सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 1 जुलाई 2013

मेरे मन मंदिर में राम बिराजें

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मेरे  मन  में  तू  रमे  मेरे मोहन  "राम" 
तेरे मधुर मिलाप में मिले मुझे विश्राम 
[ भक्ति प्रकाश ]
रचयिता :- सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज

  वह महात्मा जिसने ,"सद्गुरु" की कृपा से अपने मन में 
मंनमोहन "राम" को सदा सदा के लिए बसा लिया 
जो प्रतिपल "राममिलन" के आनंद में सराबोर रहा 
और अन्ततोगत्वा,"परमानन्द" की अथाह "नील धारा" में 
सर्वदा के लिए विलीन हो गया 





वह महात्मा जिसकी हर साँस में ,जिसके मुख से निकले हर बोल में 
प्रभु के कल्याणकारी "नाम" की सुमधुर झंकार सुनाई देती थी ,
जिसको हमारे जैसे अधमाधम 'नर' में भी 
'नारायण' की छवि दिखलाई देती थी ,जिसे 
मंदिर , मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च - हर इबादतगाह के 
गर्भगृह में "परमानंद स्वरूप - उनके प्रियतम=इष्ट"
"राम"
के ही दर्शन होते थे - 
 वह कोई और नहीं हमारे सद्गुरु 
डॉक्टर विश्वामित्र महाजन जी 
ही हैं और अनंत काल तक बने रहेंगे !
[ प्रियजन, यह कथन अतिशयोक्ति अथवा नाटकीयता नहीं है ! 
यह उस सुकोमल बिरवे, ८५ वर्षीय बूढे व्यक्ति का कथन है जो श्री स्वामीजी महाराज द्वारा दीक्षित ,श्री प्रेमजी महाराज द्वारा पोषित हुआ तथा डॉक्टर विश्वामित्र जी महाराज की 
अमृतमयी कृपा वृष्टि से पुष्पित-फलित हुआ ! 
यह कथन इस दासानुदास के निज अनुभव पर आधारित है ]
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जुलाई २

आज बहुत याद आ रही है ! हैं तो आखिर हम इंसान ही ! कुछ भी कहें ! यहाँ यू.एस.ए. के सेलर्सबर्ग में सत्संग लगा और हम अपनी शारीरिक अक्षमता के कारण शामिल न हो सके ! भारत से पधारे दिव्य आत्माओं तथा यहा यू.एस.ए. के अतिशय प्रिय पूर्णतः समर्पित साधक जनों  के  दर्शन तक नहीं कर पाये ! निराश तो है ही ! राम कृपा है !

याद आ रहा है वह दिन जब दिल्ली में महाराज जी ने कृष्णा जी का हाथ पकड़ कर बड़े आग्रह से कहा था "आप इनको अमेरिका ले जाइए ,यहाँ इनका स्वास्थ्य नहीं सुधरेगा", और मैंने उदास होकर पूछा था ,  "महाराज जी क्यूँ हमे देश निकाला दे रहे हैं ? वहाँ विदेश में मैं आपके तथा श्री रामशरणम की अन्य दिव्य मूर्तियों के दर्शन कैसे कर पाउँगा?" 

महाराज जी ने मुस्कुरा कर कहा था " श्रीवास्तव जी आप यहाँ नहीं आ पाएंगे तो क्या मैं ही वहाँ आ जाउंगा , आपजी के दर्शन करने "! 

महाराज जी का उपरोक्त कथन , उनकी शब्दावली ! प्रियजन , इतनी  
'प्रेम-पगी" भाषा केवल दिव्य आत्माएं हीं बोल सकतीं हैं ! मुझे इस समय भी रोमांच हो रहा है , मेरी आँखें भर आयीं हैं उस क्षण के स्मरण मात्र से !

महाराज जी के कथन का एक एक शब्द सत्य हुआ ,यहाँ आकर मैं स्वस्थ हुआ ! यहाँ २००९ के बाद आज तक मैं पुनः हॉस्पिटल में नहीं एडमिट हुआ ! महाराज जी ने अतिशय कृपा करके हमे प्रति वर्ष यहाँ यू.एस.ए में दर्शन दिया ! [भाग्यशाली हूँ ,स्थानीय साधकों ने बताया कि यहाँ पहुचने पर महाराज श्री एयर पोर्ट से ही अन्य साधकों के साथ साथ ,मेरी भी खोज चालू कर देते थे !] 

