सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 25 जून 2013

मुद मंगलमय संत समाजू

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संत स्वभाव गहोंगो 
 कबहुँक हौं यह रहनि रहोंगो ?

मन में मात्र एक स्वप्न संजोये
कि उनका स्वभाव संतों सा हो जाए



हमारे "बाबू" ने अथक प्रयास एवं अभ्यास द्वारा 
अन्ततोगत्वा "संतत्व" पा ही लिया
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पूज्यनीय बाबू  ने संतसगत से संतों का  स्वभाव ग्रहण किया ! जीवन में केवल एक दिवस अथवा दो दिवस ही नहीं वह  आजीवन "संतों" स दृश्य ही जिए , संतों जैसी रहनी रहे ! संतों के अनुरूप अपना जीवन बनाने की चेष्टा में उन्होंने असंख्य सद्ग्रन्थ पढे ,संत महात्माओं के प्रवचन् सुने, उनका सारतत्व  ग्रहण किया और उसके अनुसार अपने दैनिक जीवन को साधनामय बनाया !

संत समागम एवं सत्संगति के पावन प्रसाद को आत्मसात कर "बाबू"  ने  अपने जीवन का प्रेय ओर श्रेय दोनों ही प्राप्त करने की इच्छा से   अपने अभ्युदय एवं कल्याण का मार्ग निर्धारित किया ! इस राह पर अग्रसर होकर उन्होंने जहाँ एक ओर अपना जीवन दिव्य बनाया वहीं दूसरी ओर हमारे जैसे "निपट गंवार"के जीवन की मैली चादर भी चमका दी ! 

उपरोक्त विषय पर अधिक विस्तार से पाठकों को अवगत कराने के लिए मैं पूज्य "बाबू" के पुत्र तथा उनके शिष्य 
इंजीनीयर श्री अजेय श्रीवास्तव . बी टेक.[इलेक्ट्रिकल] से पाठकों को परिचित करवा रहा हूँ  
  
अजेय जी अधिक समय तक बिरला ग्रुप के "हिंडाल्को" तथा "रेनू सागर" पावर इत्यादि प्रोजेक्य्स से सम्बंधित रहे हैं तथा वहाँ  से रिटायरमेंट के बाद विश्व की विविध विख्यात देसी और विदेशी कम्पनियों के टेक्निकल एवं मेनेजमेंट कंसल्टेंट रह चुके हैं !

  
अजेय जी "बाबू" के शिष्य होने के कारण उनके आत्मिक एवं आतंरिक सद्गुणों के वास्तविक ज्ञाता हैं  तथा उनके आदर्शों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के विषय में हम सबसे अधिक ,"फर्स्ट हेंड" जानकारियाँ रखते हैं; उनसे  प्राप्त  पत्र को मैं यहाँ ज्यों का त्यों उदधृत कर रहा हूँ ! 

संत समागम से "बाबू" ने क्या सीखा 

मैंने पूज्य बाबूजी से  संभवतः सन 2003 के प्रारंभ में " संतों से क्या सीखा ? " लिखने का अनुरोध किया था । वे तब व्यक्तित्व विकास पुस्तक का तीसरा पुष्प लिख रहे थे ! जैसा की उनका style था, उन्होंने मुझसे संतों की लिस्ट बनाने का निर्देश दिया ।कालांतर में जब अशोक दादा ने पूज्य बाबूजी की स्मारिका में श्रद्धांजलि लिखने का निर्देश दिया तो 2003 के होम वर्क के सहारे पूज्यबाबूजी पर संतों के प्रभाव की झलकियाँ लिखी गयीं थी ।

पूज्य बाबूजी ने जो भी संतों से सीखा उसे चार्ट या लेख, अथवा पुस्तक के फॉर्म में लिख कर सबको  प्रार्थना-सत्संग के समय बताया और कथा-प्रसाद के पत्र के साथ लिखा । उनकी punch line  थी -


"जो भी सीखा है, वह यदि साधना,स्वास्थ्य या स्वकर्म की उन्नति में सहायक-उपयोगी नहीं है, तो वह मात्र  बुद्धि का व्यायाम है "

He practiced what he preached. His adaptibility to change was simply amazing. He not only changed his routine but also life style with greater impact for everyone to see. 

एक बात और वे स्वामी शरणानन्दजी के  विचार से सहमत थे कि  इस संसार में 
वस्तु, व्यक्ति (मानव-जीव-जंतु), परिस्थिति के आलावा कुछ भी नहीं है 

In his view, our communication pertains to 'people','events' or 'issues' Although people and events are important; but ISSUES are vital.


वे निरर्थक चर्चा से बचते थे ।

 He was allergic to useless discussions. At times, he would pause the discussions to ask : " Can we NOT do without this ?"

While details of Pujya Babuji's meeting with saints and sages would be very interesting,  taking a cue from the aforesaid thoughts, it would be worth-while to document impact made by these enlightened souls on Pujya Babuji -( My Gurudev) and Shri Ram Parivar .


संतों सन्यासियों के नाम          -      बाबूजी ने उनसे क्या सीखा 


परम सिद्ध्संत गुरुमहाराज महंत }    अरदास , ऋष आश्रम,   रानूपाली गुरुद्वारा,                        
दान प्रवृत्ति, निर्भयता ,

बाबा नारायणराम जी महाराज  }       -अयोध्या तीर्थ के प्रति प्रेम एवं अनेक बार  यात्रा


स्वामी सत्यानन्दजी महाराज          -  अधिष्ठान, अमृतवाणी, रामनाम,ध्यान-जप  साधना, पंचरात्रि सत्संग,
 साप्ताहिक कीर्तन, अमृतवाणी व्याख्या,  श्रीराम शरणम् 

स्वामी शरणानन्दजी महाराज         -   शरणागति पथ, आध्यात्म भाषा, मानव सेवा संघ ,जीवन शैली,


श्री श्री आनन्दमयी माँ                 -   मौन नित्य एकत्व साधना, गृहस्थ का आदर्शजीवन, नाम                                                           


स्वामी शिवानन्दजी महाराज          -    पारिवारिक प्रार्थना, Divine literature, ऋषिकेश तीर्थ यात्रा


