सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

मंगल भवन अमंगल हारी

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राम नाम मुद मंगलकारी
विघ्न हरे सब पातक हारी
(अमृतवाणी)
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अब तो ऐसा लगता है जैसे यह भी भूल गया कि अंतिम सन्देश कब भेजा था ? क्या लिखा था उसमे मैंने ? एक बात और बताऊँ अभी अभी जब कम्प्यूटर चालू किया उस क्षण मुझे यह भी समझ में नहीं आ रहा था कि "नया सन्देश" कैसे शुरू किया जाता है ! कुछ समय लगा लेकिन शीघ्र ही "उन्होंने" कृपा कर दी , धीरे धीरे सम्हल गया ! कितनी कृपा है उनकी?
इतने दिनों तक , अपने "प्यारे प्रभु" के मूक आदेश का पालन करके मूक रहा और आज अब उनकी ही आज्ञा तथा कृपा से प्राप्त शक्ति के सहारे मुखर भीहो रहा हूँ ! जितना वह बोल रहे हैं उतना ही लिख रहा हूँ !

लगभग एक सप्ताह पूर्व जब लेखन रुका था , उन दिनों , हम दोनों के (कृष्णा जी और मेरे) मन में एक साथ ही यह प्रेरणा हुई थी कि अगला सन्देश अपने परम कृपालु ,"मंगल भवन अमंगलहारी - दसरथ अजर बिहारी" को "द्रवित "कर उनकी कृपा का आवाहन कर के शुरू करें , लेकिन हम वैसा नहीं कर सके ! मित्रों, विश्वास कीजिए कि उसके बाद हमने कितने ही ड्राफ्ट लिखने शुरू किये लेकिन हर बार अपना "मानुषी अहंकार", आड़े आया ! क्योंकि "उनसे" प्राप्त "प्रेरणा" को बलाए ताख डाल हम कुछ और ही लिखने लगे थे ! उसका फल यह हुआ कि हम शून्य के शून्य बने रहे !

प्रियजन !यूं तो प्रति प्रातः हम स्वामी जी महाराज की यह आदेशात्मक पंक्ति दुहराते हैं
"उत्तम मेरे कर्म हों राम इच्छा अनुसार" ,
पर आपने देखा ही , अक्सर हमसे अनेक कार्य "राम इच्छा" के प्रतिकूल हो जाते हैं !

सो आज - अब और अभी , हम "उनसे" प्राप्त "प्रेरणा-ज्योति" के प्रकाश से अपने " मानवी-अहंकार" के गहन अंधकार को मिटा कर "उनकी" इच्छानुसार ही आगे बढ़ें :

तुलसी ने मानस में मानवता को एक अमोघ मन्त्रात्मक सूत्र दिया है :
मंगल भवन अमंगल हारी , द्रवहु सु दसरथ अजिर बिहारी
इष्ट देव की अहेतुकी कृपा से इसी सूत्र की स्मृति जागी हमारे धूमिल मष्तिष्क पटल पर !

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आज से लगभग २५-३० वर्ष पूर्व कानपूर के प्रयाग नारायन शिवाले के प्रांगण के मंदिर में मुझे राम भजन गायन का सुअवसर मिला , जहां अमृतवाणी सत्संग के सभी सदस्यों के साथ मिल कर हमने तुलसी का यह पद गाया था ! प्रस्तुत है ३० वर्ष पूर्व गाया यह भजन :

राम
मंगल भवन अमंगल हारी , द्रवहु सु दसरथ अजिर बिहारी
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राम जपु, राम जपु , राम जपु बावरे ! घोर भव नीर महुं राम निज नाव रे!!
बावरे बावरे


एक हि साधन सब रिद्धि सिद्धि साधि रे ! ग्रसे कलि रोग जोग संजम समाधि रे !!
राम जपु - - - - - बावरे बावरे

भलो जो है पोच जो है दाहिनो जो बाम रे ! राम नाम ही सो अंत सब हीं को काम रे !!
राम जपु - - - - - बावरे बावरे

राम नाम छांड़ी जो भरोसो करे और रे , तुलसी परोसो त्यागि मांगे कूर कौर रे !!
राम जपु - - - - - बावरे बावरे
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निवेदक: व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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9 टिप्‍पणियां:

  1. इस सुन्दर भजन के लिये आभार। हमेशा की तरह आपके शब्द आज भी प्रेरणादायक हैं!

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  2. यही तो उसकी लीला है …………सही कह रहे है वो ऐसे ही खेल खेलता है सबके साथ्………हमारे साथ भी यही होता है इसलिये सब उसकी मर्जी जैसे चाहे जहाँ ले चले उसकी रज़ा मे अपनी रज़ा है…।

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  3. भक्ति रस में डूबी हुई इस मंगलकारी भजन को सुनने का अवसर हमसभी को देने के लिए आपका बहुत -बहुत आभार

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  4. वंदना जी ,

    "उनकी रजा में जिसकी संशयरहित रजा है
    वह दास, कर्म करके पाता सदा मज़ा है

    संसार की नजरों में मिलता हो दुःख उसेपर
    उस दास के जीवन का हर पल भरा मज़ा है

    दासा नु दास --- "भोला"

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  5. रेखा बेटा , कानपूर का वह सबसे पुरातन मंदिर था , जहां शताब्दियों से श्री राम की आराधना चल रही थी ! हमारे साथ गाने वाले भी हमारी तरह ही , संगीतग्य नहीं थे !लेकिन "भक्ति रस " में सराबोर अवश्य थे !प्रेम- भक्ति से गाया भजन हृदय छू जाता है ! धन्यवाद बेटा !आप पर श्री राम कृपा सदा सर्वदा बनी रहे !

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  6. शिल्पा बेटा, राम राम, "आभार" केवल उन प्यारे प्रभु का ! हम सब पर "उनकी" - "करुणा" एवं "अहेतुकी कृपा" सदा सर्वदा बनी रहे , इस प्रार्थना के साथ - शुभाकांक्षी --- श्रीमती कृष्णा एवं "भोला" श्रीवास्तव

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  7. प्रियवर अनुराग जी ,
    "आभार" के विषय में किसी की एक टिप्पडी के उत्तर में अभी हमने कुछ कहा और भूल भी गये कि क्या लिखा था ! कष्ट होगा पर भैया पढ़ लेना ! वयस जनित हमारी मजबूरी आप जानते ही हो ! क्षमा करना !
    सुबुद्धि, शक्ति और प्रेरणा तो वह "परम पुरुष" प्रदान करते हैं ! उनका ही आभार , उनको ही धन्यवाद !
    श्रीमती कृष्णा एवं "भोला" श्रीवास्तव

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  8. आपका कोटि कोटि आभार.
    राम का सुन्दर नाम आपके श्रीमुख से
    सुन मन राम नाम रस में लीन हो गया है.

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