सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

रविवार, 29 जनवरी 2012

"बच्चन जी" का गीत [२] : गायक - "भोला"

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क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?
[बच्चन]

आपको बता चुका  हूँ कि कैसे ,आज से तीन  वर्ष पूर्व हमारे "प्यारे प्रभु" ने भारत के एक   सुप्रसिद्ध होस्पिटल के 'क्रिटिकल वार्ड' में ' निर्जीव से पड़े आपके इस स्नेही स्वजन को लाइफ सपोर्ट' के सहारे,'परमधाम' के प्रमुख द्वार से 'बैरंग' लौटा दिया और साथ में तभी यह फरमान भी जारी कर दिया कि " वत्स ,जीवन के शेष दिवसों का सदोपयोग करो ! अपनी आत्म कथा लिख डालो "! सो, लगभग दो ढाई वर्ष से आत्म कथा लिख रहा हूँ !

स्वजनों , १६ जुलाई १९२९ को मेरे जन्मोपरांत ,ग्राम- 'डोकटी बाजिदपुर' ,जिला- 'बलिया' [यू पी] ,के तथाकथित प्रकांड विद्वान ज्योतिषी पंडित रमेसर पांडे द्वारा बनाई गई मेरी जन्मकुंडली में "चन्द्र" गृह - "तुला" राशि में स्थित दिखाया गया और तदनुसार  उस राशि के आधार पर मेरा राशिनाम - "तुलसी" लिखा गया !

प्रियजन ,मेरे उपरोक्त कथन से ,ये न सोच बैठना कि आपका यह स्नेही सखा - 'भोला'', किसी भांति , मानसकार रामभक्त तुलसीदास जी से  बराबरी करने का अहंकारिक प्रयास कर रहा है ! ऐसा कुछ नहीं है भैया !

आपको याद ही होगा कि मैंने निज "अहंकार" का "केचुल", १९७४ में ही उतार कर , श्रीश्री माँ आनंदमयी के आदेशानुसार सदा सदा के लिए उनके श्री चरणों पर अर्पित कर दिया था   [ इस ब्लॉग के ऊपरी "डेश बोर्ड" पर अंकित श्री श्री 'माँ' विषयक मेरे संदेशों के लिंक पर जाकर ,"माँ कृपा" की पूरी कथा पढ़ें ]

श्रीहरि कृपा और आप महात्माओं के सत्संग ने मुझे मेरी " खद्योती" औकात भुलाने का अवसर ही नहीं दिया ! जब भी 'अहंकार' ने मेरे मन में अपना "फन" उठाया , दैवी चरणों ने उसे तुरंत ही कुचल दिया !  इसी बात से "तुलसी" का वह कथन याद आया :

कवि न होऊं नहिं चतुर कहाऊँ , 'मति' अनुरूप राम गुन गाऊँ 

"तुलसी" के ही शब्दों में "मति"गति ,रति और शक्ति सभी का आधार हैं "राम"  !:

'मति' रामहिं सो, गति रामहिं सों ,रति राम सों ,रामहि को बलु है 
    सबकी न  कहे ,तुलसी के मते , इतनो  जग जीवन  को  फलु है !!


 मेरी मान्यता और मानसिक धारणाएं भी श्री हरि कृपा से कुछ ऐसी ही है  
जैसा मैंने अपनी आत्म कथा में अन्यत्र  व्यक्त भी किया है  ;

करता हूँ केवल उतना ही , जितना "मालिक" करवाता है,
लिखता हूँ केवल वो बातें, जो "वह"  मुझसे लिखवाता है,
मेरी करनी  मत कहो इसे , सब "उसकी"  कारस्तानी है !!


प्रियजन मैंने जैसा कहा , स्वयं मैं कुछ करता नहीं ! अब आप ही कहो "उसके" अतिरिक्त और कौन है जो हमारे इस जर्जर घिसे पिटे शरीर में बैठा हुआ , हमसे इस उम्र में, ऐसे ऐसे कार्य करवा रहा है जो इस काया ने आज से पूर्व कभी किये ही नहीं थे ! ६० वर्ष की अवस्था तक सरकारी मुलाजिमत से रिटायर होने के दिन तक , अपने पी.एस. ,पी.ए. और स्टेनोग्राफर्स से पत्राचार करवाने वाला यह बूढा "भोला" आज ८२ का होकर , अपनी दुखती उँगलियों और झुकी कमर पर "मूव" रगड रगड कर "तोशिबा" के नये वाले लैप टॉप पर झुका बैठा स्वयं अपनी लम्बी चौडी आत्म कथा टंकित कर रहा है !

इधर पिछले दो सप्ताह से टंकन थोड़ा अवरोधित है तो आज उसकी जगह "केसियो" सिंथेसाईंजर के "की बोर्ड" पर उंगलियां थिरक रही हैं ! रात रात भर खांस खांस कर पड़ोसियों की नींद खराब करने वाला बूढा "भोला", जिसके मुख से रोगों के कारण कभी कभी बोल भी नहीं फूटते , आज अचानक पुनः मुखरित हो रहा है , गाने बजाने लगा है ! उसकी स्मरण शक्ति भी पुनर्जीवित हो गयी है ! पूरानी पुरानी बातें याद आने लगी हैं उसे और ५०-६० वर्ष पूर्व के स्वरचित गीत , तथा अन्य कवियों के गीतों की बनाई हुईं धुनें एक एक करके उसके मष्तिष्क पटल पर उभर रही हैं , न जाने कब कब की ,क्या क्या बातें याद आ रही है !
एक और आश्चर्य की बात है - पिछले ४० - ५० वर्षों से , केवल भजन रचने , धुन बनाने ,   स्वयं गाने तथा अधिक से लोगों को सिखाकर उन के साथ देवमन्दिरों में झूम झूम कर गाने से अपनी ईशोपासना सम्पन्न करने वाला ,यह बूढा 'रामनामी' तोता- "भोला" इधर १०-१५ दिनों से  ,"बच्चन जी" के वे प्रेम गीत ,जिन्हें उसने पिछली अर्धशताब्दी में एक बार भी गुनगुनाया तक नहीं , इनदिनों अचानक ही गाना शुरू कर दिया है !  क्यूँ ?