स्वामी शांतानन्दाजी सरस्वती         -  Spiritual letters writing,  महामृत्यंजय मंत्र साधना, Spiritual literature for Children, "पढ़ो पोथी में राम" --, नाम-धुन


स्वामी अखंडानन्दजी महाराज        -  
सत्संग भगवत चर्चा कथा , Motivation to renew legal practice ,"
श्री कृष्णाय वासुदेवाय"                                                                  मन्त्र का महातम्य, अपार साहित्य  

स्वामी सत्यमित्रानन्दजी महाराज     -  आध्यात्म  में राष्ट्रप्रेम,गृहस्थ संत का सम्मान, परस्पर स्नेह उदारता ,समंन्वय  परिवार का सामीप्य एवं आदर्श गुरु रूप !                                                                                                             


स्वामी चिन्मयानन्दजी महाराज       -  Discourses in English, गीता ज्ञानयज्ञ , रविवार सत्संग


स्वामी शुकदेवानन्दजी  महाराज       -  परमार्थ निकेतन सत्संग-नियम,बाबा-दादी की स्मृति में कमरा


स्वामी भजनानन्दजी महाराज         -  आसन - प्राणायाम, अनुशासन प्रिय विनोदी स्वभाव


स्वामी प्रकाशानन्दजी महाराज        -   सौम्यता एवं आत्मीयता


स्वामी सदानन्दजी महाराज            -  आतिथ्य, रोचक कथाएँ  तथा संपादक के गुण


श्री मंजुलजी                             -  भजन एवं प्रवचन शैली


श्री दीनानाथ भार्गव ' दिनेश'          -  श्री सत्यनारायण कथा पुस्तक से प्रतिमास पूजाकथा ,' हरिगीता ' से प्रतिवर्ष जन्माष्टमी को सामूहिक गीता पाठ, तथा परिवार के बच्चों द्वारा "श्रीहरि गीता" के नाट्यरूपांतर का मंचन ! 


श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार            -  रामचरित मानस का नियमित पाठ, 'कल्याण' मासिक पत्रिका


श्री राधा बाबाजी                       -  अनुशासन, नवधा भक्ति जीने की प्रेरणा, " रोम रोम का प्यार " आशीर्वाद                                         

 
किलाधीश महंत सीताराम शरणजी  -    "राम परिवार" नाम, राग रागनियों में मानस का गायन तथा राम चरित्र से संबंधित प्रसंगों पर लोक धुनों में रचित , फागुन में होली , सावन में झूले तथा मंगलमय शुभ अवसरों पर बधाई - " बधइयां बाजे आंगने में " का गायन ! 


श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर 'फ़कीर'  - श्री अरविन्द का साहित्य, नैनीताल कैंप, सूफ़ी शायरी व हास्य- विनोद युक्त माहौल                                           


मैंने अपनी सीमित स्मृति से Facts एकत्रित कर, अपनी सीमित बुद्धि से Opinion भी डाल दी है।

इस विषय पर अधिकारिक रूप से तो केवल पूज्य बाबूजी और पूज्य अम्मा ही बता सकते थे।

पूज्य बाबूजी यद्यपि कुछ संत-महापुरुषों से नहीं मिले थे, पर उनके साहित्य और विचार धारा से वे बहुत प्रभावित थे।उनमे स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, श्री अरविन्द एवं गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर सर्वोपरि हैं।


परिवार में भी उन्हें अध्यात्म का पाठ पूज्य दादी, पड़दादी, बाबा एवं नानाजी से पग-पग पर मिला।


उनके role model पूज्य बाबा के अलावा " noble profession " से डॉक्टर साहेब बाबा ( डॉक्टर भगवत सहाय - ग्वालियर राज्य में प्रथम मेडिकल कौलेज  के प्रणेता )और मुरार हाई स्कूल के हेड मास्टर पूज्य श्री पी मुखर्जी साहेब [बाबा ] थे, जिन्होंने हमारे बाबा-बाबू-चाचा तीनों को ही पढ़ाया था और ग्वालियर राज्य द्वारा दिया गया इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ स्कूल का पद ठुकरा दिया था ।


Mukharji "Baba" really moulded the attitude studends. He would say, " I make MAN !"

[ हेड मास्टर श्री मुखेर्जी जी  से सीखी उपरोक्त बात बता कर पूज्यनीय बाबू हम सब से अक्सर कहते थे कि साधक को सतत "अच्छा मानव --[अच्छा इंसान ]" बनने का प्रयास करते रहना चाहिए ] "भोला" 

बड़ों को सादर चरण स्पर्श एवं सभी को जय सीताराम !
आपका शुभाकांक्षी,


अजेय

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इस संदर्भ में यह बताना अनिवार्य सा है कि उपरोक्त  संतजनों के अतिरिक्त मानस मर्मज्ञ अंजनी नंदन शरण जी , मानस के अमर प्रेमी  श्री राम किंकर जी महाराज , स्वामी ध्यानानन्दजी , बाबा नीम करोली ,संत शिरोमणि डोंगरे जी महाराज , श्री श्री देवराह  बाबा, गायत्री परिवार शांति निकुंज हरिद्वार के संस्थापक श्री राम शर्मा जी ,स्वर्गाश्रम के विभिन्न संतजन  कहाँ तक नाम गिनूँ ,समकालीन सभी दिव्य आत्म बिभूतियों के सदैव स्नेही पात्र रहे शिव दयालजी को इनसे  आध्यात्मिक विचारों का आदान-प्रदान करने का सुअवसर मिला,मानव -मूल्यों के विचार रत्न मिले , साधना प्रशस्त करने का पथ मिला  ,जिसे जीवन में चरितार्थ करके निजी  अनुभूति के आधार पर उन्होंने  हम जैसे प्रियजनों के लिए अनुकरण -अनुसरण  करने के तथा जीवन का सर्वांगीण विकास करने के  अनमोल सूत्र  प्रदान किये  !

पुरुषार्थ ,प्रेम ,भक्ति ,न्याय और सत्य की जीवंत  मूर्ति माननीय  श्री शिव दयालजी की मूलभूत मान्यता रही कि संसार की दिव्य विभूतियों के जीवन से  जब भी जहाँ कहीं भी जो सार तत्व , जो  सत्व गुण  सीखने को मिले ,उसे तत्क्षण अपने जीवन में उतारें और साधन धाम मानव जीवन को सार्थक बनाएँ !

