सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
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आज का आलेख

मंगलवार, 29 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 2

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अनुभवों का रोजनामचा 
नीम करौली बाबा 

(गतांक से आगे )

ट्रेन में बैठे सरकारी अधिकारी महोदय परिस्थिति से अवगत हो चुके थे ! वह इंजिन को निश्चल करके रेल गाड़ी को रोक देने वाले उस देहाती व्यक्ति की दिव्य शक्ति और अद्भुत सिद्धियों से भी परिचित थे !उन्होंने ट्रेन के गोरे गार्ड को उस सिद्धपुरुष की असीमित शक्ति के विषय में समझाने का भरपूर प्रयत्न किया जिसमें उन्हें  काफी दिक्कत भी हुई लेकिन ५-७ मिनिट की बहस के बाद अन्ग्रेजियत का नकलची वह देसी टी टी ई और वह एंग्लो इण्डियन गार्ड उनकी सलाह मान कर उस जगह तक गये जहाँ जाने की सलाह वह सरकारी अधिकारी उन्हें दे रहे थे !

रेल की पटरी से अलग चौरस भूमि पर ,एक नीम के पेड़ के नीचे एक साधारण किसान सा दीखने वाला वह व्यक्ति शांति  से बैठा मस्ती में कीर्तन कर रहा था :

दीन बंधू दीना नाथ डोरी मेर्री तेरे हाथ 
डोरी मेरी तेरे हाथ लाज मेरी तेरे हाथ 
मेरे राम तेरे बिन देगा कौन दास का  साथ 
दीन बंधू दीनानाथ आय बचाले मेरी लाज 
डोरी मेरी तेरे हाथ ============

ग्राह सों गज लियो छोड़ाई , द्रोपदी की लाज बचाई ,
हमरी बारी रहे लोकाई , कुञ्ज बनन  में आज ,
दीन बंधू दीना नाथ लाज मोरी तेरे हाथ ,
डोरी मेरे तेरे हाथ =============

( बाबा का पारम्परिक कीर्तन संशोधित ) 

गोरा गार्ड और टी टी ई जब वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा पेड़ के नीचे बैठा ,धूनी रमाये एक मस्त सा देहाती जिसके मुख मंडल पर एक अद्भुत ज्योति और स्तम्भित कर देने वाली    अपूर्व शान्ति थी ! उस साधारण से दिखने वाले देहाती के असाधारण व्यक्तित्व ने उन्हें सम्मोहित कर लिया ! वे कुछ क्षण के लिए ठगे से खड़े रह गये  ! सुधि आने पर दोनों ने उस व्यक्ति को प्रणाम किया ! वह व्यक्ति अपनी स्वाभाविक आडम्बर रहित उदासीनता के साथ मस्ती में झूम झूम कर हरि कीर्तन की धुन गुनगुनाता रहां ! रेल अधिकारी कुछ भी कहते उत्तर में  वह व्यक्ति ऊपर बाहें फैला कर बड़ी तन्मयता से केवल इतना ही कहता रहा --"डोर मेरी तेरे हाथ , दीन बन्धु दीना नाथ ,लाज मेरी तेरे हाथ " ! इस बीच टी. टी. ई. उनसे बोलता रहा लेकिन ऐसा लगा उस व्यक्ति ने उसकी एक भी बात नही सुनी !   

अच्छी खासी भीड़ जमा हो गयी वहाँ ! जनता में से किसी ने टी टी ई के कान में कुछ कहा
जिसके बाद उसने अपनी वर्दी वाली टोपी उतार कर अपना सिर धूनी रमाये व्यक्ति के चरणों पर रख दिया ! वह दिव्य स्वरूपवान अबोध एवं सहज बालको से हावभाव स्वभाव वाला व्यक्ति बिलकुल अप्रभावित अडिग ज्यों का त्यों बैठा रहा ! तभी यात्रियों में से एक ने उस व्यक्ति के पास जा कर कहा " भैया लक्ष्मण दास , सुन लो न ,कि क्या कह रहे हैं टिकट बाबू !" अपने गाँव के जमुना परसाद की जानी पहचानी आवाज़ सुन कर जैसे उस व्यक्ति की तन्द्रा टूटी ! आँखे खोल कर उसने चारों ओर देखा और फिर उसने टिकट बाबू की पूरी बात सुन ली !

उत्तर में उस साधारण से दिखने वाले महात्मा ने कहा " हम का करी बाबू , गाड़ी तो तुम चलावत हो , तुम्हार मर्जी जिनका चाहो चढाओ ,जिनका न चाहो उतार देव, जब चाहो जहाँ चाहो रोकि दो , जहाँ न चाहो न रोको ! मालिक हो भाई आप तो ! दिन दिन भर इन्तिज़ार के बाद गाड़ी आवत है, कभू रुकत है कभू नाही रुकत है ! गाँव वालन के तकलीफ का कोऊ पूछ्न्हार नाहीं है ! गाड़ी आगे बढ़ावा चाहत हो तो इहाँ, बिलकुल इहाँ जहाँ हमार चिमटा  गड़ा है नीवं डारो करोरी ईटन की और इहें टेशन बनवाओ ,ई हाल्ट वाल्ट नाहीं चली "

तब तक पहले दर्जे में बैठे वह सरकारी अफसर भी वहाँ आगये ! रेल के गार्ड से बात करके  उन्होंने विश्वास दिलाया कि वह जिला मुख्यालय और कमिश्नरी के द्वारा सरकार और  रेल कम्पनी को चिट्ठी लिखवायेंगे और साल  के अंत तक वहां स्टेशन बन जायेगा !

आस पास के गाँव के यात्री प्रसन्न हो गये ! गार्ड ने सीटी बजाई ! सब यात्री यथास्थान चले गए ! हरी झंडी दिखाई ! इंजिन ने भी आवाज़ लगाई ! पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई ! एक बार फिर सलाह मशविरा हुआ ! पता चला कि वह महात्मा तो गाड़ी में चढ़े ही नहीं ! गार्ड और टी टी ई पुनः दौड़ कर उनके पास गये ! उन्हें आदरसहित  रेलगाड़ी में बिठाया ! उनके बैठ जाने के बाद गार्ड ने एक बार फिर सीटी बजाई , झंडी दिखाई , इंजिन ने भी तीन बार चलने का ऐलान किया , और गाड़ी चल भी दी !  गाड़ी के हर एक डिब्बे में " बाबा नीम करोरी" के जयकार की ध्वनि गूँज गयी !

इस घटना के बाद यह दिव्य गुण सम्पन्न संत जिन्होंने अपनी  अनूठी  सिद्धि के बल पर शक्तिशाली रेलवे इंजिन को घंटो के लिए निकम्मा कर दिया समस्त विश्व  में "बाबा नीव् करोरी" के नाम से विख्यात हुए ! भाषा के हेर -फेर से वे कहीं कहीं नीम करोली बाबा के नाम से भी पुकारे गये !

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श्रीहरि प्रेरणानुसार कल आगे बढ़ेंगे ! आज इतना ही !
निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला" 
सहयोग : श्रीमती (डोक्टर) कृष्णा "भोला" श्रीवास्तव 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आज समय मिलने पर नीमकरोरी बाबा की
    पूरी कहानी पढी । काफ़ी रोचक लगी ।
    आपका आभार ! श्रीवास्तव जी ।

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  2. बहुत अच्छी लगी बाबा की महिमा यहाँ पढना.आभार.

    उत्तर देंहटाएं

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