मेरी ओर से इस प्रश्न का उत्तर एक ही है और वो है - "उनकी इच्छा" और "उनसे मिली प्रेरणा "के कारण ! अपने सभी कार्यकलाप  केवल "उनकी"  प्रेरणा तथा निर्देशन से ,यंत्रवत करने वाला "मैं" किसी कीमत पर ''उनके" आदेश के बिना "बच्चन जी" की याद नहीं कर सकता था !अब  प्रश्न यह है कि "उन्होंने" क्यूँ ऐसा आदेश पारित किया ?  वास्त्विकता तो भैया "वह" ही जानें !

पर मुझे आज जो पता चला उसे जान कर आप भी चकित हो जायेंगे ! गाना रिकोर्ड करने और उनके शब्द अपने सन्देश में डालने से पहले मैंने उचित समझा कि "गूगुल खोज" से उसकी शब्दावली कन्फर्म करलूँ ! यही कर रहा था कि अनायास ही खोज में "बच्चन जी" का बायोडेटा सामने आ गया !

नाम : हरिवंश राय बच्चन : जन्म -  २७ नवम्बर , निधन - १७ जनवरी   

आप कहेंगे कि इसमें क्या चमत्कार है ? तो सुनिए कि ,उपरोक्त दोनों तारीखें हमारे लिए अति महत्वपूर्ण हैं ! " २७ नवम्बर " को हम दोनों का विवाह हुआ था ,और २७ नवम्बर को ही मेरे प्यारे प्रभु ने मुझे हस्पताल में मुझे यह आत्मकथा लिखने का आदेश दिया था ! और सुने एक और चमत्कारिक सत्य :

१७ जनवरी को "बच्चनजी" का निधन हुआ और इस वर्ष १७ जनवरी को ही मैंने -५० -६० वर्षों से भुलाया हुआ "बच्चनजी" का वह गीत गुनगुनाया ,गाया, रिकोर्ड किया और अपने ब्लॉग में प्रेषित किया !

अभी भी बच्चन जी के गीतों का नशा बरकरार है ! फलतः अपनी कथा पर पूर्ण विराम लग गया है ! जो भी हो रहा है , "उनके" आदेश से हो रहा है अस्तु कोई गम नही ,"नो प्रॉब्लम"

चमत्कार कहें या "जस्ट ए  कौय्नसीडेंस",जो भी नाम दें इसे , आपकी मरजी ! मुझसे तो जो कुछ "उन्होंने" लिखवाया मैंने लिख दिया !

आत्मकथा की श्रंखला में कितनी ही आनंदमय अनुभूतियों जुडी ,तो कितने अवसादों के क्षण भी आये - गए ! आज जो "बच्चनजी" का गीत गाने जा रहा हूँ ,उसे  भी १९५४-५५  में छोटी बहन माधुरी के रेडियो प्रोग्राम के लिए स्वरबद्ध किया था ! कृष्णाजी कहती हैं कि माधुरी ने उसे इसी धुन में गाया  था और उसकी बहुत प्रसंशा भी हुई थी ! आज मैं  इस अवस्था में अपनी ही उस पुरातन धुन के साथ कितना न्याय कर पाउँगा ? मुझसे अधिक "वह परम" जाने जो प्रेरणा देकर मुझे गवा रहा है  ! आप भी सुनिए :


क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ? 
अगणित उन्मादों के क्षण हैं ,अगणित अवसादों के क्षण हैं 
जीवन की सूनी घडियों को किन किन से आबाद करूं मैं ?
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं    

   



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क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?

अगणित उन्मादों के क्षण हैं ,अगणित अवसादों के क्षण हैं ,
जीवन की सूनी घडियों को किन किन से आबाद करूं मैं ?
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?  

याद सुखों के आंसूँ लाती , दुःख की दिल भारी कर जाती ,
दोष किसे दूँ जब अपने से अपने दिन बर्बाद करूं मैं
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?  

दोनों कर के पछताता हूँ , सोच नहीं पर मैं पाता हूँ ,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आज़ाद करूं मैं ,
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं ?
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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सोमवार, 23 जनवरी 2012

"बच्चन जी" का गीत - (१)

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"हरिवंश राय बच्चन" जी की रचना 


"दिन जल्दी जल्दी ढलता है"


ग्यारह-बारह वर्ष का था जब,  मैंने , उन दिनों की ख्यातिप्राप्त  "इलाहबाद यूनिवर्सिटी" (जिसने ब्रिटिश शासन काल में अनेकानेक योग्य "आइ. सी . एस" अधिकारियों को जन्म दिया था) के अंग्रेजी भाषा के प्रोफेसर - तथा ,प्रतिभावान ,हिन्दी भाषा के उभरते शब्द शिल्पी ,"श्री हरिवंशराय जी 'बच्चन'" का नाम पहली बार सुना !

हुआ ऐसा कि ,१९४०-४१ में जब  मैं सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था ,एक दिन, क्लास रूम में टीचर की अनुपस्थिति में , उम्र में मुझसे काफी बड़े ,गंगा पार के किसी बाहुबली परिवार के ढीठ युवराज , मेरे सहपाठी ने , क्लास रूम में ,बच्चन जी की "मधुशाला" के कुछ अंश चोरी छुप्पे पढ़ कर हम सहपाठियों को सुनाये !

