बुधवार, 31 अगस्त 2011

हमारे सद्गुरु और हरिओम शरण जी


बालक "हरिओम शरण" - पर गुरुजन की कृपा
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(गतांक के आगे)



फरवरी १९८४ के उस शनिवार की देर रात्रि तक हरिओम शरण जी और उनकी धर्मपत्नी नंदिनी जी ने कानपूर की मोती झील स्थित सभागार में, अपने मास्टरपीस भजन सुनाकर नगर के भक्ति-संगीत के प्रेमी जन समुदाय को आनंदित किया और फिर हमारे स्थान पर रात का भोजन पाकर हमारे अतिथिगृह में विश्राम किया !

रविवार के प्रातः ८ बजे से , नियमानुसार हमारी कोठी के मंदिर में गुरुदेव श्री प्रेमजी महाराज
के आदेशानुसार आयोजित ,साप्ताहिक "श्री राम शरणम - अमृतवाणी सत्संग " में भाग लेने के लिए स्थानीय साधकगण एकत्रित हुए और बड़े आनंद से अपना सत्संग संपन्न हुआ !

यह जान कर कि प्रसिद्ध भजन गायक "हरिओम शरण जी" हमारे साथ ठहरे हैं , सब साधकों की बड़ी इच्छा थी कि हमारे सत्संग में भी हरिओम शरण जी तथा उनकी पत्नी के कुछ भजन हो जाएँ ! इस उद्देश्य से ,बीच बीच में बच्चे उठ कर अतिथिगृह के आसपास जाकर आहट लेते रहे कि यदि वे तैयार हों तो उन्हें सत्संग में बुला लाएं पर अंत तक वे असफल रहे!

सत्संग के समाप्त होते ही , जब साधकगण प्रस्थान कर रहे थे ,और कृष्णा जी अपनी पारंपरिक पूजा का "किशमिश" प्रसाद वितरित कर रहीं थीं ,अचानक " हरीओम जी " और नंदिनी जी मंदिर के द्वार पर किशमिश के लिये हाथ फैलाए दिखाई दिए ! प्रसाद पाते ही वह एक तरह से दौड पड़े और मंदिर में स्थापित सद्गुरु - श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के लाइफसाइज़ कटआउट के श्री चरणों पर अपना मस्तक रख दिया और गदगद कंठ से मुझे सम्बोधित कर के बोले --" भोला भैया ! आपने हमे कल रात को ही क्यों नहीं बताया कि आपके स्थान पर रविवार को श्री स्वामी सत्यानन्द जी द्वारा रचित "अमृवाणी" का पाठ होता है "! उनके मुंह से स्वामीजी का नाम सुनकर तथा यह जान कर कि उन्हें "अमृतवाणी जी" के प्रति इतनी गहन श्रद्धा है , हम सब आश्चर्य चकित हो गए ! सभी यह जानने को उत्सुक हो गए कि क्या "हरी जी" भी किसी प्रकार , "श्री राम शरणम" से अथवा हमारे गुरुजनों से सम्बंधित हैं ? उनसे भजन सुनने की जगह अब हम सब उनके मुंह से अपने स्वामी जी के विषय में जानकारी प्राप्त करने को उत्सुक हुए और उन्हें घेर कर वहीं बैठ गए !

हरिओम शरण जी ने बताया कि बचपन से ही उनके हृदय में भगवत भक्ति के भाव जागृत हो गए थे ! वह अपने पारिवारिक पेशे में तनिक भी रूचि नहीं रखते थे ! (एक बात बताऊँ ,इत्तेफाक से ये वह पेशा है जो मेरे - जी हाँ मेरे इस मनुष्य जन्म में , हमारे "प्यारे प्रभु" ने , किंचित प्रारब्धवश , हमारे वर्तमान जीवन के निर्वाह हेतु नियत कर रखा है ! यह वही पेशा है जो संत रैदास जी की रोज़ी रोटी का भी आधार था ) !

