सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शनिवार, 25 सितंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 171

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सब हनुमत कृपा से ही क्यों ?
निज अनुभव 

गन्तव्य स्थान के ऊपर विमान धीमी गति से काफी देर तक चक्कर लगाता रहा ! फिर वह  अचानक एक तरफ घूम गया और एक बहुत विशाल नदी के ऊपर उसकी धारा की दिशा में  उड़ने लगा! हमारा माथा पुनः ठनका ! चिंता और बढ़ गयी! क्या हमारा विमान उस सागर जैसी भयंकर नदी पर उतरने वाला है ? और मुझे तो तैरना भी नही आता है! विमान में ऎसी  परिस्थिति झेलने के उपकरण भी नहीं  थे! मन ही मन मैं अपने आप को जल समाधि लेने के लिए तैयार करने लगा !

तभी हमारी नाक में   पेट्रोल की तीक्ष्ण गंध आने लगी ! एक और चिंता हुई ! क्या हमें  जीते जी चिता में  जलना है ? इतने में  कप्तान ने एलान क़िया क़ि यान का पेट्रोल नदी में  गिरा कर उसे हल्का किया जा रहा है जिससे रनवे पर क्रेश लेंडिंग होने पर विमान में  विस्फोट  न हो और आग न लग जाये !चिंता थोड़ी घटी!प्रियजन !आपको अधिक चिंतित नहीं  करूँगा ! 

जैसे ही पेट्रोल की गंध आनी खतम हुई ,विमान घूम पड़ा और पुनः हवाई अड्डे के ऊपर उड़ने लगा.! अत्याधिक सावधानी बरतते हुए ,लगभग शून्य की गति से विमान ने रनवे को छुआ! !एक भयंकर धक्का लगा ! यात्री अपने आगे वाली कुर्सी पर बैठे यात्रियों से टकराये ! केबिन भयभीत यात्रिओं की चीखों से गूँज उठा !सेफ्टी बेल्ट खुल गये ,  और यात्रिओं ने अपने अपने भगवानो से अपनी अपनी भाषा मे स स्वर  कृतज्ञता प्रदर्शित की ! ह्मने भी मन ह़ी मन अपने इष्टदेव और गुरुजन को धन्यवाद दिया!शीघ्र ही विमान का द्वार खुल गया ! कापते कांपते एक एक करके सभी यात्री उतर गये !हमारा भयंकर स्वप्न टूट चका था !

आज आप ही क्यों हम भी सोच रहे हैं क़ि इसमें कौन सी बहुत बड़ी कृपा कर दी "उन्होंने" हमारे  ऊपर ? विमान के पायलेट की दक्षता और कार्य कुशलता के कारण संकट टल गया! भगवान ने क्या किया ? प्रियजन ! यह भाव हमें हमारा अहं सुझा रहा है ! हमारे ऐसे विचार ही हमें  रावण ,कंस ,दुर्योधन जैसे असुरों के सम कक्ष खड़ा कर देते  है ! हम भूल रहे है क़ि विपत्ति काल में  केवल मैंने ही नही बल्कि हमारे साथ के सभी आस्तिक नास्तिक यात्रिओं ने जाने-अनजानेमें ,चाहे-बिना चाहे ,अपने अपने ढंग से अपने अपने भगवान को पुकारा था ! मृत्यु हमारे  द्वार पर खड़ी थी , अपने  जीवन के अंतिम क्षण में हम सब अति आर्त भाव से ,सच्ची लग्न और विश्वास के साथ समवेत स्वर में प्रार्थना कर रहे थे !क्या  तुलसी के राम, मीरा के श्याम ,हजरत मोहममद साहेब के अल्लाह और ईसाइयों के GOD ऐसे में, चुपचाप ,दूर से ही अपने प्यारे बच्चों  की दुर्गति  देखते रहते ? अवश्य ही "प्रभु जी" निराकार रूप में  प्रगट  होकर हमारी रक्षा कर गये ! अहंकार का काला चश्मा लगाये, हम "उन्हें" पहचान न सके !

कितने भुलक्कड हो गये हैं हम सब ? कितनी आसानी से हम अपने प्यारे प्रभु को,अपने गुरुजन को ,उनसे प्राप्त ज्ञान को भूल गये ?  हम तो प्यारे प्रभु का वह वादा भी भूल गये: 

सुनु मुनि तोही कहहूं सहरोसा ,भजहि जे मोहि तज सकल भरोसा!!
करहु सदा तिनके रखवारी  ,जिमि बालक राखही महतारी!!  
सखा सोच त्यागहु बल मोरे ,सब बिधि घटब काज मैं तोरे !!

 प्रियजन !आज ८१ वर्ष की अवस्था में मुझे उपरोक्त कथन का भाव भली भांति समझ में आगया है जो आज से  ३०-४० वर्ष पूर्व १९७५ - ७६ में हमारी समझ से कोसों दूर था !

उस दिन निराकार ब्रह्म ने हमारी जीवन रक्षा की थी ! आगे सुनाऊंगा एक ऐसा अनुभव जिसमे हमारे इष्ट श्री हनुमान जी ने साकार रूप में उपस्थित होकर मेरा (जी हां मेरा ) उद्धार किया ! आपको थोड़ी सी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी!

निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला". 

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