आज सोचते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कि उस दिन मेरा वह सहपाठी "सलमान रुश्दी" की 'बैंड' पुस्तक "सेटेनिक वर्सेस" या ब्रिटिश शासन द्वारा उन दिनों "बेन" की गई ,"भारत में अंग्रेजी राज्य" नामक पुस्तक के अंश पढ़ने का  अपराध कर रहा था जैसा आज जयपुर के विश्व पुस्तक मेले की गोष्ठी में श्री कुंजरू ने किया ! खैर छोड़िये उसे , यह तो भारत में चलता ही रहेगा  , आइये पहिले मेरी कहानी सुन लीजिए:

उस छोटी उम्र में बच्चन जी की "मधुशाला" का निहित गूढ़ दर्शन - "सम भाव" - सब मतों ,सब धर्मावलम्बियों - मंदिर , मस्जिद , गिरिजाघर ,गुरुद्वारे वालों तथा शत्रुओं- मित्रों के   एकीकरण का श्रेष्ठ उद्देश्य जो मधुशाला में व्यक्त था , मेरी तब की अपरिपक्व समझ के बहुत परे था ---

लेकिन मधुशाला की सुमधुर शब्दरचना उस समय - तत्काल ही मेरे मन को छू गयी थी [यदि आप विश्वास करते हैं तो , शायद मेरे पूर्व जन्म के संस्कारों के फल स्वरूप]- खैर जो भी हो - वह संगीतमयी शब्द रचना मुझे बहुत अच्छी लगी थी !

प्रियजन ,तब उस ११-१२ की उम्र में आपके आजके यह बुज़ुर्ग मित्र 'भोला जी', संगीत के नाम पर कुछ फिल्मी गाने जैसे "अछूत कन्या" का "मैं बन की चिड़िया" , "बन्धनं" का "चल चल रे नौजवान" और 'के. एल. सहगल'"  के "देवदास" का "बालम आय बसों मेरे मन में" और इसी टाइप के कुछ अन्य गाने कभी कभी गुनगुना लेते थे ! कविता के नाम पर क्लास की मेगजीन के लिए कुछ तुकबंदियां भी कर लिया करते थे !

याद आया , मैंने चौथी कक्षा में कुछ अवधी कुछ भोजपुरी और खड़ी बोली के मिश्रण से एक हास्य रस की कविता लिखी थी -

सो 'जेंटल मैंन' कहावत हैं 
जो 'पैंट - कोट औ शर्ट' डार , 'गर कंठ लंगोट' लगावत हैं
सो 'जेंटल मैंन' कहावत हैं 
जो 'सोला' टोपी शीश धरे , मुख 'गोल्ड फ्लेक' को धुवाँ भरे 
'एल्शेशियन  कूकुर'  का पकरे  नित 'ग्रीन पार्क' टहरावत  हैं 
सो जेंटल मैंन कहावत हैं
[भोला - कक्षा ४ बी  - १९३९]  

अभी इतना ही याद आरहा है !
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बच्चन जी की बात करते करते भटक गया था ,चलिए विषय विशेष पर लौट चलें ! बचपन के वे दिन जैसे तैसे बीते !  ज़माने के चिंतन के अनुसार ' आई ए एस ' अथवा इंजीनियर बनने की लालसा में , संगीत तथा काव्य रचना को बलाए ताख रख कर - लडखडाते कदम से , एक एक पडाव में दो दो साल का डेरा डाल डाल कर किसी प्रकार 'बी एच यू' के 'कालेज
ऑफ टेक्नोलोजी ' से बेचलर की डिग्री प्राप्त कर ली ! परन्तु -

आश्चर्य चकित न हों, प्यारे प्रभु द्वारा गाने बजाने तथा थोड़ी बहुत कविता कर लेने  की  नैसर्गिक क्षमता प्राप्त , आपके इस रसिक मित्र को , कदाचित पूर्व जन्म के संस्कार तथा उनके पूर्वजों एवं उनके ही अपने जन्म जन्मांतर के संचित प्रारब्ध के लेखे जोखे के आधार पर , उनके 'प्यारे प्रभु' ने , इस जीवन में , रोज़ी रोटी कमाने के लिए ६० वर्ष की अवस्था तक जो पेशा करवाया , वह था "संत रैदास" वाला !

शायद रैदास जी के कार्य से भी कई स्तर नीचे का कार्य मुझे सौंपा गया था ! रैदास जी तो पके हुए चमड़े के जूते बनाते थे - लेकिन मुझे गाय-भैंस और भेड-बकरियों की कच्ची खाल को  पका कर उसमे रंग रोगन लगा कर उसे जूता बनाने लायक चमकदार चमडे का स्वरूप प्रदान करने का काम मिला था !

प्रियजन , "मेरे प्यारे प्रभु" ने मुझे जो काम सौंपा ,मैंने उसे शिरोधार्य किया और ६० वर्ष की अवस्था तक "उनके" द्वारा निर्धारित , वह तथाकथित नीच काम करता रहा ! मैंने कभी कोई गिला शिकवा नहीं किया ,सच पूछो तो "उन्होंने" मुझे कोई ऐसा मौका ही नहीं दिया कि मैं उनसे कोई शिकायत कर सकता !

दो दो वर्ष में ट्रांसफर हुए ! जब हमारा पहला बड़ा ट्रांसफर हुआ तब हमारे पांचो बच्चे सेंट्रल स्कूल में पढ़ रहे थे और उनमे से किसी एक ने भी १२वी की परीक्षा पास नहीं की थी ! हम  ढाई वर्ष के लिए मुंबई से वेस्ट इंडीज [गयाना] गए !

और विदेश से वापसी के बाद भी हमारी पोस्टिंग ,११ वर्षों तक देश के विभिन्न  नगरों - नयी दिल्ली ,कोचीन,आगरा, जलंधर ,कानपूर आदि में होती रही और हम सपरिवार भारत  दर्शन करते रहे ! हमारे परिवार के लिए ये ट्रांसफर कितने  कष्टप्रद रहे  होंगे ,आप अवशत अनुमान लगा सकते हैं ! परन्तु यहाँ यह उल्लेखनीय है कि हमारे परिवार के किसी भी सदस्य ने ऐसे तबादलों के कारण कभी कोई क्षोभ प्रगट नहीं किया और न किसी ने कभी कोई एतराज़ ही किया !  क्यूँ ?

गुरुजन के आशीर्वाद एवं प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा के कारण ,हमारे पूरे परिवार का यह दृढ विश्वास है कि इमानदारी के साथ ,सच्ची लगन से , पूर्ण मनोयोग से ,अपनी सम्पूर्ण क्षमताओं का यथोचित उपयोग करते हुए , अपने निर्धारित काम करते रहने वाले को उसके "इष्ट" कभी निराश नहीं होने देते ! प्यारे प्रभु , समय आने  पर , ऐसे साधक की सभी जायज़  आवश्यकताओं की पूर्ति कर देते  हैं !  

