रविवार, 28 अक्टूबर 2012


सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की कृपा के 
अनुभव 

इस जीवन के एक एक पल में मैंने अपने प्यारे सद्गुरु की अपार कृपा का अनुभव किया है ! मुझे ऐसा लगता है जैसे इस जीवन में किया हुआ मेरा कोई भी कृत्य स्वामी जी की कृपाजन्य शुभ प्रेरणाओं के बिना मुझसे हो ही नहीं सकता था ! उनकी कृपा के बिना मैं, जीवन भर आधा अधूरा क्या , मात्र एक बड़ा शून्य ही बना रह जाता ! स्वामीजी की कृपा जन्य उपकारों की गणना करना असम्भव है !  मेरा मन कहता है 



हे स्वामी

तेरे गुण उपकार का पा सकूं नहि    पार 
रोम रोम कृतग्य हो  करे सुधन्य  पुकार

[स्वामी सत्यानन्द जी की "भक्ति प्रकाश'" से ]  

प्रियजन , इससे पूर्व मैंने अनेकों बार जोर दे कर कहा है कि मेरे आध्यात्मिक दीक्षा-गुरू ,श्रद्धेय स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ,प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में मेरी सारी सांसारिक उपलब्धियों ,तथा जीवनयापन हेतु किये मेरे सभी कर्मों ,की सफलता के साथ साथ मेरी समग्र आध्यात्मिक प्रगति के मूल कारण और मेरे बल-बुद्धि के एकमात्र स्रोत थे !  [प्रियजन स्वामी जी महाराज को "थे " कहना सर्वथा अनुचित है , भूल से लिख गया]




स्वामी जी  आज भी हमारे अंग संग हैं ! वह , हमारी मनोभावनाओं में, हमारे चिंतन और विचारों में इस क्षण भी उतने ही जीवंत और क्रियाशील हैं जितने वे आज से , ५६ वर्ष पूर्व मेरे दीक्षांत की घड़ी में थे ! 

मेरे दीक्षा के समय की विशेष स्थिति 


नवम्बर १९५९ में मुरार -ग्वालियर के सौदागर संतर  में डॉक्टर देवेन्द्र सिंह जी बेरी   के    निवास -स्थान पर ,उनकी पूजा की १० बाई १० की कोठरी में ,एक दूसरे से केवल हाथ भर की दूरी पर बिलकुल एकाकी ,मेरे सामने बैठे थे, नवोदित सूर्य की स्वर्णिम किरणों के समान जगमगाते परम आकर्षक व्यक्तित्व वाले मेरे सद्गुरु प्रातः स्मरणीय परम श्रद्धेय स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ! 

जरा सोचें , इससे अधिक एकाकी सामीप्य ,उस देवतुल्य महापुरुष का कब और किसे मिला होगा ?

एक कन्फेशन करूं ,प्रियजन स्वामीजी के तेजोमय  मुखमंडल पर मेरी आँखें कुछ एक पल से अधिक ठहर ही न सकीं ! महाराज जी के चहुँ ओर फैली ज्योतिर्मयी आभा और उनके तेजस्वी स्वरूप की चकाचौंध में मैं अपनी सुध बुध खो बैठा ! उसके बाद मुझे ,न तो समय का भान रहा न वस्तुस्थिति का ज्ञान ! 

मैं मंत्र मुग्ध सा  बैठा हुआ वह सब करता रहा जिसका आदेश स्वामी जी ने वहाँ , मुझे दिया ! आदेश पालन में मुझसे अवश्य ही कोई बड़ी भूल नहीं [ जी हाँ नहीं ] हुई होगी, तभी तो दीक्षा के उपरांत सही सलामत बच गया ! 

दीक्षा के समय की मेरी मनः स्थिति व्यक्त हैं संत ब्रह्मानंद जी के इन शब्दों में  --


किस देवता ने आज मेरा दिल चुरा लिया 
दुनिया कि खबर ना रही तन को भुला दिया 

सूरज न था न चाँद था बिजली न थी वहाँ ,
इकदम ही अजब शान का जलवा दिखा दिया 

स्वामी जी जैसे सिद्ध महापुरुष से ,"राम नाम" का  मंगलकारी गुरू मंत्र पाना स्वयमेव एक अनमोल उपलब्धि है !  मेरे विचार में मेरी  दीक्षा के समय की उपर वर्णित विशेष स्थिति , श्री राम शरणम के आम दीक्षा समारोहों से निश्चय ही बहुत भिन्न थी ! 


