सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

कैसे जियें ? सतत सेवारत रहो

कैसे जियें - हम रिटायर्ड लोग  ?
 संत महात्माओं का कथन है: 
"सेवा करो"
"सेवारत" रहकर अपना लोक-परलोक दोनों संवार लो !"
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सेवानिवृत होकर अब पुनः सेवा करें ? किसकी ? कैसे ?
सद्गुरु स्वामी सत्यानन्दजी महाराज ने सेवाधर्म को सर्वोच्च धर्म बताया 




स्वामी जी ने अपने सदग्रंथ "भक्ति प्रकाश"  के "सेवा" प्रकरण में कहा :

सेवा धर्म सुधर्म है, है यह उत्तम काम 
अर्पण कर भगवान को कर सेवा निष्काम !!
अहम भावना त्याग कर और छोड़ अभिमान !
स्वार्थ परता त्याग कर सेवा हो गुण खान !!
सेवा में सब गुण बसें ,पुण्य कर्म उपकार !
दया दान हित नम्रता , उन्नति पतित सुधार !!
परमारथ यह समझिए, परम धाम सोपान !
परम प्रभू की साधना , दायक उत्तम ज्ञान !!
हाथ जोड़ मांगूं हरे ,सेवा कृपा प्यार 
विनय नम्रता दान दे , देना सब कुछ वार !!
तेरे जन के हित लगे , तन मन.धन सब ठाठ!
आत्मा तुम में ही रमे , मुख में तेरा पाठ !!
साधो ! सेवा साधिए मन से मान  मिटाय !
हरिजन को संतोषिए , ऊंच नीच भुलाय !!


इस ८५ वर्षीय जर्जर काया से अब क्या सेवा होगी ?
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आज अपनी इन शारीरिक दुर्बलताओं के कारण हमे कभी कभी असहनीय ग्लानि और चिंता होती है कि, जीवन पथ के अंतिम पड़ाव पर डगमगाते पैरों पर खड़े हम-- क्षमताहीन अस्वस्थ बूढे,  भारतीय, सनातन मूल्यों पर आधारित कर्मकाण्ड सम्मत "साधना","उपासना" "आराधना" और पूजा पाठ कैसे कर पायेंगे और कैसे हम अपने सद्गुरु द्वारा इंगित उपरोक्त "सेवा-पथ" पर चल पायेंगे ? 

प्रियजन ! संतमहात्माओं का कहना है कि ऎसी चिंता होनी स्वाभाविक है !सेवा की व्याख्या करते हुए इन महात्माओं ने "सेवाधर्म " निभाने के लिए अनेक सरल मार्ग भी दर्शाये !

अपने अगले आलेख में विस्तार से उन अन्य सुगम मार्गों को दिखाने का प्रयास करूँगा जो  महात्माओं ने हमे बताये हैं !  

अभी , अपने आध्यात्मिक सद गुरुजन के मार्गदर्शन से "भजन गायन " की जिस "सेवा" पगडंडी पर मैं १९५९ से अब तक चला और अब भी चल रहा हूँ और जिसका मधुरतम "सुफल" , न चाहते हुए भी मैंने आजीवन पाया उसका एक उदाहरण प्रस्तुत कर दूँ  ! 

आजकल भजन गायन "सेवा" में मैं अपना अधिकतर समय लगाता हूँ ,! कांखते , खांसते, कराहते  आहें भर भर के, दिन भर के २४ घंटों में से २२ घंटे बिस्तर पर समानंतर समतल लेटेलेटे भी मैं गाता रहता हूँ ---------

अपने सद्गुरु के अतिरिक्त , एक नहीं अनेक, महात्माओं ने मुझे "स्वर में ही ईश्वर दर्शन" करते हुए भजन-कीर्तन-गायन द्वारा स्वयम "निज की सेवा" के साथ साथ श्रोताओं की सेवा करते रहने की प्रेरणा दी ! मैंने अपनी आत्म कथा में विस्तार से इसका वर्णन किया है ! सभी महात्माओं ने मुझे निष्काम भाव से , अहम एवं  सुफल की कामना त्याग कर आजीवन गाते रहने को प्रोत्साहित किया ! और मुझे ऐसा लगता है कि वे ही मुझे इतनी शक्ति दे रहे हैं कि मैं आजतक उनके द्वारा निदेशित सेवा कर पा रहा हूँ !

सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी के आदेशानुसार "भक्ति प्रकश " के "सेवा प्रकरण" के उपरोक्त दोहे आपको सुना रहा हूँ ! समय हो तो अवश्य सुने !


http://youtu.be/odZEXHGS118

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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग:  श्रीमती कृष्णा "भोला" श्रीवास्तव 
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बुधवार, 14 जनवरी 2015

उनकी याद में जियें

 "उनका" स्मरण होना -"उनकी" याद का आना 
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प्रज्ञाचक्षु स्वामी शरणानंद जी महाराज के प्रेरणाप्रद प्रवचनों पर आधारित 
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 हमे "उसकी"ही याद आती है जिससे हमारा प्यार का कोई नाता होता है  ! "
 यदि प्रेमास्पद की" याद हर घड़ी बनी रहें तो जानो इस से ही आपके द्वारा उसकी "उपासना" हो गयी !