हाँ तो,उन्होंने बतलाया कि उनका मन सदा प्रभु राम और श्री हनुमान जी के गुण -गान भरे भजन गाने और उनका संकीर्तन करने में लगा रहता था!इसलिए वह अक्सर अपने घरवालों से चोरी छुपके ,नज़र बचा कर , दूर दूर तक संतों के प्रवचन तथा श्रीमदभागवत गीता और बाल्मीकि एवं तुलसी कृत रामायण के संगीतमय सत्संगों में सम्मिलित होने चले जाते थे !

भारत के विभाजन से पूर्व उन्होंने अपने जन्मस्थान पंजाब के लाहौर शहर में रामायण का अति सरस संगीतमय प्रवचन सुना ! प्रवचन कर्ता संत स्वामी श्री सत्यानान्दजी महांराज के चुम्बकीय आकर्षक व्यक्तित्व तथा उनकी सधी हुई सुरीली ओजपूर्ण आवाज़ ने उन्हें इतना आकर्षित किया कि वे नित्य प्रति उस सत्संग में जाने लगे !

उस समय के कट्टरपंथी सनातनी पंडितों के आतंक से बालक "हरीओम" संकोचवश पंडाल के भीतर तक नहीं जाते थे अत : द्वार पर ही जनता की जूतियों के निकट उन्हें साफ करने के बहाने वे चुपचाप बैठे रहते थे ! वे बडे ध्यान से कथा वाचक संत के प्रवचन सुनते थे और उनके स्वर में स्वर मिलाकर , अति ऊंची आवाज़ में ,तार सप्तक पर , उन संत जी के शब्दों (भजनों) तथा कीर्तनों की धुनों का अनुकरण करते थे !

प्रवचन के समापन पर जब संत स्वामी श्री सत्यानान्द्जी व्यासपीठ से उठ कर पंडाल के द्वार से बाहर जाते तो बालक हरीओम उन की ब्राउन रंग की मोजरी (जूती) अपने अंगौछे से चमका कर, उनके चरणों के आगे रख देता था ! यह उसका नित्य का कार्यक्रम था ! मोजरी पहन कर स्वामी जी मुस्कुराते हुए , आशीर्वाद की मुद्रा और प्रशंसा भरी दृष्टि से हरिओम की तरफ देखते थे ,हाँ , केवल देखते भर थे और सीढ़ियों से उतर कर बालक हरी को जाते समय दो किशमिश के दानों का प्रसाद देते जाते थे !

प्रेरणास्रोत किशमिश के दो दाने

कृष्णाजी से प्रसाद के रूप में प्राप्त दो किशमिश के दानों ने हरी ओम शरण जी को सहसा उनके बचपन के दिन याद दिला दिये ! पार्टीशन से पहले , लाहौर में स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के प्रवचन के बाद ,उनके हाथों से प्राप्त अमृततुल्य दो किशमिश के दानों की स्मृति उन्हें आनंद से भर रही थी !

कथा का समापन करते हुए , सजल नेत्रों और अवरुद्ध कंठ से उन्होंने मुझसे कहा " भोला भैया , मैं जानता हूँ , यहाँ और कोई माने या न माने ,आप जरूर विश्वास करेंगे कि गायकी तथा गीतों की शब्द एवं स्वर रचना के क्षेत्र में मुझे जीवन में जितनी सफलता मिली है , वो सब ,बचपन में ही स्वामी सत्यानन्द जी महाराज से प्राप्त आशीर्वाद एवं उनके प्रोत्साहन तथा प्रेरणा को संजोये किशमिश के दो दानों के ही कारण है !

हमारे सत्संग भवन में , अपने अतीत के पन्नों को पलटते हुए हरी जी ने उपरोक्त संस्मरण हमें सुनाये थे ! शैशव में ही , स्वामीजी की कृपा दृष्टि से बालक हरिओम को जिस दिव्य आनन्द की अनभूति हुई थी उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ था ,वह उनके मन और बुद्धि पर ऐसी अमिट छाप छोड़ गया जो आजीवन उनकी विभिन्न भक्ति रचनाओं में प्रतिबिम्बित हुई और उनके मधुर गायन के द्वारा समस्त संसार को आनंदित करती रहीं !