जो भी हो प्रियजन ,मुझे आज इस पल भी  उस दिव्य घड़ी के स्मरण मात्र से सिहरन हो रही है - वह शुभ घड़ी जब मेरे जैसे कुपात्र की खाली झोली में , स्वामी जी महाराज ने अपनी वर्षों की तपश्चर्या दारा अर्जित " राम नाम " की बहुमूल्य निधि डाल दी थी !


नहीं जानता कि अन्य कितने ऐसे भाग्यशाली साधक हैं जिनको स्वामी जी महाराज ने वैसे ही  एकांत में दीक्षा दी , जैसे उन्होंने मुझे दी थी ! काश मैं ऐसे अन्य साधकों से मिल सकता ! लेकिन दुःख तो ये है कि मेरे लिए अब भारत जाने की सम्भावनायें बहुत कम हैं और मुझे लगता है कि जो वैसे साधक अभी  हैं उनकी दशा भी मेरी जैसी है : सब के सब ही मेरी तरह------- कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं 

बहुत हैं जा चुके ,   बाकी जो हैं तैयार बैठे हैं 
कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं 

  न छेड़ अय निगहते बादे बहारी राह लग अपनी 
तुझे   अठखेलियाँ   सूझीं हैं    हम  बेज़ार बैठे हैं 
कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं 

श्रीराम शरणं के संस्थापक  स्वामी जी महाराज मुझे दीक्षित करने के एक वर्ष बाद ही यह संसार छोड़ गये ! प्रियजन , मैं दुर्भाग्य नहीं कहूँगा उनके बिछोह को !  आप पूछेंगे क्यूँ ? मेरी अपनी क्या दशा हुई -भाई ! एक भेद की बात बताऊँ , उनकी ही कृपा से तब से आज तक के अपने जीवन  के लगभग ५५   वर्षों में  मैं पल भर को भी निगुरा नहीं रहा ! बाबा के उत्तराधिकारी  श्री प्रेम जी महाराज  और उनके बाद परम श्रद्धेय डॉक्टर विश्वमित्तर जी महाराज का आश्रय और स्नेहिल आशीर्वाद मुझे मिला और  उन्होंने हर प्रकार से मुझे सम्हाला !

क्रमशः 
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निवेदक : व्ही.  एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग:  श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

सद्गुरु कृपा

"माँ " हमारी प्रथम सद्गुरु 

महापुरुषों से सुना एक चिरंतन सत्य है -"इस धरती पर जन्मा कोई भी जीव अपनी "माँ" के होते हुए कभी भी 'निगुरा' अर्थात- 'गुरू विहीन' नहीं है "!  जीव' को उसका यह प्रथम गुरू उसके जन्म से पूर्व ही मिल जाता है और उसकी यह जननी "माँ" , आजीवन उसकी "गुरू" बनी उसका मार्ग दर्शन करती है ! वही उसकी प्रथम सद्गुरु है ! 

अपनी 'माँ' का , बल- बुद्धि- ज्ञानप्रदायक अमृततुल्य "पय"पान कर "जीव" शनै शनै विकसित होकर सम्पूर्ण मानव बन जाता है !  

उपदेशक एवं "आध्यात्मिक सद्गुरु"  अथवा "दीक्षा गुरू "   

जीवनयात्रा में  जीव के पथ पर सदैव उसके साथ चलते हैं उसके "उपदेशक गुरू" तथा उसके आध्यात्मिक सद्गुरु ("दीक्षा गुरु") ! प्यारे प्रभु की विशेष अनुकम्पा प्राप्त मानव अपने इन गुरुजन की शिक्षा-दीक्षा तथा आशीर्वाद एवं उनके  अनुग्रह से सिंचित हो कर आजीवन फूलता फलता रहता है ! 