और देखा आपने हमारे "प्यारे प्रभु" ने अपने इस प्रेमी सेवक 'भोला" को उसके इस जीवन में कभी भी निराश नहीं किया , उसकी सारी सात्विक जरूरियातें अविलम्ब पूरी कीं और देखते देखते उसे उसके जीवन की "सांझ" तक पहुंचा दिया ! कितनी तीव्र गति से रिटायर होने के बाद के ये २३ वर्ष बीत गए  -- और अब तो उसके जीवन के दिन और भी जल्दी -जल्दी बीत रहे हैं :

आज से लगभग ६० वर्ष पूर्व ,अपनी छोटी बहन "माधुरी" को उसके रेडियो कार्यक्रम में गवाने के लिए मैंने १९५२ में "बच्चन" जी की एक रचना स्वर बद्ध की थी , प्रथम पंक्ति थी उसकी - दिन जल्दी जल्दी ढलता है !


आज अतीत के पृष्ठ पलटते ही उस गीत के शब्द याद आने लगे और वह ६० वर्ष पुरानी धुन भी याद आ गयी ! सोचा आपको सुनादूं लेकिन रेकोर्डिंग करवाते समय एकाध शब्द बदल गए हैं ,जिसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ! आज फिर बर्फबारी हुई है , चित्र में मेरे पीछे वाली खिड़की  के बाहर रोड को छोड़ कर नीचे सब कुछ हिमाच्छादित  है ! तो लीजिए सुनिए अपने बुड्ढे तोते से बच्चन जी का वह गीत :
 
दिन जल्दी जल्दी ढलता है 

  हो जाय न पथ में रात कहीं , मंजिल भी तो है दूर नहीं ,
यह सोच थका दिन  का पंथी भी  जल्दी जल्दी चलता है 
दिन जल्दी जल्दी ढलता है 




बच्चे प्रत्याशा में होंगे ,नीडों से झाँक रहे होंगे ,
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है 
दिन जल्दी जल्दी ढलता है 

मुझसे मिलने को कौन विकल , मैं होऊँ किसके हित चंचल ?
यह  प्रश्न शिथिल करता पद को भरता उर में विव्ह्लता है 
दिन जल्दी जल्दी ढलता है 

"बच्चन"
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बहुत बकवास कर चुका , कम्प्यूटर पर झुके झुके घंटों बैठे रहने के कारण अब कंधों में पीड़ा हो रही है ! कृष्णा जी नोटिस दे चुकी हैं कि मुझे आज इस पीड़ा से उबरने के लिए एक और अर्थात चौधवी दवाई खानी पड़ेगी !
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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मंगलवार, 17 जनवरी 2012

कहाँ ढूढने जाएँ "उनको"

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उन्हें ढूढू कहाँ जाकर मिलू क्यूँकर कहाँ उनसे 
जो मिल जाएँ तों कह दूँ अपनी सारी दास्ताँ उनसे 
"राद" 
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मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे
[गतांक के आगे]
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हजारों वर्ष पूर्व द्वापर  में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अपने सखा अर्जुन को जो गूढ़ रहस्य बताया था वही रहस्य कलियुग में हम सबके लाभार्थ कबीरसाहेब तथा भक्ति काल के अन्य विचारकों ने आसान से आसान शब्दों में व्यक्त कर के हमारा मार्ग दर्शन करने का प्रयास किया !

परन्तु उससे इंसान की बेचैनी कम नहीं हूई !  इंसान ,रूढिवादी विधियों और पारंपरिक मान्यताओं की गांठ बाँधे आजीवन भ्रम भूलों के गलियारों में भटकता रहा ! बेचारा अपने "इष्ट"-  [प्रेमास्पद] की तलाश में , असंख्य चौखटों पर सिर पटकता रहा ,वह राह में पड़े सभी दरवाज़ो पर दस्तक देता रहा और न जाने क्या क्या उपाय करता रहा !

इतना उलझ गया जीव मत मतान्तरों के जटिल जाल में कि कम से कम मेरे  जैसे मूर्ख के  लिए अधेड़ अवस्था तक दृढ़ता से यह कह पाना कठिन हो गया कि पुरातन वैदिक विधि पालन करने वालो तथा समय समय पर बदलती परिस्थिति के कारण बदले विधि विधान को अपनाने वाले आध्यात्मिक यात्रियों में से कौन सा पथिक अपने "गंतव्य" तक [चाहे वह जो रहा हो - "परम धाम गमन" अथवा "हरि दर्शन" ]  पहुंचने में सफल हुआ !

प्रियजन तबतक , मैं यह नहीं समझ पाया था कि उन दोनों में  से कौन सा रास्ता मेरे लिए कारगर होगा ;  मैं निज आध्यात्मिक उत्त्थान के लिए इनमें से कौन सा मार्ग चुनू " सच तो यह है कि जीव अपने जीवन के अनुभवों से ही सीखता है ! मैं अपना अनुभव सुनाऊँ !

हमारे पूर्वज मूर्ति पूजक थे ! वे गंगास्नान , देवालयों में दर्शन, आरती वंदन  करते थे और समय समय पर ,कठिनाइयाँ झेल कर भी कष्टप्रद एवं दुर्गम "तीर्थ यात्राओं" पर जाते थे ! हमारे  एक परदादा ने तो ,"संकट के समय" न केवल "श्री संकटमोचन महाराज" के दर्शन पाए थे बल्कि उनके सुझावों को कार्यान्वित कर बड़े बड़े संकटों में अपने जीवन की रक्षा भी की ! [अन्यत्र पूरी कथा सविस्तार लिख चूका हूँ]

मैंने स्वयं अपने परिवार के अनेकानेक प्रामाणिक साक्षियों का निरीक्षण करके , अपनी आत्म कथा में एक स्थान पर कहा है कि ,एक तरह से  हमारे एक दादा जी की  उंगली पकड़ कर,"श्री हनुमान जी"  ने उन्हें - चारों धाम में से प्रमुख -" श्री जगन्नाथ पूरी धाम" [गंगा सागर]" तक  पहुँचाया तथा यात्रा के पूर्व दादाजी के गाँव में ही "विप्र" रूप में   की हुई अपनी भविष्यवाणी को भी सच करवा दिया था !