और जब ऐसा लगने लगे कि अब "उन्हें" याद किये बिना जीना दुश्वार है ,
और हर पल उस प्रेमास्पद की आवश्यकता महसूस होने लगे तब समझो कि 
तुम्हारी आराधना संपन्न हो गयी ,तुम्हारी  दुआ कबूल हो गयी !!  
  
"वह" कौन है जिसकी याद सतत बनाये रखने की सलाह गुरुजन हमे देते हैं  ? 
गुरुजन के शब्दों में ही इस प्रश्न का उत्तर है कि 
"वह "कोई और नहीं ,,हमारा "प्यारा प्रभु" है ! 
प्रभु की अनंत महिमा स्वीकार करके  अबोघ साधक भी अनायास ही "उनकी"स्तुति में  मुखर हो जाते हैं!


अस्तु प्रियजन 
प्रभु से प्रगाढ प्रीति करो
कैसे ?
उनकी महिमा का गान  करो ,
उनका असितत्व स्वीकारो
उसकी महत्ता का अनुभव करो  
इन तीनों साधनों से उनसे आपकी प्रीती प्रगाढ़ होगी 
प्रीति में गहनता आयेगी , उपासना से प्रभु से अपनत्व स्थापित होगा !!

प्रज्ञाचक्षु स्वामी श्र्नानान्द्जी के शब्दों में :

प्यारे प्रभु को 'मेरे नाथ 'कह कर संबोधित करते ही हृदय में भास् होता है कि हम अनाथ नहीं हैं ,कोई हमारा अपना है जो कठिनाइयों की घड़ी में हमारी सहायता करने को सर्वदा ही तत्पर है केवल वह ही हमारा अपना है वह सर्वशक्तिमान है वह सर्वसमर्थ है  !अब आप सोचिये कि ऐसे शक्तिमान और समर्थ रक्षक  के होते हुए हमारे और आपके जीवन में चिंता का कोई स्थान नहीं रह जाता !

इस सन्दर्भ में हमारे आध्यात्मिक गुरुदेव ने एक पत्र में मुझे लिखा कि "याद" कभी एकतरफा नहीं होती"! उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा कि एकदिन वह दिल्ली में साधकों से मेरे [ इस दासानुदास के ] विषय में कुछ बात कर रहे थे कि पोस्ट द्वारा एक विदेशी लिफाफा उनके पास आया जिसके  ऊपर भेजने वाले का नाम श्रीवास्तन - यू एस ए  लिखा था ! सब बोले "महाराज जी हम उनकी बात कर रहे थे और उनका पत्र ही आ गया ! जब वो लिफाफा खुला तो उसमे पत्र किसी अन्य श्रीवास्तव का निकला ! 

लगभग एक सप्ताह बाद महाराज जी को यहाँ अमेरिका से भेजा मेरा पत्र मिला ! महाराजजी उस समय भी उन्ही साधकों से वार्तालाप कर रहे थे , उन्होंने साधकों से कहा कि ७ दिन पूर्व जिस समय वह दिल्ली में मेरे विषय में साधकों से बात कर रहे थे उस समय "मैं" [उनका श्रीवास्तवजी] अमेरिका में उनके नाम पत्र लिख रहा था ! महाराज जी ने इस प्रकार साबित किया कि सचमुच याद एकतरफा नहीं होती ! वास्तविक याद दोनों तरफ से होती है ! महाराज जी ने यहाँ यू एस ए में मुझसे मिलने पर इस संदर्भ का एक शेर भी भी मुझे सुनाय!वह शेर था "मुमकिन नहीं कि आग बराबर लगी न हो "! याद की आग दोनों चोरों पर बराबर ही लगती है !

महाराज जी ने अक्सर यह भी कहा है कि आप प्रभु को तभी याद करोगे जब प्रभु आप पर कृपा करेंगे ,और प्रभु तभी कृपा करेंगे जब प्रभु को आपकी याद आयेगी ! आवश्यक है कि आप इतनी गहनता से प्रभु को याद करें कि प्रभु भी आप को याद करने के लिए मजबूर हो जाएँ !  सिद्ध महापुरुष के चोले में अवतरित गुरुजन साक्षात प्रभु के प्रतिरूप हैं ! देवीसंपदा युक्त समर्थ गुरुजन भी योग्य साधकों पर ऎसी ही कृपा करते रहते हैं !

प्रियजन  

अपने अपने इष्ट देव - प्यारे प्रभु को भजन कीर्तन द्वारा सतत याद करते रहो ! प्रतिउत्तर में प्रभु के प्रसाद स्वरूप उनकी दया वृष्टि तुम्हे सदा आनंदित रखेगी ! भजन कीर्तन गायकी द्वारा  जहां हम उन्हें याद करते हैं वहीं सुनने वाले सभी लोगों को भी "उनकी" याद आ जाती है ! इस निष्काम सेवा के फल स्वरूप प्रभु के प्यारे उनकी महिमा का गान करने वाले साधक सदेव आनंदित रहते हैं ! ,  

अनेकों बार का ऐसा मेरा निजी अनुभव है इससे अधिकार से कह रहा हूँ ! 
हमारी ओर से आप सब प्रिय पाठकों के लिए यह नये वर्ष का विशेष सन्देश है !
"प्रभु को सतत याद करते रहो" 

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निवेदन 
व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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