(ऊपर के चित्र में १९७० के दशक में हरिओम शरण जी से , उनकी भावपूर्ण रचनाओं को सुनते हुए His Masters Voice (Recording Company) के तत्कालीन संगीत निर्देशक मुरली मनोहर स्वरूप जी जिन्होंने हरिओम जी तथा मुकेशजी के अनेक प्रसिद्ध भजनों को संगीत- बद्ध किया था ! हरी जी की " मैली चादर" , और " उद्धार करो भगवान तुमरी सरन पड़े " तथा अन्य भजन और मुकेशजी के अनेक भावपूर्ण भजनों को स्वरबद्ध किया ! --- कुछ ऐसा याद आ रहा है कि जैसे मुरली बाबू से हमारी भेंट आकाशवाणी लखनऊ के स्टूडियो में १९५०-६० के दशक में हुई थी )

आप को ऐसा लग रहा होगा कि मैं ट्रैक बदल रहा हूँ ,लेकिन ऐसी कोई बात नहीं है ! सच पूछो तो मैं अब धीरे धीरे वापस अपनी ट्रैक पर आ रहा हूँ ! "उनकी"कृपा हुई तो कल से मुकेश जी की कथा चालू हो जायेगी !

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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मुकेश जी की सभा में हरिओम शरण जी -


"आनंद की अनुभूति में हरि दर्शन "
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मेरे पिछले दो आलेखों पर मेरे लिए दो चार ही सही पर बड़े ही "आनंददायक" कमेन्ट आये ! प्रियजन ,मुझे तो इस "आनंद" में ही "आनंदघन - मेरे प्यारे प्रभु का दर्शन होता है" ! मैं धन्य हो गया ! मेरी साधना सफल हुई , मेरी हल्की आवाज़ भी आप सहृद स्नेहियों तक पहुंच रही है ! अपने प्यारे प्रभु का "प्रेम सन्देश" आप तक पहुचाने में मैं सफल हुआ ! मेरी सेवा , आप सब के हृद्यासन पर बिराजे , "मेरे मालिक" को पसंद आई इससे अधिक मुझे और कौन सा ईनाम चाहिए ? मेरा मन गदगद हो कर कह रहा है :

नाथ आज मैं काह न पावा , मिटे दोष दुःख दारिद दावा
अब कछु नाथ न चाहिय मोरे , दीन दयाल अनुग्रह तोरे
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सिंगापुर निवासिनी अपनी एक बहू (कृष्णा जी के भतीजे अनिल बेटे की धर्म पत्नी ,जिनको मैं स्नेहवश "रानी बेटी" ही कहता हूँ , के कमेन्ट के उत्तर में मैंने जो कहा ,नीचे लिख रहा हूँ ,पढ़ कर मेरे सब स्नेही स्वजन मेरे विचार तथा हृदयोद्गार से अवगत हो जायेंगे !
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रानी बेटी इंदुजा , राम राम ,

अपने ब्लॉग पर तुम्हारा कमेन्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा ! बेटा मैं जो कुछ कहता हूँ , सब अपने निजी अनुभव के आधार पर कहता हूँ ! ८२ - ८३ वर्ष के इस जीवन में प्रति पल मैंने प्रभु की इस समग्र सृष्टि के कण कण से केवल "प्रेम ही प्रेम" पाया है ! मेरी अनुभवों की झोली में केवल प्रेम ही प्रेम है ,अपने स्वजनों के बीच उसका वितरण करके मैं इस जीवन के एक एक पल में आनंद लूट रहा हूँ और वह लूटी हुई सम्पत्ति , सबको ही अनवरत लुटाते रहना चाहता हूँ !