विप्र रूपधारी श्री हनुमान जी के कथनानुसार ही उस पवित्र देवालय के प्रांगण में "त्रिमूर्ति" के सन्मुख  हमारे दादा जी ने ,अपने पार्थिव शरीर का परित्याग  किया ! आप कुछ भी समझें इसे , हमारे परिवार के तथा गांव के आसपास के अधिकतर लोग इसे प्रत्यक्ष श्री  श्री हनुमान -दर्शन का ही नाम देते हैं !

ये तो है दर्शनाभिलाषी भक्तों की सफलता का एक उदाहरण !

दूसरी ओर हमारी अम्मा ने अपने अच्छे दिनो में ,परिवार के अधिकाधिक  बुजुर्गों को उनकी "चारों धाम" की यात्रा पर जाने में सहयोग दिया परन्तु वह स्वयं अपने जीवन में एक भी , जी हाँ, एक भी "धाम" की यात्रा नहीं कर पायीं ! हमारी अम्मा  ने "धाम यात्राओं" से कहीं अधिक महत्व दिया ,"प्रेम भक्ति" वाले "धर्मपथ" पर चल कर "परहित-परसेवा" रूपी धर्माचरण को !

वह दरिद्रों में "नारायण" का दर्शन करतीं थीं ! अम्मा , देवमन्दिरों तक , खासकर इस लिए पैदल जातीं थीं कि मार्ग में फुटपाथों पर झोली फैलाये बैठे दरिद्रियों की सेवा कर सकें और घाट पर स्थित अनाथलय के बच्चों को भोजन करा सकें ! उनकी यही उपासना थी , यही थी उनकी साधना !

प्रियजन , मैं अज्ञानी हूँ अस्तु नहीं  कह सकता कि हमारी अम्मा अपने उपरोक्त धर्म पथ पर चल कर ,अपने गंतव्य तक पहुंच पायीं या नहीं ! पर इतना दावे के साथ कह सकता हूँ कि उस "आनंदघन - परमानंद स्वरूप" -"प्यारे प्रभु"  का दर्शन लाभ  उन्हें उनके जीवन के अंतिम क्षणों तक होता रहा !  जिस पल उन्होंने शरीर त्यागा , उनका सारा परिवार उनके पलंग को घेरे , आनंद से कीर्तन कर रहा था -

"श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण बासुदेवा'

और भयंकर केंसर से पीड़ित हमारी अम्मा वैसे ही मुस्कुरा रहीं थीं , जैसे वह दो दिन पूर्व मुझे अपनी कुर्सी के हत्थे पर बिठाकर , मेरी ओर प्यार से निहारती हुई मुस्कुराईं थीं !.हम और आप अनुमान नहीं लगा सकते कि अंतिम क्षणों में वह कितनीं आनंदित थीं ! उनका
पार्थिव शरीर भी नवजात शिशु के समान कोमल था और उनके चेहरे पर जैसी  परम शांति की मुद्रा अंकित थी  वैसी जीवित प्राणियों में भी साधारणत:  दृष्टिगत नहीं होती  !

अम्मा ने यह प्रमाणित कर दिया कि उन्होंने देवालयों तथा "धामों" में विराजित देवों के स्थान पर अपने  हृदय  में विराजित  "श्री हरि" के दर्शन अंतिम क्षण तक किये !  हमारी अम्मा को अपने "प्यारेप्रभु" की खोज में दर दर नहीं भटकना पड़ा  !

प्रभु के लिए कैसी खोज ,कैसी तलाश ?  वह न तो हमसे दूर गया है , न वह कहीं खोया है !
प्रियजन ! खोज उसकी की जाती है ,जो कभी हमारी असावधानी के कारण मेले में हमसे बिछड कर भीड़ में कहीं खो गया है ! जरा सोच कर देखें कि हमारा प्रभु हमसे कहाँ और कब बिछडा ?  महा पुरुषों ने सत्य ही कहा है कि " प्यारे प्रभु ,अपने भक्तों का साथ कभी भी नहीं छोड़ते ! वह  आजीवन अपने प्रेमी भक्तों के अंग संग ,[निकटतम] बने रहते हैं ! उनके रोम रोम में रमे रहते हैं " लेकिन फिर भी हम  अक्सर यह शिकायत करते रहते हैं कि "वह" हमें  मिलता नहीं है !"

ऐसे ही खोये हुए अपने हरदिल अज़ीज़ "प्रभु" को ढूँढते हुए रामपरिवार के एक बुज़ुर्गवार - [ हमारी धर्मपत्नी कृष्णा जी  के नाना जी ] मरहूम जनाब मुंशी हुब्बलाल साहेब "राद" ने अपनी एक गजल में फरमाया है - और मैं उसे आपको गा कर सुना रहा हूँ :

उन्हें ढूँढूँ कहाँ जाकर मिलूं क्यूँ कर कहाँ उनसे 
जो मिल जाएँ तों कह दूँ अपनी सारी दास्ताँ उनसे 
Where should I go to look for HIM ?  I have to tell HIM my entire story 
समझता हूँ कि हाले दिल नहीं हरगिज़ निहां उनसे 
मगर जी चाहता है हाल सब कर दूँ बयां उनसे 
 I understand HE knows all about me yet I crave to narrate my whole story to  HIM   
परेशां जुस्तजू में हूँ ,कोई दे दे पता उनका 
मिलेंगे वो कहाँ मुझको ,मिलूं जाकर कहाँ उनसे
I M anxiously looking for HIM .Will someone help me with HIS address ? 