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निवेदक: व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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बुधवार, 19 जून 2013

अनंतश्री स्वामी अखंडानंद सरस्वती , माननीय शिवदयाल जी

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अनंतश्री स्वामी अखंडानंद जी महाराज
एवं उनके स्नेहिल कृपा पात्र 
माननीय शिवदयाल जी
(गतांक से आगे) 

प्रियजन ,आपको याद दिलाऊँ कि नवम्बर २००८ में श्री राम कृपा से  हस्पताल में "वेंटिलेटर" के सहारे जीवन दान मिलने पर मैंने "परमगुरु" के आदेश का पालन करते हुए स्वस्थ होते ही २००९ के मध्य से हिन्दी में यह ब्लॉग लेखन शुरू किया था ! तब से आज तक आप सभी स्वजनों की शुभकामनाओं एवं गुरुजन के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से मैं "परमप्रभु" द्वारा निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति हेतु ,अपनी क्षमता के अनुरूप निज अनुभवों तथा संत-महात्माओं के आकलन पर आधारित ऐसे आदर्श व्यक्तियों के सदगुण प्रकाशित करने का प्रयास कर रहा हूँ जिनकी रहनीसहनी,जिनके आचारविचार और सद-व्यवहार के अनुकरण से मानवता का सर्वांगीण विकास सम्भव है ! 

"पूर्व-जन्म के संस्कार, मातापिता की पुन्यायी एवं प्रभु कृपा  से २५-२६ वर्ष की अवस्था में ही मुझे पूज्यनीय "बाबू" -शिव दयालजी जैसे आदर्श गृहस्थ -संत  मिल गये परन्तु स्वाभाविक ही है कि मेरे पास ऐसी दिव्य दृष्टि नहीं है कि उनके  सद्गुणों , आत्मिक दिव्यता एवं आध्यात्मिक पहुँच को उजागर कर सकूं !


 अधमाधम  निर्बुद्धि  मैं  निर्गुण निपट गंवार 
 किस विधि वर्णन कर सकूं उनके सुगुण अपार
(भोला )
,अतः  मैं (भोला ) मदद ले रहा हूँ  श्री शिवदयालजी के सम्पर्क में आये , उनके समकालीन भारत भूमि के उन महान संत महात्माओं का, जिन्होंने  "बाबू" को अति निकट से देखा ,परखा, जांचा और  उन्हें सर्व गुण सम्पन्न साधक एवं गृहस्थ संत  मान कर उनकी भूरि भूरि  प्रशंसा  की ! 

"बाबू" को "आदर्श गृहस्थ  संत" की उपाधि देने वाले संत महात्माओं के नाम की एक लम्बी सूची है ! मैं केवल उन महात्माओं के विचार आपको बताउंगा , जिनसे "मैं" अथवा "कृष्णा जी" स्वयम मिल चुके हैं और जिनके मुखारविंद से हमने स्वयम "बाबू" के विषय में कुछ सुना है ! 

इस क्रम में :  
पिछले आलेखों में मैंने बताया है कि ऋषिकेश के स्वामी शिवानंद जी महाराज [संस्थापक ,"डिवाइन लाइफ सोसाईटी"] ने माननीय श्री शिवदयालजी  को अनेक दशक पूर्व ही "संन्यासी जज" की उपाधि दी थी ! कृष्णा जी स्वामी शिवानंद जी से बचपन में मिल चुकीं हैं ! महाराज की  शिष्या ,साध्वी सन्यासिनी "शांता नंदा जी" से मिलने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ था ! स्वामीजी पूज्यबाबू का बहुत सम्मान करतीं थीं और उन्हें "एक दिव्य महात्मा" कहती थी ! उन्होंने मुझसे ऐसा कहा था !



परमार्थ निकेतन ऋषिकेशके "मुनि महाराज" श्री १०८ स्वामी चिदाननद जी श्री शिव दयालजी  के आदर्श गार्हस्थ जीवन की प्रशंसा  करते नहीं थकते थे ! बाबू को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए उन्होंने कहा : "बाबूजी एक कुटुंब वत्सल गृहस्थ होकर भी सच्चे विरागी संत थे ! बाबूजी निष्काम कर्मयोगी थे ! उनका प्रत्येक कर्म परमार्थ एवं अंतःकरण शुद्धि के लिए होता था ! भगवत गीता का सार उन्होंने "नाम जपता रहूं काम करता रहूं के सूत्र में अनुवादित किया  और इसे जीवन जीने का मंत्र बनाया !"बाबू जी वह ज्योति थे जो जीवन पर्यंत तेज और प्रकाश बिखेरती रही और बुझ कर भी सुगंध दे रही है !"

इनके अतिरिक्त श्री श्री मा आनंदमयी ,श्री स्वामी चिन्मयानंदजी,गीता वाटिका के अनंतश्री राधाबबा ,श्री सत्य साईं बाबा आदि दिव्य आत्माओं ने भी बाबू  को बहुत सराहा है ! हम दोनों [भोला-कृष्णा] को भी इन सभी दिव्यात्माओं से अति निकटता से मिलने का सौभाग्य मिला पर बाबू के विषय में हम कोई चर्चा इनसे नहीं कर पाए ! इतना परन्तु जग जाहिर है कि ये सभी महात्मा बाबू को पहचानते थे ! 
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 "बाबू"  के प्रति अनंतश्री स्वामी अखंडानंद सरस्वती के विचार  तथा उनके द्वारा बाबू का मार्गदर्शन 

( पहले बता चुका हूँ कि वर्तमान काल के प्रकांड वेदान्तिक विद्वान संत शिरोमणि स्वामी सत्यमित्रानन्द जी ने "बाबू" के विषय में हाल में ही यह कहा था कि  "उन जैसे सद्पुरुष कभी कभी ही इस धरती पर आते हैं ")


