सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
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हनुमान चालीसा

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आज का आलेख

शनिवार, 6 अगस्त 2011

"मुकेशजी" और उनका नकलची "मैं"- # ४ १ ५

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तू पर्दानशीं का आशिक है यूं नामे वफा बरबाद न कर
दिल जलता है तो जलने दे आंसू न् बहा फरियाद न् कर
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गतांक से आगे

कौन है वह पर्दानशीं ?

आज 'शीला'(जी) और 'मुन्नी' की बेपर्दगी ने सारे जहान को इतना मदहोश कर दिया है ,सब को ऐसा उलझा रक्खा है कि जमाने को मजबूरन ,सुबह से शाम तक हर तरफ चाहे रेडियो हो, टी वी हो या सिनेमा थिएटर हों या सड़क के किनारे वाली ऊंची ऊंची लम्बी चौडी होर्डिंगे, सर्वत्र एकमात्र शीला (जी ) तथा उनके टक्कर में डटी मुन्नी जी की सर्वव्यापकता का आभास होता रहता है ! चाह कर भी हम उनकी अनदेखी नहीं कर सकते !

ऐसे में मुझे मेरी धर्मपत्नी कृष्णा जी के स्वर्गवासी नानाजी ,अपने जमाने के नामीगिरामी शायर - जनाब मुंशी हुबलाल साहेब "राद" भिन्डवी (ग्वालियर) के कुछेक अशार कल से ही याद आ रहे है ! उनमे से दो मैं अपने पिछले संदेश में लिख चुका हूँ ,दोनों हीं "पर्दे" पर रोशनी डाल रहे हैं , उनका पहला शेर पढ़ कर ऐसा लगा कि अगर दुनिया में पर्दा न होता ( बस शीला और मुन्नी जैसी बेपर्दगी पसरी होती),तो इंसान् में दीद की ख्वाहिश ही नहीं पनपती ! (भक्तों को जैसी उत्सुक्ता ,वृन्दाबन में पर्दे के पीछे छुपे बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए होती है ,उतनी खुले आम दर्शन देने वाले देवताओं के मंदिरों में नहीं होती )! नाना जी ने फरमाया था :

परदे ने तेरे दीद का ख्वाहाँ बना दिया
जलवे ने चश्मे शौक को हैरा बना दिया

दर्शनोपरांत तो भक्त इतना आनंदित हो जाता है कि वह बेसुध होकर केवल "उसका" नाम ही सिमरता रहता है जिसके दिव्य स्वरूप का दर्शन उसे हुआ है ! नाना जी ने कहा था :

सबको मैं भूल गया तुझ से मोहब्बत करके
एक तू और तेरा नाम मुझे याद रहा
"राद"
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आप कहेंगे कि मैं आपको अपनी इधर उधर की बातों में लगा कर मुकेश जी की कथा से दूर रख रहा हूँ ! भाई क्यूँ करूँगा मैं वैसा कुछ ? मैंने कितनी बार कहा है ,"मैं नहीं लिखता , कोई और लिखवाता है "! मेंरी बात मानिये , मैं पराधीन हूँ !

चलिए हिम्मत करके मुकेश जी और अपनी इस दूसरी मुलाकात की विस्तृत कथा सुनाने का प्रयास एक बार फिर करता हूँ :

वाशरूम से निकलते ही मुकेश जी की नजर ,जान बूझ कर उनके सामने आ खड़े हुए , मुझ "भोला" पर पडी , माहौल बिलकुल वैसा ही बना जैसा किसी शायर ने बयान किया है :

फिर वही दनिस्दा ठोकर खाइए
फिर मेरी आगोश में गिर जाइये
यूं न् रह रह कर हमे तरसाइये

अचानक मुझको सामने देखकर उनकी निगाहों में आया भाव - "आपको कहीं देखा है ",मुझे साफ़ साफ़ समझ में आगया ! मैंने ,देर तक उन्हें अँधेरे में रखना मुनासिब न् समझा ! साल भर पहिले "स्वजन" के वार्षिकोत्सव ( जब हमारा और उनका वह चित्र खिचा था ) का हवाला देकर तथा फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष और फिल्म डिविजन् के चीफ प्रोड्यूसर ,अपने छोटे बहनोई श्री विजय बी. चंद्र साहेब की याद दिलाकर मैंने उन्हें मजबूर कर लिया कि वह मुझसे कहें " हाँ कैसे भूलूँगा आप को , बिलकुल याद है मुझे आप सबकी ! आपकी छोटी बहन, मधू जी के साथ तो मैंने कुछ अरसे पहले एक डुएट भी गाया है "!

उन दिनो H M V कम्पनी मुकेश जी से गवा कर सम्पूर्ण "राम चरित मानस" का एक L.P. Records का सेट बनवा रही थी और मुकेश जी बड़े भाव चाव से उसमे के दोहे और चौपाइया गा रहे थे !लगभग पूरा सेट तैयार भी हो चुका था और मार्केट में उसकी बडी डिमांड थी !
थोड़ी देर खड़े खड़े ही मुकेश जी से उनके समायण गायन की चर्चा करने के बाद मैंने उनसे धीरे से पूछा ,"दादा , आप इतने बिजी हैं , आपको शायद ही कभी दूसरों की गाई चीजें सुनने का मौका मिलता होगा ?"! छोटा सा जवाब दिया उन्होंने " तुम्हारा कहना आम तौर पर तो ठीक ही है ,लेकिन कभी कभी दूसरों के गाने मजबूरन सुनने पड़ते हैं ! भइया किसी खास गाने के लिए पूछ रहे हो क्या ?


मैंने अति संकोच से उनसे सवाल किया " दादा क्या आपने कभी पोलिडॉर की डबल एल पी वाली रामायण - " श्री राम गीत गुंजन " सुनी है ? ! वह कुछ सोच में पड गए ! मैंने फिर कहा " वो वाली , जिसके जेकेट पर श्रीराम ,लक्ष्मण और जानकी के साथ साथ हनुमान जी का चित्र बना है ! " वह फिर थोड़ी देर को कुछ न् बोले लेकिन कुछ पल बाद ,मेंरा हाथ पकड़ कर सुनसान लाउंज के कोने में एक सोफे पर जा कर बैठ गए और बड़े प्यार से मुझे अपनी बगल में बैठा कर बोले " भैया,याद आगया ,ज़रा साँस ले लूँ फिर सुनाऊंगा "



ऊपर उस एल्बम का जेकेट है जिसका ज़िक्र मैंने मुकेश जी से किया था !
मैं भी अब थोडी सांस ले लूँ , इजाजत है न् ?
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क्रमशः
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निवेदक : व्ही . एन् . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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2 टिप्‍पणियां:

  1. काकाजी प्रणाम - आज सारी दुनिया दोस्ती दिवस मनाने में व्यस्त है , ऐसे में आप और मुकेश जी के संस्मरण बहुत ही उपयुक्त लगे !

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  2. bhola जी,
    मुकेश जी से जुड़े आपके संस्मरण बहुत ही आनंददायक हैं .हम भी मुकेश जी के प्रशंसक हैं और उनके बारे में जहाँ भी पढने को मिले पढने में लगे रहते हैं आपके ब्लॉग से ये पढने को मिल रहा है इसलिए और भी अच्छा लग रहा है.थोडा रेस्ट कीजिये और आगे बताइए .
    आपको भी मित्रता दिवस की बहुत बहुत शुभ कामनाएं .

    उत्तर देंहटाएं

महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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