हा आप सब जानते हैं अस्वस्थता के कारण यहाँ सत्संग के दौरानभी मैं महाराज जी से केवल एक दो बार ही मिल पाता था परन्तु नित्य उनके सन्मुख बैठ कर , कुछ पलों तक , खुली-बंद-आँखों से उन्हें लगातार निहारते रहने का आनंद दोनों हाथों से बटोरता था !

आपको याद होगा , २०१२ के अंतिम यू.एस सत्संग में, बहुत चाह कर भी मैं ,महाराज जी के निदेशानुसार उन्हें भजन नहीं सुना सका था ! न जाने क्यूँ उस समय कंठ से बोल निकल ही नहीं पाए ! कदाचित कोई पूर्वाभास था ,जिसका दर्शन करवाकर महाराजश्री ने मुझे भविष्य से अवगत करवाया था ! --- [धन्य धन्य हैं हम,महाराजश्री हम सब पर ऎसी ही कृपा बनाये रखें ] 

महाराज जी की प्रेरणा से रचित , उनको अतिशय प्रिय अपनी रचना आपको सुना रहा हूँ ! हमे विश्वास है कि "नीलधारा" में प्रतिबिम्बित अनंत "नीलाकाश" में ,बिराजे हमारे उराधिपति महाराज जी उसे सुनेंगे , और आकाश से ही हम सब पर अपने स्नेहिल आशीर्वाद वर्षा करेंगे और वह युक्ति करेंगे कि आप सब के साथ साथ मेरे मनमंदिर में भी देवाधिदेव परमानंद स्वरूप "राम" स्थापित हो जायेंगे !


भजन 

मेरे मनमंदिर में राम बिराजें 

ऎसी  जुगति करो  हे स्वामी


अधिष्ठान  मेरा मन होवे , जिसमे "राम" नाम छवि सोहे 

आँख  मूदते  दर्शन  होवे , ऎसी जुगति  करो  हे   स्वामी !
मेरे मन मंदिर में राम बिराजें , ऎसी जुगति करो हे स्वामी !!

सांस सांस गुरु मंत्र उचारूं , रोम रोम से तुम्हे पुकारूं ,
आँखिन से बस तुम्हे निहारूं , ऎसी जुगति करो हे स्वामी !
मेरे मन मंदिर में राम बिराजें , ऎसी जुगति करो हे स्वामी !!





मेरे मन मंदिर में राम बिराजें , ऎसी जुगति करो हे स्वामी !!


औषधि राम नाम की खाऊँ , जन्ममरण के दुःख बिसराऊँ ,
हंस हंस कर अपने घर जाऊं ,ऎसी जुगति करो , हे स्वामी ,

मेरे मन मंदिर में राम बिराजें , ऎसी जुगति करो हे स्वामी !!
  
बीते कल का शोक करूं णा, आज किसी से मोह करूं ना ,
आने वाले कल की चिंता , नहीं सताए हम को स्वामी !
मेरे मन मंदिर में राम बिराजें , ऎसी जुगति करो हे स्वामी !!
[शब्द-स्वरकार , गायक व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला']
[प्रेरणा स्रोत गुरुदेव विश्वामित्र जी महाराज]
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जो प्रियजन यहाँ उपरोक्त वीडियो नहीं देख पाए वे 
निम्नांकित लिंक पर यह भजन सुन  सकते हैं :
http://youtu.be/C7XuLZMw7og
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव ,
एवं मेरे अतिशय प्रिय वे सभी साधकगण जिनके द्वारा खीचीं तस्वीरें 
कृष्णा जी ने  इस वीडियो में लगाईं हैं !
गौरवजी ,उनकी धर्म पत्नी , अमृत नैयर जी तथा श्रद्धेया रूप जी 
और सभी जानी अनजानी आत्माओं को शत शत नमन 
एवं कोटिश धन्यवाद 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आप पर और हम सभी पर प्रभु कृपा बनी रहे तभी इस संसार में कल्याण हो सकता है अन्यथा नहीं .बहुत सुन्दर प्रस्तुति व् बहुत सुमधुर भजन .

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  2. धन्यवाद ! शालिनी जी , श्रृष्टि के कण कण में , तथा हर व्यक्ति में अपने 'इष्ट' का दर्शन करें.! सर्वत्र आनंद वर्षा होगी ! कल्याण ही कल्याण होगा !

    उत्तर देंहटाएं

महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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