परन्तु महाराजश्री अखंडानंद जी ने वर्षों पूर्व, संभवतः १०७४-७५ में ही बाबू की उच्चस्तरीय आध्यात्मिक स्थिति के विषय में मुझसे कुछ ऐसे ही शब्द कहे थे !  कैसे ? शायद यह जान कर कि मैं बलियाटिक हूँ और पूरब में बहनोई तथा दामाद को 'पाहुन' कह कर संबोधित करते हैं ,विनोद का पुट दे कर  उन्होंने यह कहा कि - " पाहुन, आपके "बाबू" जैसे महान् गृहस्थ संत यदा कदा ही  मानवता के धार्मिक संस्कारों को परिपक्व करने के लिए  आते हैं " !
अब् आगे की कथा सुनिए :

अपने १ जून वाले ब्लॉग में मैं आपको सन १९७८ में बिरला मंदिर में पूज्य बाबू एवं अनंतश्री अखंडानंदजी सरस्वती महाराज के व्यक्तिगत मिलन की चर्चा कर रहा था ,  

पूज्य  बाबू जल्दी जल्दी कदम बढाकर स्वामीजी के श्री चरणों को स्पर्श करने के लिए झुके तभी  महाराजश्री ने आशीर्वाद देते हुए पूछा "सो अब रिटायरमेंट के बाद आगे का क्या कार्यक्रम बना रहे हो  ,शिवदयाल जी 


वार्तलाप का द्वार स्वामी जी ने स्वयमेव खोल दिया था ! बाबू सोच रहे थे कि " प्रभु कितने कृपालु हैं ? महाराजश्री से वह ही बुलवा दिया जो मैं सुनना चाहता हूँ !" बाते करते करते दोनों बिरला मंदिर के पिछवाड़े वाले उद्यान में एक बेंच पर बैठ गये !  

बाबू ने महाराजश्री के प्रश्न - "अब् आगे क्या करना है ? " के उत्तर में अपना मनोभाव व्यक्त करते हुए  कहा - सोचता हूँ कि शेष जीवन प्रभु के श्रीचरणों की सेवा में व्यतीत करूं और पूर्णतः समर्पित होकर सतत हरि सिमरन करूं ! जिज्ञासुओं को वास्तविक  धर्म का   संदेश दूँ ! महाराज जी अब् तो दिवस का एक एक क्षण ,चौबीसों घंटे हरि भजन करने का मन  है ! 

स्वामीजी  ने अपनी दिव्य दृष्टि से श्री शिवदयालजी  की आध्यात्मिक उपलब्धियों तथा उनके गहन  संतत्व का आकलन किया हुआ था अतएव  मुस्कुरा कर पूछा,  "अति सुंदर विचार है, परन्तु करोगे कैसे ?


फिर अपनी आपबीती सुनाते हए कहने लगे  "शिवदयाल जी , वर्षों पूर्व मैंने भी कुछ ऐसा ही संकल्प कर के घरबार - गृहस्थी का भार  छोड़ कर सन्यास ग्रहण किया था ! परन्तु आज भी  मेरा  वह स्वप्न साकार नहीं हो सका है !   किसी संयुक्त परिवार के मुखिया के सदृश्य  मुझे भी अपना कुछ  न कुछ समय आश्रम के प्रबंधन और नियमन  में व्यतीत करना पड़ता है ! 


शिवदयाल जी ,मेरी दृष्टि में आपका गृहस्थ जीवन हम जैसे सन्यासियों के तपोमय जीवन से कहीं अधिक सन्यासवत रहा है ! लगभग दो दशकों से मैं आपकी साधनामयी दिनचर्या से अवगत हूँ ! विधिवत जाप, ध्यान, सिमरन,भजन ,पूजन् ,मनन , स्वाध्याय के साथ साथ योगासन करना विचाराधीन मुकद्दमों के विषय में गहन चिंतन करना और एकांत में  डीकटोफोन / टेप रेकोर्डर पर पूर्णतः ईश्वरीय प्रेरणा पर आधारित उन  मुकद्दमों के निर्णय लिखाना , मैंने अति निकटता से देखा है ! उसके बाद आपका परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाना आपकी संन्यासवत अनवरत साधना का प्रतीक है ! और हाँ -


पारिवारिक प्रार्थना में आपका प्रभु से ये कहना कि " जो हुआ वह  आपकी आज्ञां से हुआ ,जो होगा वह भी आपकी आज्ञा और कृपा से होगा और उसमे ही हमारा कल्याण निहित होगा ", इसका द्योतक है कि आप पूर्णतः समर्पित हैं , पूर्णतः शरणागत हैं ! +आप सभी कार्य "राम काम" मान कर करते हैं , कार्य करते समय सतत नाम जाप करते हैं और हर क्षण आप अपने प्यारे प्रभु को अपने अंग-संग अनुभव करते हैं ! आपके आचार ,विचार आपका व्यवहार  ईशोपासना है ,प्रभु को समर्पित है ! 


आज की परिस्थिति में ,आपको  इस सत्य को स्वीकार करना होगा कि इतने वर्षों से जिस व्यवसाय को "राम -काज" मान कर करते आये हो वह  अब आपका सहज स्वभाव बन गया है !

बाबू ने उत्सुकता से पूछा, "फिर क्या करूं  ?" 


स्वामीजी ने सीधा सा जवाब दिया ; सुप्रीम कोर्ट में एपियर होने के लिए अपना विधि लायसेंस रिन्यू कराओ और पुनः प्रेक्टिस शुरू कर दो ! सेवा भाव  से वकालत करो !वकालत से अर्जित आय को परोपकार में लगाओ ,दीन जनों के केस मुफ्त करो  ,स्त्री बाल-शिक्षा एवं व्यक्तित्व के विकास हेतु तन मन धन से जुट जाओ !   


वकालत से कमाया धन अपनी गृहस्थी के संचालन पर मत व्यय करो , अपना एवं अपने परिवार का गुजारा अपनी पेंशन से करो !


बाबू की मूलभूत  मान्यता  स्वामीजी की धारणा के ही अनुरूप  थी ! यदि वह थोड़ा भी राजनीतिक जोर लगाते तो उन्हें कोई न् कोई कमीशन किसी न् किसी प्रदेश की गवर्नरी मिल ही जाती ! [कदाचित ऑफर भी हुई थी] पर उन्होंने अस्वीकार किया !