यह जान कर कि पाठकों को मेरे आलेखों में "आनंद घन - प्रियतम प्रभु " के दर्शन होते है मेरे आनंद की कोई सीमा नहीं रहती ! मैं जानता हूँ कि यह भी "उनकी" ही अहेतुकी कृपा के फलस्वरूप है ! बेटा , मैं अपने इन निर्बल अंगों से क्या कर सकता हूँ ?

"उन" पर भरोसा बनाये रखो ! "उनसे" और "उनकी कृतियों" से प्यार करो और फिर प्यारे प्रभु के आनंद-अमृत का रसास्वादन करती रहो !

शुभाकांक्षी
तुम्हारा भोला फूफाजी
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चलिए गयाना के न्यू एम्सटरडम लौट चलें ! श्री जैक्सन की कोठी में मेरे स्वागत के लिए आयोजित उस शाम के संगीत समारोह का प्रारम्भ गयाना के एक गायक के द्वारा प्रस्तुत "हरि ओम शरण जी" के गणपति वंदन - " स्वीकारो मेरे परनाम से हुआ " !

शायद आप जानते हों कि "हरिओम शरण जी" तब तक ,अपने भजनो के जरिये ,केरेबियन के सभी देशों में बहुत मशहूर हो चुके थे ! वह वहाँ इतने प्रसिद्ध हुए कि , यह जानते हुए भी कि वह एक प्रकार से विरक्त सन्यासी हैं ,उन देशों - त्रिनिदाद टोबेगो , गयाना ,बारबेडोस ,एंटीगा , जमाइका आदि की अनेक भारतीय मूल की कन्याएं स्वदेश छोड़ कर ,उनके साथ भारत जा कर उनकी शिष्या तथा गृहणी तक बनने की इच्छुक हो गयीं थीं !

अन्त्तोगत्वा यहीं की एक कन्या उनकी धर्मपत्नी बनी और उनके जीवन के अंतिम क्षण तक वह उनका साथ अति श्रद्धा युक्त प्रेम से निभाती रहीं ! श्रद्धा इसलिए कि एक तरफ वह उन्हें अपना आध्यात्मिक और संगीत गुरु मानती थीं , और दूसरी ओर "हरी जी" उनके पति परमेश्वर तो थे ही !

१९८३ में , हरीओम शरण जी एवं उनकी धर्म पत्नी ( क्षमा करियेगा हम दोनों ही उनका नाम याद नहीं कर पा रहे हैं ) , कानपूर की हमारी सरकारी कोठी "टेफ्को हाउस" में दो दिनों के लिए हमारे मेहमान बन कर रहे ! इन दो दिनों में हमारी उनसे काफी घनिष्ठता हो गयी ! लेकिन उसके बाद हम उनसे नहीं मिल सके ! हरी जी के निधन के बाद अब उनकी धर्मपत्नी कहाँ है हम नहीं जानते ! हम स्वयम पिछले ७-८ वर्षों से , भारत से हजारों मील दूर यहाँ नोर्थ अमेरिका में पड़े हैं !

जो चित्र आप नीचे देख रहे हैं उसमे "हरी जी" और उनकी धर्मपत्नी "नंदिनी जी " ( देखा आपने कैसे ,एक साथ ही मुझे और कृष्णा जी दोनों को ही ,भूला हुआ उनका नाम एकाएक याद आगया ) को , कृष्णा जी अपनी कानपूर की कोठी में स्वयम अपने हाथों से भोजन परस रहीं हैं ! अन्य अथिति और मैं मेज़ के दूसरे छोर पर बैठे हैं !
कृष्णाजी , हरि ओम शरण जी तथा उनकी पत्नी नंदिनी जी
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हमारे प्रमुख सम्पाद्क महोदय (प्यारे प्रभु) कब कहाँ और कैसे मेरी कथा को घुमा देते हैं वह ही जानें ! मैं तो वही लिखता हूँ , "वह" जो लिखवाते हैं !
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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Posted by Picasa