<

रहा करती है उनकी याद में इक महवियत तारी 
कहा करता  हूँ दिल ही दिल में अपनी दास्ताँ उनसे 
HIS very thought fills me with immense pleasure and in my heart of heart  
I constantly keep narrating my tale to HIM .
and finally the poet says 
अगर अय "राद "तू दिल में उन्हें ढूंढे उन्हें देखे 
तो फिर हरगिज़ न पूछेगा मिलूं जा कर कहाँ उनसे
If Raad ,you peep into your own heart , you will find HIM enthroned there .
and then you will not need enquiring others about HIS where about  ?

[ मुंशी हुब्ब लाल साहेब "राद" का कलाम ]
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बड़ी परेशानियों से गुजर कर यह वीडियो तैयार हो पाया है , भोला जी की फेमिली के तींन
पुश्तों ने मिलकर इसे अंजाम दिया है ! बाबा दादी बेटा बेटी और पौत्र पौत्रियों की टीम की यह भेंट, जैसी भी है सुनियेगा ज़ुरूर !
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निवेदन : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

कबीर - मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे

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खोजी हो तो तुरत मिल जाऊं 
पल भर की तलाश में 
मैं तो तेरे पास में 
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१० जनवरी २०१२ के प्रातः काल यहाँ 'बोस्टन' में नये वर्ष की पहली "स्नो-फाल" [बर्फबारी] हूई ! बहुत हल्की थी ! एक दो घंटे में , धूप खिलते ही, वह  गल कर ,जहां से आयी थी ,उसी जगह पहुंच गयी !   मन में प्रश्न उठा कि यह  "स्नो" जो हमारी आँखों से सदा सदा के लिए ओझल हो गई है क्या ये  वास्तव में सदा सदा के लिए नष्ट हो गयी है ?  नहीं न ! आप जानते ही हैं कि --

"स्नो" धूप से गली , पानी बनी , भाफ बनी  और उड़ कर आकाश की सैर कर पुनः आकर सागर  में समा गई ;उससे  मिल गयी ! जो  भाफ न बन सकी वह या तो धरती में समा गई या नदी नालों के साथ बहती हुई सागर तक पहुंच गयी !

सागर से पुनः ये जलकण ,बादल बनेंगे , और फिर जल अथवा बर्फ में परिवर्तित हो कर इस धरती पर बरसेंगे - और इसी प्रकार यह पूरा क्रम चलता रहेगा -- 

पानी के बुद्बूदों के समान जीवात्माएं अनंत शून्य के अपने स्थायी निवास से  धरती पर उतरती रहेंगी , और कोल्हू के बैल की तरह अपने अपने निश्चित चक्र पूरे करके पुनः अपने परम धाम पहुंच जाएंगी !


हमारे पूर्वजों ने ऎसी ही यात्रा की थी , हम सब भी ऐसी ही यात्रा पर निकले हैं और अपना अपना चक्र पूरा कर के एक एक कर अपने गंतव्य धाम तक वापस पहुंच जायेंगे ! 


हम समझते हैं कि हमारे पूर्वज भी उन जलबिंदुओं के समान विनष्ट हो गए परन्तु वास्तव में ,ऐसा नहीं है ! हम उन्हें देख नही पाते ,दुखी होते हैं यह सोच कर कि हम पुनः उनसे मिल न् पाएंगे ! पर ऐसा कुछ नहीं है , वे सभी "जलबिंदु" हमारे अंग संग हैं !  ये जल बिंदु हमारे रोम रोम को आच्छादित किये हैं , हमारी रग रग में प्रवाहित हो रहे हैं ! हमारे जन्म से लेकर हमारे जीवन के अंत तक वे हमारा साथ नहीं छोड़ते !   

धरातल पर जीव ढूँढते फिरते हैं अपने उस "अंशी"को ! अविनाशी जीव का स्थूल शरीर जीवन भर ,भटकता रहता है -  ?

मंदिर मंदिर , द्वारे द्वारे , मस्जिद  , चर्च  और  गुरुद्वारे 
भटका आजीवन मानव पर मिला न् उसको "अंशी" प्यारे 
[भोला]
परन्तु 

सैकड़ों वर्ष पूर्व भारत के एक अनपढ़ जुलाहे ने जो रहस्य अपने करघे पर चदरिया बुनते बुनते जान लिया था वह ,हमारे जैसे ज्ञानी विज्ञानी समझे जाने वाले महापुरुषों को आज तक समझ में नहीं आया !  :

योगेश्वर कृष्ण ने श्रीमद भगवदगीता के अध्. १८ के श्लोक ६१ में अर्जुन को बताया था कि  

ईश्वरः सर्वभूताना हृद्येशे अर्जुन तिष्टति
भ्रम्यन्सर्वभूतानि   यंत्रा   रूदानि  मायया  

अर्थात  

ईश्वर ह्रदय में प्राणियों के बस रहा है नित्य ही 
सब जीव यंत्रारूढ  माया  से   घुमाता  है    वही     

महात्मा कबीर ने आज से लगभग ५०० वर्ष पूर्व लोक भाषा में कितने आसान शब्दों में
वह गूढ़ रहस्य उजागर कर दिया था , उन्होंने कहा  :

" मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में ,ठीक से खोज मेरे प्यारे , सच्चे खोजी को मैं            पलभर की तलाश में ही मिल जाउंगा  "

आज "उनका" आदेश है कि गा के सुनाऊँ -  तो प्रस्तुत है प्रियजन -


मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे ,मैं तो तेरे पास में 


ना तीरथ में ना मूरत में , ना एकांत निवास में 
ना मंदिर में ना मस्जिद में ,ना काशी कैलास में 
 मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे ,मैं तो तेरे पास में 

ना मैं जप में ना मैं तप में ,ना मैं ब्रत उपबास में  
ना मैं किरिया करम में रहता नहीं जोग सन्यास में 
 मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे ,मैं तो तेरे पास में 

खोजी हो तो तुरत पा जाये पल भर की तलाश में  
कहे कबीर सुनो भाई साधो , मैं तो हूँ बिस्वास में 
मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे ,मैं तो तेरे पास में 
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यह एक बूढे तोते की आवाज़ है , यदि कर्कश लगे तो क्षमा करना ! 
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

