्त कर अठखेलियाँ 
( अयोध्या सिंह उपाध्याय - हरिऔध् )

बहुत बचपन में उपरोक्त शब्द सुने थे। इतने सुन्दर लगे कि आज तक नहीं  भूल पाया। अभी ५-६ वर्ष पूर्व श्री राम शरणं लाजपत नगर ,दिल्ली मे, साध्वी बहेन शबनम जी ने अपनी दादी से सीखी एक पारम्परिक रचना सुनायी " हम से भली जंगल की चिड़िया " जिसने  मुझे'' हरिऔध" जी की उपरोक्त रचना  की याद दिला दी।  

उस गीत की स्थायी सुनते ही स्मृति पटल पर चलचित्र के समान प्रगट हो गई अपनी  "परम धाम" में बितायी उस रात्रि की  कहानी जब अखंड नाम जाप से उठते ही,मध्य रात्रि की नीरवता को चीरती एक अनोखी राम धुन सुनायी पड़ी.आश्चर्य से ह्म इधर उधर देखने लगे यह जानने को क़ि राम नाम की यह गुहार कहाँ से आ रही है और कौन अनुरागी लगा रहां है यह आवाज़ ?.

किसी पुराने साधक ने बताया क़ि शिवालिक की उस घाटी में पंछियों का  झुण्ड प्रति रात्रि  इसी उमंग उल्लास,लगन और विश्वास के साथ जोर जोर से "राम राम राम राम" नाम का उच्चारण करता है. यह क्रम तब से चल रहा है जब यहाँ "परम धाम" में श्री स्वामी जी महाराज को '"राम- नाद" सुनायी दिया था. कहते हैं क़ि वह ब्र्ह्म नाद सुनने के बाद श्री महाराज जी तन मन की सुधि बिसरा कर दोनों बांहं उठाये जोर जोर से "राम राम" पुकारने लगे.और मस्ती में झूम  झूम कर बड़ी देर तक चैतन्य महाप्रभु के समान बेसुध हो कर नाचते रहे. 

प्रियजन ! उस रात शिवालिक क्षेत्र की समस्त प्रकृति पेड़ पौधे,नदी नाले,पर्वत श्रृंखला ,जीव जन्तु अनायास ही महाराज जी से नाम दान पा कर दीक्षित हो गये . पन्छियो का वह समूह सद्गुरु से प्राप्त "नाम" का उच्चारण कर अपना जीवन सार्थक कर रहा हैं.

मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है . प्रक्रति ,पर्वत ,पक्षी  महाराज जी से प्राप्त दीक्षानुसार तब से अब तक उस "एक-नाम" के जाप में अथक जुटे हुए हैं और ह्म भाग्यवान प्रानी वह सब भूल बैठे हैं  अज की अपनी यह लज्जाजनक स्थिति मैं अपनी निम्नांकित  पंक्तियों में व्यक्त कर रहा  हूँ :-

ह्म से भली जंगल की चिड़ियाँ ,जब बोले तब राम ही राम !!


कितने  भाग्यवान हैं ह्म सब ऐसा सद्गुरु पाया है 
जिसने ह्म को राम नाम का सहज योग सिखलाया है !!
माया  जंजालों  में  फंस कर हमने उसे  भुलाया है ,
पर चिड़ियों ने राम मन्त्र  जीवन भर को अपनया है  !!

हमसे भली जंगल की चिड़ियाँ ,जब बोले तब राम ह़ी राम !!

निवेदक :-व्ही. एन. श्रीवास्तव  "भोला"

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