सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

साधक साधन साधिये# 2 4 6

Print Friendly and PDF हनुमत कृपा
अनुभव

प्रियजन ! मैंने तो अपने इष्ट देव श्री राम जी एवं श्री कृष्ण जी के चरित्र पर अमेरिका के छात्रों द्वारा उठाई शंकाओं के समाधान का प्रकरण समाप्त ही कर दिया था क़ि आज अपने राम परिवार के दो अतिशय प्रिय सदस्यों के भावपूर्ण पत्र (इ.मेल) हमे मिले ! इन दोनों का पूरा परिवार सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महराज का परम भक्त है और इनके परिवार के सभी सदस्य श्री स्वामीजी, श्री प्रेम जी, श्री विस्वमित्र जी महराज,पिताश्री हंसराज जी ,माँ श्रीमती शकुन्तला जी अथवा दर्शी बहेन जी से "राम - नाम" दीक्षा प्राप्त कर चुके हैं !

मेल पढ़ कर ,कृष्णा जी एवं श्री देवी (जो आजकल चेन्नयी से यहाँ आयी हुई हैं ) ने सलाह दी क़ि मैं , इन प्रियजनों के विचारों से भी सभी पाठकों को अवगत करा दूँ , अस्तु दोनों पत्रों को ज्यों का त्यों नीचे उध्रत कर रहा हूँ :--
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पहला पत्र सिंगापुर से अनिल बेटे का है , उन्होंने लिखा है कि :-
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Saadar Charan Spursh!
Jai Sita Ram!
We returned from India last night. During last nine days, we did not access the internet and so could not read your messages. If you permit, I would like to add that:

1) In Shri Ramcharit Manas , Bhagwan Shri Ram has himself said that
अनुजवधू भगिनी सुत नारी ! सुनु शठ कन्या सम ए चारी !!
इन्ह्ही कुदृष्टि बिलोकइ जोई ! ताहि बधे कछु पाप न होई !!
Hence killing of Bali was justified. Yes in the Western world their moral Values are VERY different and hence they probably will not understand what the relations in INDIA mean.

2) Babuji had once mentioned that the 16,000 Ranian of Shri Krishna Bhagwan are symbolic to 16,000 veins of the Human Body. It is only PARMATMA Shri KRISHNA who can control all the 16,000 Veins of our Body and that is what was meant when we look at 16,000 Ranis.

This is what I could understand.

With Respects to Bua and yourself,
Anil
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दूसरा इ मेल "अतुल" बेटे का गाजिआबाद से आया है , उन्होंने लिखा है :-
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सादर चरण स्पर्श राम राम

मैं प्रतिदिन प्रात: काल में, कम्प्यूटर खोलने के बाद सबसे पहले " महावीर बिनवउँ हनुमाना" पढ़ता हूँ. !8.30 के लगभग यह आ जाता है.! गजाधर फूफाजी का प्रसंग एवं परमादरणीय दादी के अंतिम क्षणों के बारे में पढ़कर विश्वास करना कठिन हो गया कि हमने भी इन महान संतों के साथ जीवन के कुछ क्षण बिताये हैं. उनके चरणों में अनेकानेक प्रणाम .

आजकल श्री कृष्ण जी का प्रसंग चल रहा था, जिसे आपने आज विश्राम दिया है. आपको पता ही है कि परमादरणीय अम्मा कृष्ण जी की पुजारिन थीं. वे प्रतिवर्ष श्री जगन्नाथ जी की पूजा करती थीं. उन्होंने एक बार बताया था कि, श्री कृष्ण भगवान ने अंतिम प्रवास श्री जगन्नाथ पुरी में किया था. वहां की मूर्तियों के हाथ और पैर नहीं हैं. मूर्तियों के हाथ और पैर लकड़ी के हैं - मानो भगवान यह सन्देश दे रहे हैं कि, चोरी करने आदि के बाद यह स्थिति हो जाती है !.

जब आपने श्री कृष्ण जी के प्रसंग का समापन गुरुजनों की शिक्षा द्वारा किया तो मन में आया कि अम्मा के द्वारा बतायी हुई श्री जगन्नाथ जी की बात आप को भी बता दूं. वेदों में भी कहा है - अवगुण अपने देखो, गुण दूसरों के देखो.

एक और बात. राम और कृष्ण इस पृथ्वी पर लीला करने अवतरित हुए थे. इसी कारण वे गर्भ में भी आये थे. उस समय वे मानव रूप में थे एवं उस काल की परस्थितियों के अनुसार विविध लीलायें करते थे. इसी कारण उन्होंनें श्री वाल्मीकि जी से अपने रहने का स्थान बताने के लिये विनती की थी - एवं श्री लक्ष्मण जी को शक्ती लगने के बाद विलाप किया था और जटायू को गोद में लेकर आँसू बहाये थे.

तभी अपने देश के महान संतों ने लिखा है -

"न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझ जाते हैं.
न रोये वन गमन में श्री पिता की वेदनाओं पर,
उठाकर गीध को निज गोद में आँसू बहाते हैं....."
एवं
"प्रबल प्रेम के पाले पढ़कर प्रभु को नियम बदलते देखा.
जिनका ध्यान विरंचि शम्भु सनकादिक से न सम्भलते देखा,
उनको ग्वाल सखा मंडल में लेकर गेन्द उछलते देखा.

आदर सहित
अतुल
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अनिल और अतुल बेटों को ह्म उनके इन अनमोल विचारों के लिए हृदय से धन्यवाद देते हैं ! अपने अति व्यस्त दैनिक कार्यक्रम में समय निकाल कर आप दोनों ही ने जो संदेश भेजे , सराहनीय है !

एक सलाह है क़ि जब मेल द्वारा मेरा संदेश न मिले तो आप अप्रिल ०१ , २०१० से भेजे मेरे पिछले २४४ संदेश भी कभी कभी पढ़ें ! उनमे मैंने अपनी प्रेममयी अम्मा के विषय में बहुत कुछ लिखा है इसके अतिरिक्त "पितामह की तीर्थ यात्रा" प्रसंग में मैंने पुरी के श्री जगन्नाथपुरी मंदिर में , देव मूर्तियों के ठीक सामने अपने दादाजी के देह त्यागने की पूरी कहानी लिखी है !

क्रमश:
निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
78, Clinton Road, Brookline,MA 02445, USA

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