ऐसे में महाराजश्री की ,प्रेरणादायी मंत्रणा ने उनके विचारों को और भी दृढ़ कर दिया ! सम्भवतः इसी विचार को पूज्य बाबू ने "सुखी सार्थक जीवन"  में (पृ .१५० ) उजागर किया और कहा है कि "वास्तव में संन्यास कोई  पृथक आश्रम नहीं है अपितु त्याग ,सेवा और प्रेम से परिपूर्ण वृत्ति का नाम सन्यास है !"

इस आत्मीय वार्तालाप के अनंतर  स्वामीजी के मार्मिक एवं युक्तिपूर्ण सुझाव को पूज्य बाबू ने शिरोधार्य  किया ! उन्होंने पुनः वकालत चालू की और सुप्रीम कोर्ट जाने लगे !

जीवन भर के  चिंतन -मनन के क्रियात्मक अनुभव की नींव पर उन्होंने  व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की शिक्षा की योजना बनाई !,पुस्तकों के माध्यम से आध्यात्मिक ,सांस्कृतिक ,धार्मिक सुसंस्कारों के व्यावहारिक स्वरूप का प्रचार  -प्रसार का कार्य जारी रखा ! जन जन में व्यक्तित्व विकास की  जागृति के प्रयोजन से,आध्यात्म -तत्व से सम्बन्धित रचनाओं  के साथ साथ विकसित व्यक्तित्व , सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास ,पुष्प १,पुष्प २ ,पुष्प ३ ,तथा सुखी सार्थक जीवन आदि अनेक पुस्तकों  की रचना की ; जिन में से कुछ सस्ता  साहित्य मंडल द्वारा प्रकाशित हुईं  !


पूज्य बाबू   की रचनाओं में परमार्थ और व्यवहार दोनों का   समन्वय  करने की  एक अद्भुत कला निहित  है ; जिसके आधार पर कोई भी गृहस्थ  आंतरिक जगत के  विज्ञान से ऊर्जा ग्रहण कर  संत के समान सात्विक जीवन जी सकता है !
किसी महापुरुष का वक्तव्य है कि----- "जिस जीव को 'भगवद कृपा' से शास्त्रों का  समुचित ज्ञान होता है और जो उस ज्ञान के अनुरूप जीवन जीकर अपना सर्वांगीण विकास कर लेता है उस जीव को ,जीते जी , धरती पर  ही  परम- आनंद, परम-शान्ति , उच्चतम सफलता , सुख-समृद्धि ,विजय , विभूति आदि बिना मांगे ही प्राप्त हो जातीं हैं और वह  असाधारण संतत्व का  धनी  हो जाता  है !   

हमारे "बाबू", माननीय जस्टिस शिवदयालजी ऐसे ही आदर्श गृहस्थ संत थे !


 वारे जाऊं भक्त  के जिसे भरोसा राम !
मनमुख में रख राम को करे राम का  काम !!
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निवेदक - व्ही.  एन..  श्रीवास्तव  "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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बुधवार, 12 जून 2013

स्वामी अखंडानंद जी द्वारा "बाबू" का मार्ग दर्शन

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अनंतश्री स्वामी अखंडानंद जी महाराज
एवं
उनके स्नेहिल कृपा पात्र 

                                    माननीय शिवदयाल जी श्रीवास्तव
गतांक - (१ जून २०१३ के अंक) से आगे 
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गृहस्थ संत माननीय श्री शिवदयालजी तथा अनंतश्री स्वामी अखंडानंदजी महाराज के  पारस्परिक सम्बन्ध अत्यंत घनिष्ट एवं आत्मीय  थे ! जब भी अवसर मिलता पूज्य बाबू महाराजश्री से जबलपुर, वृन्दावन , बम्बई तथा ऋषिकेश के आश्रमों में जहां कहीं भी स्वामी जी होते,मिलते रहते थे ! केवल बाबू ही नहीं अपितु समस्त " राम परिवार " ही महाराजश्री की विशिष्ट कृपा से कृतकृत्य था ! और जैसा आप जानते हैं प्यारे प्रभु की असीम अनुकम्पा से तथा कदाचित अपने पूर्व जन्म के शुभ संस्कारों के फलस्वरूप, इस अधमाधम प्राणी "भोला" को भी परम पूज्य बाबू के इस सत्संगी परिवार में शामिल होने का अवसर मिल गया था ! अस्तु पूज्य बाबू की शुभ प्रेरणा से मुझ नाचीज़ को भी महाराजश्री के दर्शन एवं उनके सानिध्य का लाभ तो होना ही था और हुआ भी ! 

२२ मई वाले आलेख में मैंने अपनी एक कहानी शुरू की थी जिसमे बम्बई में पहली बार  "मुकेश नाईट" ,"रफी नाईट" आदि से टक्कर लेने हेतु कुछ आस्तिक महापुरुषों द्वारा आयोजित, सर्व प्रथम "भगवान राम नाईट" के विषय में लिखा था !  उस ब्लॉग में मैं असल में जो विशेष बात आपको बताना चाहता था वह अधूरी रह गयी थी! अस्तु मैं सक्षेप में पहले वह अधूरी कहानी पूरी कर लूँ उसके बाद , पूज्यनीय बाबू एवं स्वामी अखंडानंद जी के पारस्परिक स्नेहिल सम्बन्ध की बहुत सी बातें बताउंगा ! तो सुनिए -

१९७०-७१  की बात है इसलिए ,ठीक से याद नहीं कि वह साउथ बम्बई का " भूलाभाई देसाई  सभागार" था अथवा "बिरला मातुश्री सभागार" - जो भी रहा हो, निश्चित समय पर उस विशाल सभागार की बत्तियाँ बुझ गयीं ! स्टेज पर हम सब 'कलियुगी भक्तों'- भजनीक कलाकारों पर तेज रोशनी की बौछार पड़ने लगी , हमारी आँखें चौधिया गयीं फलस्वरूप हमे स्टेज के अतिरिक्त बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था ! 

