सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
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आज का आलेख

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

"बच्चन जी" का गीत (३)

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डॉक्टर हरवंश राय "बच्चन" 
पुण्यतिथि 
जनवरी १७, २००३ 
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 ५० - ६० वर्षों के बाद , इस जनवरी १७  को ही सहसा क्यूँ ,याद आये "बच्चन जी", इस विषय में स्वमति अनुसार ,अपने "इष्टदेव" की प्रेरणा से मुझे जो समझ में आया ,वह गत अन्कों में लिख चूका हूँ ! यह भी स्पष्ट कर चुका हूँ कि मेरा "निजी" सम्बन्ध , बच्चनजी अथवा उनके परिवार के किसी व्यक्ति से कभी नहीं रहा ! पर यह भी सत्य है कि  मेरी सगी छोटी बहन माधुरी [ जिन्हें बचपन में ,मैं 'बच्चन' जी के गीत सिखाता था ] तथा उनके पतिदेव [मेरे बहनोई] (स्वर्गीय ) विजय बहादूर चन्द्रा जी के साथ "अमिताभजी " तथा "जया जी" का काफी घना सम्बन्ध था ! [ परिवार के एल्बमों में साक्षी स्वरूप अनेक चित्र उपलब्ध हैं ]!

न जाने कहाँ कहाँ भटक जाता हूँ , लीक से ! कथा चल रही थी बड़े वाले "बच्चन जी" की और मैं उनके पुत्र की बात छेड़ बैठा ! चलिए अपनी कथा आगे बढ़ाएँ :

गत शताब्दी के 'चालीस' की दशक में मैं काफी छोटा था लेकिन मेरा तरुण हृदय  तब भी  "मधुशाला" के मादक प्रभाव से अछूता नहीं बच सका था ! मैं कभी कभार उसकी एकाध चौपाई 'बच्चनजी' के ही अंदाज़ में गा लेता था [ तब तक "मन्नाडे" ने "मधुशाला" नहीं
गायी थी ] ! परन्तु उसके बाद , 'पचास' के  दशक में "इंटर-विध-साइंस" पास करके  इंजीनियरिंग या टेक्नोलोजी की डिग्री हासिल करना तथा आजीविका अर्जित करने के साधन जुटाने के प्रयास में दिन बीतने लगे  ! फलस्वरूप ,लगभग एक दशक के लिए , केवल बच्चन , रामकुमार वर्मा , महादेवी वर्मा , नवीन , सुमन आदि की रचनाओं को संजोये पुस्तकें ही नहीं वरन मिर्ज़ा गालिब और जफर के कलामों के हिन्दी संस्करण की किताबे भी घर की बुकशेल्फ की सजावट बन कर रह गईं !

फिर १९५० से ६० तक ,छोटी बहन माधुरी को आल् इंडिया रेडियो पर गवाने के लिए श्रेष्ठ गीतों की तलाश में "बच्चन जी" की "निशा निमंत्रण"  तथा अन्य कुछ पुस्तके [ सब के नाम अभी याद नहीं आ रहे हैं ] झाड पोंछ कर शेल्फ़ से निकाली गयीं ! पहली खोज में ही "बच्चन जी"  के निम्नांकित ये तींन गीत हाथ लगे ! स्वीकारता हूँ कि उन दिनों ,पूर्णतः   "गदहपचीसी" में स्थापित मेरा २४-२५ वर्षीय 'भोला भाला' हृदय ,इन गीतों की मधुरता से इतना प्रभावित हुआ कि, शब्दों के हाथ आते ही गीतों की धुनें [ स्वर रचना ] गंगोत्री की गंगा के समान मेरे कंठ से स्वतः प्रस्फुटित हुईं !

बच्चन जी के वे तींन गीत थे :

[१] दिन जल्दी जल्दी ढलता है
[२] क्या भूलूं क्या याद करूं मैं
[३] आज मुझसे दूर दुनिया

आश्चर्यचकित न हों ! मेरे द्वारा "स्वर संयोजन" का यूं सहसा ही हो जाना कोई एकाकी घटना नहीं है ! कालांतर में जब सौभाग्य से मैं आकाशवाणी के प्रतिष्ठित संगीतकारों - मुजद्दिद नियाजी , विनोद चेटर्जी , रघुनाथ सेठ  आदि तथा फिल्म जगत के विख्यात  म्युज़िक डायरेकटर्स - मदनमोहन ,चितलकर रामचन्द्र , तथा नौशाद अली साहब आदि  से मिला तो मैंने उनसे जाना कि कैसे , उनकी भी सबसे लोकप्रिय धुनें इसी प्रकार सहसा ही "गंगावतरण" के समान शून्य से उतर कर उनके कंठ से अवतरित हुईं थीं ! प्रियजन , विस्तार से ये कथाएँ ,अवसर मिलने पर फिर कभी सुनाऊंगा,जब ऊपर से तरंगें आयेंगी!

स्वजनों, बिना मधुशाला गाए, जो "बच्चनजी"  की रचनाओं का यह "नशा", पिछले एक पखवारे से चढा है उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है ! सो जरूरी हो गया है कि मैं पहले यह "हैंगोवर" उतार लूँ  , नहीं तो चढ़ी ही रहेगी यह "बच्चन-खुमारी" अनंत काल तक और "भोला" की 'आत्मकथा' अधूरी ही  धरी रह जायेगी !

अस्तु स्नेही स्वजनों , अब सुन ही लीजिए अपने बूढे पोपट से ,उसके अवरुध्द कंठ द्वारा गाया बच्चनजी का यह तीसरा गीत :

आज मुझसे दूर दुनिया
भावनाओं से विनिर्मित , कल्पनाओं से सुसज्जित,
कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनिया
आज मुझसे दूर दुनिया




Painting by our daughter in law - MANIKA  
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आज मुझसे दूर दुनिया 

 बात पिछली भूल जाओ , दूसरी नगरी बसाओ,
प्रेमियों के प्रति रही है हाय कितनी क्रूर दुनिया 
आज मुझसे दूर दुनिया 

वो समझ मुझको न पाती और मेरा दिल जलाती,
है चिता की राख कर में, मांगती सिदूर दुनिया 
आज मुझसे दूर दुनिया 

(बच्चन)
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निवेदक: व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला "
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
एवं 
श्रीमती  मणिका  श्रीवास्तव  
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर सार्थक रचना। धन्यवाद।

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  2. काकाजी और काकी जी को प्रणाम . बहुत दिनों बाद लौटा हूँ ! पिछले पोस्टो को देख और पढ़ा ! लगा जैसे अच्छे पल को मिस कर गया था ! अच्छी कड़ी आप ने शुरू की है ! आनंद आ रहा है और आप के सुर और बेहतर बना दे रहे है !

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