भ्रष्टाचार से मुक्त जीवन जियें

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"स्वधर्म न छोड़ें - विजयी होवें" 

हमारा परम धर्म है - सब के प्रति निष्ठांपूर्वक "कर्तव्य पालन"
( यहाँ "सब" = स्वयं , परिवार , समाज, स्वदेश )
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भ्रष्टाचार से मुक्त जीवन जीने का प्रयास करें 

मैं  आजीवन  राजनीतिज्ञों एवं उच्च प्रशाशनिक अधिकारियों से ,उनके  भ्रष्ट हथकंडों के कारण परहेज़ करता रहा लेकिन पब्लिक सेक्टर के सरकारी उद्योगों में अध्यक्ष का पद सम्हालते समय मेरे लिए उनसे बच पाना असंभव हो गया ! मैं उनसे इतना  "एलर्जिक" हो गया कि लम्बा सफेद कुरता , और [उन दिनों के] चौड़े पायचे के पायजामें में , तिरछी गांधी टोपी लगाये किसी व्यक्ति को दूर से अपने निकट आते देखते ही मेरा  "ब्लड प्रेसर" जबर्दस्त उछाल मार देता था ! मेरी पल्स रेट तथा सिस्टोलिक - डायस्टोलिक बी पी ,सब के सब आकाश छू लेते थे !

बात ही कुछ ऐसी थी !  उन दिनों के प्रादेशिक और स्थानीय नेताओं की एक आम हरकत आपको , निजी अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ , सुनिए

किसी भी चुनाव का एलन होते ही , और त्योहारों के दिनों में,  ईद बकरीद,  होली-दसहरा-दीवाली ,संत रैदास,गुरु नानक जयन्ती आदि पर्वों पर स्थानीय राजनेता तथा उनके गुर्गे , सब कायदे कानून तोड़ते हुए बड़े से बड़े सरकारी अधिकारी के केबिन में घुस आते थे ! वे आते ही उछल कर अधिकारी की मेज़ पर बैठ जाते और अपने कमरबंद में खुंसे हुए "कट्टे" को बार बार इशारतन दिखाकर और कभी कभी तो एक बड़े "अलीगढी  छुरे" को अधिकारी की मेज़ में धंसा कर ,उसे  तबादले की धमकी देकर ,डरा धमकाकर , बाहुबली  दबंगई के साथ  जबरदस्ती , चुनाव और त्यौहार के बहाने बड़ी बड़ी रकम वसूल कर लेते  थे !

ऊपरी कमाई करने वाले सरकारी अधिकारी ,ऐसे नेताओं को अपनी ही कुर्सी पर बैठा लेते, और दफ्तर की केन्टीन से गरमा गरम समोसे और जलेबी मंगवाकर उन्हें खिलवाते और  फिर चायशाय पिलवा कर ,किसी ब्रांडेड पान मसाले का नया डिब्बा खोल कर ,उन्हें थमा देते और जान बूझ कर वापस लेना भूल जाते थे !  उसके बाद  वे दफ्तर के खजांची से यह कह कर कि " सरकारी खर्च में कहीं एड्जुस्ट् कर लेना " कैश मंगवाते और नेताओं से निजात पाते थे ! हाँ , जब कैश का एडजस्टमेंट होता तो उससे ऐसे अधिकारी और उनके केशियर महोदय भी अपना हिस्सा लेकर लाभान्वित होते जिससे उनकी  होलीदीवाली भी कुछ अधिक रंगीन हो जाती !

उस जमाने में मुझे भी अनेकों बार  ऐसी समस्याओं से निपटना पड़ा था ! तब कैसे झेला  था मैंने , उन  नेताओं को , वह तों केवल  भुक्तभोगी - मैं और मेरा परिवार ही जानता है ! आपको बताउंगा तो आप न जाने क्या सोचेंगे ! सुन कर ,शायद आप मुझ पर , "अपने मुँह मिया मिट्ठू बनने" का आरोप लगाएं अथवा उसे मेरे द्वारा ,मेरी अपनी साधुता का अहंकारमय प्रदर्शन मानें ! खैर जो भी आप सोचें -- मुझे उसकी चिंता नहीं !

इस संदर्भ में एक बात कहने की प्रेरणा अवश्य हो रही है

मेरी बीवी बच्चों को छोड़ कर मेरे घनिष्ट से घनिष्ट पारिवारिक सम्बन्धियों को  यकींन  नहीं होता था कि "इतनी आमदनी वाली कुर्सी " पर बैठ कर भी मैं "ऊपरी कमाई" से परहेज़ करता  था ! स्वजन सहानुभूति जताते , कहते " पांच पांच बच्चों को पढाना है , दो दो लड़कियों का उद्धार करना है और भोला बाबू तुम इस कुर्सी पर बैठ कर भी दौलत कमाने की जगह , 'नाम ' की कमाई में जुटे हो"! सच पूछो तों अधिकतर लोग मुझे निरा   मूर्ख ही समझते थे !

मित्र और सम्बन्धी अक्सर मुझे याद दिलाते रहते कि मेरे मातहत मकान बना रहे थे और  मेरा कहीं कोई अपना मकान नहीं था ! शुभचिंतक बताते कि मातहतों की बीवियों के पास रत्नजडित आभूषण हैं लेकिन हमारी बीवी के पास १५-२० वर्ष पूर्व हमारे  विवाह में मिले आभूषणों के अतिरिक्त और कोई ढंग का नया आभूषण नहीं ! प्रियजन उनके इन कटाक्षों से मैं और मेरा परिवार तनिक भी विचलित नहीं होता था !

धर्मपत्नी कृष्णा जी के सहयोग से हमारी गृहस्ती की गाड़ी खिंचती रहती !  मेरी आर्थिक मदद करने के लिए उन्होंने भारत सरकार के हिन्दी टीचिंग स्कीम में अहिन्दी भाषी केन्द्रीय गजेटेड अफसरों को हिन्दी सिखाने  का काम शुरू कर दिया !  विडम्बना देखें , जहां मैं निजी कार पर सवार हो कर दफ्तर जाता था और दिन भर  एयरकंडीशन्ड केबिन में बैठता था वहाँ बेचारी कृष्णा जी दिन भर मुम्बई की उमस भरी गर्मी में , कभी पैदल चल कर तथा कभी बस और लोकल ट्रेन में धक्के खाती हुई अंधेरी से चर्चगेट और कोलाबा में स्थित सरकारी दफ्तरों तक दौड लगाती रहती थीं !