उपदेशक- गुरू 

'सद्गुरु'  के अतिरिक्त मनुष्य के साथ सतत बने रहने वाला गुरू है "उपदेशक गुरू"! 

मनुष्य का निर्मल आत्मा  ही  उसका उपदेशक गुरू है ! यह शुद्ध आत्मा अपने हित -अहित का निर्णय स्वयम करने में पूर्ण समर्थ है !  लेकिन ऐसा देखा ग्या है कि अशांत व विक्षिप्त बुद्धि वाले शिष्य अपने अंत:करण के इन सूक्ष्म आदेशों को सुनने और समझने में असमर्थ रहते हैं ! 

श्रीमदभागवत पुराण के एकादश स्कंध [अध्याय ७ श्लोक २० में] योगेश्वर श्री कृष्ण ने उद्धव को उपदेश देते हुए  कहा है कि मनुष्य का आत्मा  ही  उसके हित और अहित  को दर्शाने वाला "उपदेशक गुरू" है ,जो सद्गुरु के समान  पल भर को भी अपने शिष्य का साथ नहीं छोड़ता !

सद्गुरु श्री विश्वामित्र महाराज ने अपने प्रवचन में इस सूत्र की ओर संकेत करते हुए कहा   कि जीवन काल में जीव का वास्तविक आध्यात्मिक दीक्षा -गुरू केवल एक ही होता है !  दीक्षा एक रहस्यमयी प्रक्रिया है जिसे केवल वास्तविक समर्थ गुरू ही कार्यान्वित कर पाते हैं  ! ऐसे  ही सक्षम सद्गुरु  शिष्यों को दीक्षित करने के अधिकारी हैं ! अपने  बाबा गुरू श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज पूर्णतः सक्षम थे !

सद्गुरु एक कवच के समान अपने शिष्य के शरीर को हर तरफ से ढंक कर उसकी रक्षा करता रहता है ! वह योगेश्वर कृष्ण के समान जीवन रण में अर्जुन जैसे अपने शिष्य को उचित निर्देश भी देता रहता है ! 

वास्तविक समर्थगुरू अपने शिष्य को पल भर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता ! जहाँ वह सशरीर पहुंच कर  शिष्य का कष्ट निवारण नहीं कर पाता वह वहाँ सूक्ष्म रूप में पहुंच कर "प्रेरणा" बनकर ,शिष्य की शंकाओं का समाधान कर देता है ! 

कभी कभी आध्यात्मिक सद्गुरु अपने  शिष्य का साक्षात्कार अन्य सक्षम गुरुजनों से करा कर उसे चिंता मुक्त कर देता  है  !   इस प्रकार सदाचारी जीवन जीने के लिए 'जीव' को अन्य सक्षम गुरूओं से शिक्षा ग्रहण करने की व्यवस्था सद्गुरु स्वयं कर देता है !  उसे छूट है अन्य शिक्षा गुरुओं से उपदेश प्राप्त कर  आध्यात्मिक प्रगति करने की !  

चलिए अपनी निजी अनुभूतियों की ही बात आगे बढाएं !  हाँ तो  जन्मदात्री "माँ" मेरी भी प्रथम गुरू थीं ! उन्होंने बचपन में ही मेरे मन में "प्रेम भक्ति" का बीज आरोपित कर दिया  था ! उसके बाद जीवन में अनेक शिक्षा गुरू और उपदेश गुरू मिले जिन्होंने मेरी लौकिक-यात्रा पर प्रगति करने का सम्बल दिया !  इस बीच नवम्बर १९५९ में तीस वर्ष की अवस्था में मुझे उच्च कोटि के महान  समर्थ सदगुरु  प्रातः  स्मरणीय श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज से दीक्षित होने का सौभाग्य मिला ! आइये ---

  गुरू को करिए वन्दना भाव से बारम्बार 
नाम सुनौका से किया जिसने भाव से पार  

 अनुभूतियों की आत्म कथा फिर भी अधूरी रह गयी , क्रमशः अगले अंकों में पूरी करूँगा 
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 सब पाठकों को "विजय दशमी" की हार्दिक शुभकामनायें 
   
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 निवेदक : व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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