सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

गुरु के स्वर से स्वर मिला # 3 9 5

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साधना सत्संगों में  
गुरुजन से प्राप्त उपदेशों का हमारे जीवन पर प्रभाव   
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लगभग ५० - ५५ वर्षों से श्री रामशरणं,लाजपत नगर,नयी दिल्ली के गुरुजनों एवं उनसे दीक्षित महापुरुषों के सत्संग का लाभ उठा रहा हूँ ! उनके आशीर्वाद और शुभ कामनाओं के सहारे आज ८२ वर्ष की अवस्था में ,अनेकानेक व्याधियों को हँस हँस कर झेलता हुआ मैं केवल आनंद  ही आनंद लूट रहा हूँ !

मेरा अनुभूत सत्य यह है कि यदि कोई शक्ति हमे पीडाओं से छुटकारा दिला सकती है तो वह केवल हमारे मन-मन्दिर में विराजित सर्वशक्तिमान परमात्मा की शक्ति ही है ! प्यारे प्रभु को रिझा कर सहजता से उनकी कृपा पा सकने के लिए हमारे मन में उनके प्रति अपार श्रद्धा और अटूट विश्वास होना चाहिए ! हमें अहंकार शून्य होकर ,पूर्णतः उनके प्रति  समर्पित होंना चाहिए ! संत महात्माओं ने तो कहा ही है ,मैं भी आज पूरे भरोसे से कह रहा हूँ कि प्यारे प्रभु के प्रति अटूट विश्वास एवं सम्पूर्ण समर्पण होने पर ही हमारे जीवन में ऎसी निश्चिंतिता व् निर्भयता आई कि मैं आज जीवन मरण के भय से मुक्त हो गया हूँ ! मैं जान गया हूँ कि "मैं" यह नश्वर शरीर नहीं हूँ ! पीडाएं मुझे नहीं होतीं  इस नश्वर शरीर को होती हैं ,जिसे प्यार से अधिकांश लोग "भोला" कह कर पुकारते हैं !    
गुरुजनों के सानिध्य से हमें सहज ही परमात्मा की अहेतुकी कृपा का,तथा उनके प्रेम एवं उनकी करूणा का प्रसाद सतत प्राप्त हो रहा है ! हमें अपने चारों ओर एक दिव्य शांति की अनुभूति हो रही है ! विश्रांति से भरपूर मेरा चित्त अनायास ही प्रभु की अनंत लीलाओं के चिन्तन -मनन तथा भजन कीर्तन में लग रहा है ! गुरुजन की शुभ कामनाओं एवं प्रभु की अहेतुकी कृपा से मैं निश्चिन्त होकर हर काळ और हर भाव में निरंतर अपने प्रभु की अनंत कृपाओं का स्मरण कर पाता हूँ उनके गुणों का ,उनकी कृपा का गान कर पाता हूँ ! स्वामी जी महाराज के शब्दों में मुझे लगता है कि अंततः ---


अब मैंने रसना का  फल पाया 
भाव चाव से राम राम जप ,अपना आप जगाया 
राम नाम मधुरतम जप कर ,जीवन सफल बनाया 
अब मैंने रसना का  फल पाया 

(केवल रसना का ही नहीं ,प्रियजन मैंने तो अपने समग्र जीवन का ही सुफल पा लिया है) 

मुझे पढने लिखने में दिक्कत होती है ,इस कारण पिछले कितने ही वर्षों से कृष्णा जी श्रीमद भागवत पुराण , भगवद गीता , राम चरित मानस , तथा श्री स्वामी जी महराज के विभिन्न ग्रंथों का व्याख्या सहित पाठ करके मुझे सुनाती हैं ! थोड़ा बहुत खाली समय जो बच जाता है उसमे मैं अपने इलेक्ट्रोनिक म्यूजिकल इंस्ट्रुमेंट्स के साथ मिल कर जी भर के शोर मचाता हुआ "उन्हें" पुकारता हूँ !

आभारी हूँ मैं "उनका" कि जीवन दान देते समय जो आदेश "उन्होंने" मुझे दिया था उसे भली भांति निभा पाने की शक्ति सामर्थ्य और सुबुद्धि "वह" अभी तक मुझे देते जा रहे हैं जिससे मैं इस ब्लॉग के माध्यम से आपकी सेवा करने के योग्य हो गया हूँ !

मेरे अतिशय प्रिय पाठकगण, परमानन्द के अतिरिक्त प्यारे प्रभु के श्री चरणों में पूर्णतः समर्पित होकर , अहंकार त्याग कर ,अनन्य विश्वास और कर्त्तव्य निष्ठां के साथ जीवन जीने के कारण ,मेरे प्यारे प्रभु ने मुझे ,अपनी योग्यता पात्रता से बढ़ चढ़ कर सुख सम्रद्धि  और सुविधाएँ भी प्रदान कीं !(यह उचित नही कि मैं अपनी सांसारिक उपलब्धियां बताऊ)

क्या गुरुजन के तार से तार मिलाये बिना हमे इतनी उपलब्धिया हो सकतीं थीं ? नही न ! अस्तु आज अपने प्यारे प्यारे पाठकों से उनका यह बुज़ुर्ग शुभचिंतक अर्ज़ कर रहा है कि आप भी अपने गुरुजनों के सुर में सुर मिला कर वह समवेत स्वर तरंगित करें जिसमें सारे संसारी भौतिक सुख शांति के साथ साथ परमानन्द स्वरुप अपने अपने इष्ट देवों के भी दर्शन पा सकें !


निज तार से गुरु तार मिलालो ऐ दोस्तों !!
जब तार मिलेंगे मधुर झंकार उठेगी                      
हर तार से झंकार निकालो ऐ दोस्तों !!

स्वर में गुरू के ईश्वर साक्षात बिराजें, 
गुरु संग बैठ इकधुन गालो ऐ दोस्तों 

झंकार सुनो झूम के नाचो सभी साधक
अवसर न कोई दूसरा पाओगे दोस्तों !! 

सब कुछ मिलेगा अगर तुम संशय न करोगे  
संशय किया तो कुछ भि न पाओगे दोस्तों !! 

मेटेगा स्वयम "इष्ट" तिरे मन का अन्धेरा , 
जब भक्ति दीप आप जलाओगे दोस्तों !!

धरती पे तेरे "इष्ट" हैं गुरुदेव ही प्यारे ,
छोड़ोगे उन्हें तो कहाँ जाओगे दोस्तों !!
"भोला"
  
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निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती डोक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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1 टिप्पणी:

  1. काकाजी प्रणाम , यदि कोई शक्ति हमे पीडाओं से छुटकारा दिला सकती है तो वह केवल हमारे मन-मन्दिर में विराजित सर्वशक्तिमान परमात्मा की शक्ति ही है ! बहुत सठिक वाक्य

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महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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