हाँ तो फिर - ओमकार के दिव्य शंखनाद से कार्यक्रम का श्रीगणेश हुआ ! तत्पश्चात हमने संत - महात्माओं की आध्यात्मिक भावनाओं से युक्त रचनाओं के गायन द्वारा " चौरासी लाख विभिन्न योनियों में भटकने के बाद , ईश्वरअंश अविनाशी जीव द्वारा नश्वर पंचतत्व-निर्मित-मानव-काया में प्रवेश करने से लेकर उसके वहाँ से बहिर्गमन तक की समग्र जीवनयात्रा का विवरण प्रस्तुत किया "!

कबीर के शब्दों में कपास से सूत कातने ,सूत से झीनी झीनी चदरिया बुनने ,उसे रंगने,उस पचरंगी चुनरी को जीवन भर ओढने, ठगनी माया के कुप्रभाव से उसे मैला करने तथा संतों के सत्संग में आत्मज्ञान के साबुन से उस पंचरंगी चुनरिया के धुल जाने तक की सारी कथा हमने धीरे धीरे अपने गायन द्वारा उस मंच पर प्रस्तुत की ! 

तुलसी के इस सारगर्भित निष्कर्ष से कि अविनाशी जीव ईश्वर अंश है -[ "ईश्वर अंश जीव अविनासी ,चेतन अमल सहज सुखरासी"] से हमारा कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ और , "कबहुक कर करुना नर देही , देत ईस बिनु हेतु सनेही " होता हुआ उस स्थिति तक गया जहां जीव का मानव तन सांसारिक सुखों से खेलते खेलते अपने जनक परमपिता को भुला कर अतिशय दुःख झेलने लगा ! अंत में सत्संगो से आत्मज्ञान मिलने पर वह अपने मन को कोसता और कहता है " रे मन मूरख जनम गवायो ! कर अभिमान विषय सो राच्यो , नाम सरन नहीं आयो " [सूरदास] ! इस आत्म ज्ञान के होते ही जीव पर "प्रभु" की विशेष कृपा हो जाती है , उसका भाग्योदय होता है और उसे सद्गुरु की प्राप्ति होती है ! वह कह उठता है " भ्रम-भूल में भटकते उदय हुए जब भाग , मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की जाग " [स्वामी सत्यानन्द जी] ! गुरु उसे बताते हैं कि "जन्म तेरा बातों ही बीत गयो-तूने अजहू न कृष्ण कह्यो" [कबीर] ! गुरु आदेश से वह परम पिता से प्रार्थना करता है -" तू दयालु दीन हौं तु दानी हों भिखारी - हौं प्रसिद्ध पातकी तू पाप पुंज हारी "[तुलसी] अपने मन को आदेश देता है "भज  मन राम चरण सुखदाई" तथा "श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन हरन भव भय दारुणं" [तुलसी] और अन्ततोगत्वा जीवन मुक्त होजाता है ! 

कार्यक्रम के अंत में हमने श्री हनुमान चालीसा गाई ! जी हाँ 'हमारे राम जी से राम राम कहियो जी हनुमान ' की टेक वाली ही ! सभी दर्शक हमारे साथ तालियाँ बजा कर झूम झूम कर हनुमान चालीसा गा रहे थे ! हनुमान जी के दिव्य प्रताप से सभागार का वातावरण पूर्णतः राम मय हो गया था ! 

तभी अचानक ही संचालकों ने स्टेज पर पड़ने वाली लाईट कुछ कम करवादी जिससे  हमारी आँखों की चकाचौन्ध भी कम हो गयी और हमने देखा कि एक विशेष "बेबी" फ़ोकस  लाईट" घूमती फिरती उस विशाल हाल के "सेंट्रल आइल" के बीचो बीच ,ठीक हम सब भजनीकों के सन्मुख एक बड़ी सी आराम कुर्सी पर विराजमान  एक  भगवा वस्त्रधारी तेजस्वी  देव मूर्ति पर पडी ! वह महात्मा अति एकाग्रता से ह्नुमान -चालीसा गायन में हमारा साथ भी दे रहे थे ! 

प्रियजन क्यूंकि इस कार्यक्रम के पब्लिसिटी फ्लायर्स , पोस्टर्स तथा विज्ञापनों में कहीं भी यह नही कहा गया था कि कोई विशेष संत महापुरुष हमारे इस कार्यक्रम को अपने आशीर्वाद से नवाजेंगे ,हम यह नहीं जानते थे कि वह महापुरुष कौन हैं !  प्रियजन विश्वास करें कि मैं कतई नहीं जानता था कि सभागार में पूरे कार्यक्रम के दौरान हमारे सन्मुख  मूर्तिवत समाधिस्थ से बैठे  वह तेजस्वी महापुरुष कोई और नहीं वरन अनंतश्री स्वामी अखंडानंदजी महाराज ही थे !

प्रियजन मेरा यह कैसा सौभाग्य था कि जिन दिव्य विभूति के दर्शनार्थ मैं कभी कानपूर की धूलभरी सड़कों पर मौसम की उग्रता झेलता हुआ सायकिल पर घंटों भटकता रहता था , वह महात्मा  आज स्वयम हमारे सन्मुख विराजमान थे  और उनकी अनंत ममतामयी ,करुणामयी कृपा दृष्टि हम सब गायकों पर लगातार डेढ़ घंटे तक अपना आशीर्वाद   बरसाती रही थी ! 

महाराजश्री की उपस्थिति से संचरित ऊर्ध्वगामी ऊर्जा का प्रताप था कि उस सायं सभी श्रोता अपनी सुधबुध बिसरा कर भजन के आनंद सागर में आकंठ डूब गए ! मुझे अभी भी याद है कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद कितने ही क्षणों तक श्रोता स्तब्ध से अपनी सीटों पर बैठे रह गये थे  ! हाल में "पिन ड्रॉप" शान्ति बिफरी रही !  

मेरे जीवन का वह एक अविस्मरणीय  दिन् था ! पाठकजन ,उस सायं मेरे जैसे सब विधि हींन् दीन जन को  "निज जन जानि राम -- संत समागम दीन "!  यह वह शाम थी जब केवल मैं ही नहीं वरन सभी गायक  ,सभी श्रोता एवं आयोजक  महाराजश्री के आकस्मिक दर्शन से धन्य धन्य हो गये थे !