पांचो छोटे छोटे बच्चे , बेस्ट की दो "बसें" बदल  कर घर से पवई के 'सेंट्रल स्कूल' जाते थे ! जरा सोचिये हमारी सबसे बड़ी बच्ची श्रीदेवी जो तब लगभग ११ वर्ष की थी उनकी लीडर बन कर उनकी देखभाल करती थी ! सहपाठी उसे  "दीदी की रेल गाड़ी " का इंजन कह कर चिढाते थे !

मैंने  किसी दुःख , पीड़ा अथवा ह्ताशिता या निराशा से व्यथित हो कर उपरोक्त कथन नहीं किया है ! मैं यह वर्णन ,अति प्रसन्नता से और गर्व के साथ कर रहा हूँ ! 

मुझे गर्व है इसका कि हमारे प्यारेइष्ट ने जो ,"कारण बिनु कृपालु हैं " और जो स्वभाव वश ही ,"करहि सदा सेवक सन प्रीती",उन्होंने मेरी सेवकाई स्वीकार की और आजीवन हम पर कृपालु बने रहे ! "वह" सर्वदा मुझे सुबुद्धी और विवेक प्रदान करते रहे ,जिससे मुझे ,कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझने की क्षमता मिली और विषम से विषम कठिनाइयों में भी मैं अपने धर्म पथ  से विलग नहीं हुआ ! 


अन्ततोगत्वा उनकी कृपा से ही मैं सफलता के उस शिखर तक पहुंच गया ,जिसका पहले से किसी को अनुमान भी नहीं था !


"हम दो हमारे दो" अभियान के श्री गणेश के पूर्व का   
"भोला कृष्णा परिवार"  


 १९६८ में हम दोनों के साथ हमारे बच्चे
[बांये से दायें) (१) पुत्र-"राम" (अब USA में ) (२)  छोटीपुत्री-"प्रार्थना" (दिल्ली) (३) छोटेपुत्र -"माधव" (नोयडा)
(४) बड़ीपुत्री - "श्रीदेवी" (चेन्नई), (५) मझले पुत्र - "राघव" (अब USA में )   


मुझे अभिमान है अपने पूरे परिवार पर ! 
क्यूँ ? 

बताऊँ -  मेरे बच्चों और उनकी माँ ने कभी भी अपनी मांगों की पूर्ति के लिए मुझे मेरा ईमानदारी का रास्ता छोड़कर , किसी ठेकेदार या एक्सपोर्टर के  सामने हाथ फैलाने के लिए मजबूर  नहीं किया ! सच पूछिए तों भगवत कृपा से आज तक मुझे अपने 'प्यारे प्रभु' के अतिरिक्त किसी और से कुछ भी मागने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी और मेरे ही क्यूँ मेरे सभी प्रियजनों के भी सारे न्यायसंगत कार्य सिद्ध होते गए !

मेरा कहना है कि यदि मानव में सहन शक्ति हो ,दृढ़ निश्चय हो ,अविचल विशवास हो  और वह स्वधर्म के अनुसाशन तथा नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतार कर अपने  नियत कर्म करता हो तों ऐसे व्यक्ति को "प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा" बिन मांगे ही प्राप्त हो जाती है ! प्रभु , ऐसे व्यक्ति को ,आवश्यकता पड़ने पर , उसकी कठिन समस्याओं एवं विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए, समुचित शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक बल प्रदान करता रहता है !

जैसे माँ अपने नादान शिशु को उंगली पकड़ कर उसे इधर उधर भटकने से रोकती है ,उसे पथ भ्रष्ट नहीं होने देती ,वैसे ही हमारा "प्यारा प्रभु" ऐसे कर्तव्य परायण जीव का पग पग पर मार्गदर्शन करता रहता है  ! और , जिस जन पर उसका इष्ट ऐसी कृपा दृष्टि डालता है उसका तों बस कल्याण ही कल्याण , मंगल ही मंगल होता है : प्रभु की कृपा के साथ साथ सारा ज़माना ऐसे व्यक्ति का शुभ चिंतक हो जाता है ! तुलसी ने विश्वास के साथ कहा है :

कृपा  राम  की   जा   पर   होई   !  ता  पर कृपा करे सब कोई !! 
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेहीं ! राम सुकृपा बिलोकहिं जेहीं !!

प्रियजन आलसी निष्क्रिय और अकर्मण्य व्यक्तियों द्वारा प्रसारित यह भ्रान्ति कि ,बिना बेईमानी किये कोई भारतीय नागरिक सुखी नहीं हो सकता ,सर्वथा मिथ्या है !

ऐसे अनेक निष्ठावान धर्मपरायण अधिकारियों को मैं जानता हूँ जिन्होंने अंत तक कोई दूषित व भ्रष्ट पथ नहीं अपनाया ! वे सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते  रहे और उन्होंने वह कर दिखाया जो आमतौर पर कठिन होता है !

अन्त्तोगत्वा ऐसे ईमानदार भारतीयों ने  भी  धन ,मान-सम्मान और ख्याति अर्जित की   और उनका जीवन भ्रष्ट लोगों के जीवन से किसी प्रकार भी कम् सुखी नहीं है ! एक बड़ा अंतर जो ईमानदारों और भ्रष्ट जनों में है वह यह है कि जहां ईमानदार व्यक्ति आराम से गहरी नीद लेते हुए रात काटते हैं ,वहाँ भ्रष्ट जन रात रात भर करवटें बदलते रहते हैं  !
                             
                                अस्तु प्रियजन ,"स्वधर्म न छोड़ें - विजयी होंवें"
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क्रमशः 
                                      निवेदन : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला" 
                                    सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 

महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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