मेरे प्रभु मुझपर कितने कृपालु हैं उसका अंदाजा आपको दे न् सकूंगा ! प्रियजन मेरा मुम्बई प्रवास मेरे जीवन का वह मधुर अंश था जब प्यारे प्रभु ने मुझे "छप्पर फाड़ कर" अपनी करुणा से विभूषित किया ! मुम्बई प्रवास के दौरान ही प्यारे प्रभु ने मुझे महाराजश्री से मिलने और उनकी असीम कृपा प्राप्ति के कितने ही अन्य सुअवसर भी प्रदान किये ! महाराजश्री से मिलन का एक सुअवसर जिसमे मुझे अतिशय आनंद की अनुभूति हुई उसका विवरण आपको भी  सुनाना चाहता हूँ ! सुनिए - 

सन १९७१ में ही  सौभाग्यवश ,परमपूज्य बाबू किसी निजी कार्य से मुम्बई पधारे ! उन दिनों महाराजश्री मुम्बई में ही थे ! अवकाश मिलते ही बाबू ने महाराजश्री से मिलने का कार्यक्रम बनाया और 'मालाबार हिल'स्थित महाराजश्री के "विपुल" वाले आश्रम में हम सब - मैं ,मेरी बहिन  माधुरी और मेरे बहनोई श्री विजय बहादुर चन्द्र के साथ उनके दर्शनार्थ गये ! हम सब कितने भाग्यशाली थे कि उनके श्री चरणों के निकट बैठ कर परम शांति का अनुभव करते हुए उनके अमृत तुल्य वचनों का आनंद उठा सके ! 

उस दिन की सबसे आनंदप्रद बात यह रही कि महाराजश्री ने जहां एक ओर हमे अपनी सरस और सरल भाषा में आध्यात्मिकता युक्त जीवन जीने की कला बताई वहीं दूसरी ओर उन्होंने स्वयम अपने हाथों से परस कर हम सब को अति सरस भोजन भी कराया ! मुझे याद है कि महाराजश्री ने अपने चौके  में ही बैठा कर  बड़े प्रेम से आग्रह कर कर के हमे अन्य व्यंजनों के साथ ,"सेब" [एपिल] की पूरियां और लौकी तथा दही आलू की तरकारी खिलाई थी ! जीवन में पहली और अंतिम बार हमने सेव की अमृत-रस-भरी   पूरी का प्रसाद पाया ! गदगद हो जाता हूँ जब याद आती है, उनकी वह मनोहारी छवि जिसमें  वह झुक झुक कर प्यार से मुस्कुराते हुए  हमारी थाली में भोजन परोसते थे !

सन १९७५ नवम्बर में गयाना [दक्षिण अमेरिका] जाने से पूर्व हम सपरिवार उनके दर्शन करने तथा उनके आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु उनसे मिले ! उस दिन महाराजश्री ने मेरे ज्येष्ठ पुत्र राम रंजन को आशीर्वाद स्वरुप 'श्री राम दरबार'  का एक मनोहारी चित्र प्रदान किया ! राम रंजन ने उस चमत्कारिक चित्र में अंकित अपने इष्ट की क्षत्र छाया में आजीवन आशातीत सफलता पाई ! स्वामीजी की इस अहैतुकी कृपा के लिए मेरा रोम रोम उनके प्रति कृतज्ञ  है ! 

पूज्य बाबू के सौजन्य से ही मुझ जैसे क्षुद्र प्राणी को इन देवतुल्य संतात्मा महाराजश्री से इतना प्यार-दुलार मिला तो स्वयम बाबू पर महाराजश्री की कितनी कृपा होगी ,यह  जानने के लिए अगला आलेख पढ़ें !
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क्रमशः 
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निवेदक : व्ही .  एन .  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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ख राम को करे कर्म से काम !

शनिवार, 1 जून 2013

अनंतश्री स्वामी अखंडानंद जी एवं चीफजस्टिस शिवदयाल जी

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अनंतश्री स्वामी अखंडानंद जी महाराज
एवं
उनके स्नेहिल कृपा पात्र
माननीय शिवदयाल जी श्रीवास्तव
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"अब् मैं नाच्यों बहुत गोपाल" 
कान्हा तुमने बहुत नचाया बड़ा मज़ा नाचन में आया 

बरसे अगणित पुष्प गगन से , रासामृत भी  छम  छम   बरसा !!
ढांक दिया सुमनों ने तन को  , मन-मरुथल  रसकण को तरसा !!
["भोला" ]
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[ गतांक से आगे ]

१९७८ में मध्य प्रदेश उच्चन्यायालय के सम्मानीय चीफ जस्टिस पद से रिटायर होने तक हमारे पूजनीय "बाबू" -(जस्टिस  शिवदयालजी) ने , जहां एक ओर आवश्यकतानुसार सभी भौतिक सुविधाओं का सुख प्राप्त कर लिया था , दूसरी ओर उनके "मन" में  एक विशेष कसक शेष रह गयी थी ! उनका मन अतृप्त  था ! मरुथल सा प्यासा उनका मन "प्यारे प्रभु" के दर्शनार्थ अति व्याकुल था ! उनका मन "प्रभु-मिलनामृत" पान को तरस रहा था ! 

पहली मार्च १९७८ , रिटायरमेंट के पहले दिन  उनकी यह पिपासा चरम छू रही थी  !

तब तक सभी जंजीरें टूट गयीं थीं ! सब बेटे बेटियाँ ,सभी बहनें-बहनोई ,भाई भतीजे तथा अन्य स्वजन भली भाँति अपने अपने जीवन में  व्यवस्थित ('सेटेल') हो गये थे ! 'भैया'  पिताश्री  द्वारा सौंपी सारी ज़िम्मेदारियाँ   निभा कर वह अब् घर-द्वार-ब्यापार के सभी बन्धनों से  पूर्णतः  मुक्त हो गये थे !

६५ वर्षों तक अधिकाँश समय जीविकोपार्जन में लगाने के बाद  जीवन के शेष दिन वह व्यर्थ नहीं गंवाना चाहते थे ! बचे हुए पूरे समय का सदुपयोग वह अपने इष्ट - प्यारे प्रभु की उपासना में लगाना चाहते थे ! उनका मन चाहता था कि वह गुरुजनों द्वारा निर्धारित और निर्देशित "राम  काम" एवं  "आस्तिकता के प्रचार प्रसार"  में लग जायें  !

ऎसी स्थिति में सद्गुरु से परामर्श की आवश्यकता थी !

सौभाग्यशाली महापुरुषों के जीवन में आवश्यकता पड़ते ही ,ऐसे सिद्ध संत स्वयमेव प्रगट हो जाते हैं जो कठिनाइयों में न केवल उनका मार्गदर्शन करते हैं अपितु उनका हाथ थाम कर अंधियारी डगर में पड़े अवरोधों से बचा कर उन्हें आगे भी  बढाते हैं ! 

हम आप जैसे साधारण प्राणियों के मार्ग दर्शन हेतु भी हमारा प्यारा प्रभु समय समय पर गुरुजनों को भेजता है - परन्तु दुर्भाग्यवश हम उन्हें पहचान नहीं पाते , परन्तु -

बाबू ,जिन्होंने अपने दैनिक प्रार्थना के द्वारा राम परिवार के एक एक सदस्य और सब स्वजनों और सगे सम्बन्धियों को यह सिखाया था कि उन सबके जीवन में " भला या बुरा जो कुछ भी भूतकाल में हुआ ,जो वर्तमान में हो रहा है और जो भविष्य में होगा वह केवल "प्यारे प्रभु" की आज्ञा और कृपा से ही हुआ है ,हो रहा है और आगे भी होगा ! 

जिस व्यक्ति की मूलभूत मान्यताओं के  प्रभाव से उसके समग्र परिवार पर इस सोच की गहरी नीव पड़ गयी हो; वह व्यक्ति स्वयम कैसे,कभी भी दुखी  और निराश हो सकता है !  हमारे बाबू वह व्यक्ति विशेष थे जो "हार" एवं "नैराश्य" को भी प्यारे प्रभू द्वारा उन्हें भेंट किया हुआ सौभाग्य ही समझते थे ! 

ये न सोचें कि उनपर आपदायें -विपदाये पड़ी ही नहीं !प्रियजन .विपदा  पड़ीं और उन्होंने झेलीं भीं परन्तु वह उनसे विचलित नहीं हुए अस्तु पूरी तरह सुरक्षित रहे ! उनका बाल भी बांका नहीं हुआ इन आपदाओं से  !

 ऐसे विशेष सौभाग्य के कारण ही उन्हें आजीवन ,(आपत्काल में भी) बड़े बड़े सिद्ध संत-महापुरुषों की छत्रछाया प्राप्त होती रही; सतत सत्संगत मिलती रही और उनकी चेतना एवं विवेक का विकास सही दिशा में होता रहा !  संतों के निदेशानुसार चल कर उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अति सात्विकता से 'साधनावत' जिया और वह भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनो ही क्षेत्रों में सफलता  के शिखर छूते  रहे !  

सेवानिवृति के बाद पूरी तरह मन बना कर कि अब् तो कोई विशेष राज्य-प्रतिष्ठित  कार्य -भार  नहीं लेना है पूज्य बाबू मन ही मन एक ऐसे सन्यासी संत के मार्गदर्शन की तलाश में लग गये जिनके पथ -प्रदर्शन से वे  आध्यात्मिक -यात्रा के चरम शिखर पर पहुँच सकें , सन्यास -वृत्ति को आचरण में ढाल  सकें ,गृहस्थ संत सा जीवन जी सकें ! 

यद्यपि वे  प्रज्ञाचक्षु स्वामी शरणानंद जी के मानव सेवा संघ से ,  स्वामी शिवानंदजी की डिवाइन लाइफ सोसाइटी से , स्वामी चिन्मयानंद के चिन्मय मिशन - से  ,स्वामी सत्यानंदजी  की साधनामय -जीवन जीने की पद्धति से ; परमार्थ -निकेतन ;अरविन्द आश्रम आदि से  पूरी तरह जुड़े हुए थे फिर भी मन संन्यासी- वृत्ति की ओर प्रेरित हो रहा था ,हिचकोले खा रहा था !,

बाबू इस उधेड़ बुन में पड़े थे कि ,सदा की भाँति संकल्प-विकल्पों के जाल से  उन्मुक्त करने के लिये  सौभाग्य ने उनका द्वार एक बार फिर खटखटा ही दिया !इसे कहते हैं प्रभु की अहेतुकी कृपा :--कैसे बरसी --सुनिए ---
   
सेवा निवृत्ति  के बाद बाबू दिल्ली में अपने छोटे बेटे अनिल के साथ रहने लगे जहां पर उनकी भौतिक सुख समृद्धि  पूर्ववत बनी रही पर  उनका 'मन -मरुथल' प्यासा का प्यासा ही रहा और वह अपनी पिपासा तृप्त करने वाले जलाशय की खोज में लग गये ! 

तभी सौभाग्य से आशा की एक किरण उनके अँधेरे मन में  सहसा कौंध गयी ; कूप  स्वयम चल कर प्यासे के पास आया !  विचार कर देखिये कितना भाग्यशाली था वह "तृषित" मन- मरुथल ? ऐसा हुआ कि --


एक दिन संयोगवश बिरला मंदिर में पूज्य बाबू  की भेंट अनंतश्री स्वामी अखंडानन्द जी महाराज  से हो गयी !  हाव भाव एवं वाणी द्वारा अपनत्व की झडी लगाते महाराजश्री ने अपनी नैसर्गिक मुस्कान के साथ दूर से ही प्रश्न किया  -

" हो गये मुक्त ,व्यावसायिक  बन्धनों से जज साहेब , बधाई हो ,बहुत बहुत बधाई हो "

बाबू सोच रहे थे , "क्या बात है ? प्यारे प्रभु ने इतनी जल्दी मेरी फरियाद सुन ली ! मेरे मार्गदर्शक गुरुदेव को मेरे सन्मुख उपस्थित कर दिया ! मेरा जीवन धन्य हो गया " 

क्रमशः
प्रियजन , आशा है, रामकृपा से, अगले अंक के प्रकाशन में विलम्ब नहीं होगा 
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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