शुक्रवार, 6 मई 2011

श्री राम दूतं शरणं प्रपद्दे # 3 6 0

आश्रय
श्री राम दूतं शरणं प्रपद्ये      

    
शैशव में ही अम्मा ने मुझे श्री हनुमान जी के सुपुर्द कर दिया और तब से आज तक वह ही मेरे "परम आश्रय" हैं ! मेरे जीवन के इन ८२ वर्षों में "मारुती नंदन" ने मेरी ,कब किस क्षेत्र में कितनी और कैसी कैसी मदद की उसका लेखा जोखा देना मेरी साधारण मानव बुद्धि के लिए तो असंभव है ही और मुझे तो ऐसा लगता है जैसे ,मेरे "वह",जी हाँ उन "ऊपरवाले" का सुपर कम्प्यूटर भी शायद  क्रैश कर गया है !आप पूछोगे , कैसे जाना ? 

बताऊं आपको , पिछले तीन दिनों से जहाँ , इधर धरती पर , मेरी खर बुद्धि से कुछ निकल नहीं रहा है , वहीं ऐसा लगता है जैसे ऊपर ब्रह्मलोक के क्षीर सागर में विश्रामरत मेरे प्रेरणा स्रोत , पथप्रदर्शक के 'जी पी एस' का सम्बन्ध भी उनके सेटेलाइट से टूट गया है ! उन्होंने भी पिछले ७२ घंटे से मेरे पास कोई प्रेरणा प्रेषित करने की पेशकश नहीं की !

क्यों चिंता कर रहा हूँ मैं ? जब पतवार हनुमान जी को सौंपी हुई है और उन्हें अपना परम आश्रय मान ही लिया है तब क्यों न सबसे पहले उनका ही सुमिरन करके , उन्हें मनालूं ! 
मुझे विश्वास है कि श्री हनुमान जी का स्मरण करते ही साधक को बल बुद्धि,यश कीर्ति  , निर्भयता, सुदृढ़ता , आरोग्य और वाक्पटुता की प्राप्ति होती है ! मेरे मस्तिष्क में भी श्री हनुमान जी की कृपा से अपने लेख के लिए भाव आ जायेंगे और मैं अपने प्यारेप्रभु का २६ नवम्बर '०८ का आदेश अक्षरशः पालन कर पाउँगा !

जाके गति है हनुमान की 
सुमिरत संकट-सोच-विमोचन मूरति मोद- निधान की
अघटित-घटन,सुघट-विघटन,ऎसी विरुदावली नहि आन की  

तुलसीदास जी  का कथन है कि जिसको एकमात्र हनुमानजी का ही भरोसा है उसकी सारी आशाएं ,आकांक्षाएं और प्रतिज्ञाएँ अविलम्ब पूरी हो जाती हैं ! हनुमानजी की आनंदमयी मूर्ती का स्मरण करते ही सारे संकट कट जाते हैं और सब चिंताएं दूर हो जाती हैं !  हनुमान जी की कृपा दृष्टि सब कल्याणों की खान है और वह जिस पर होती है उसपर सब  देवी देवताओं की कृपा निरंतर होती रहती है ! यह सिद्धांत वज्र के समान अटूट है !

बाल्मीकि रामायण के श्री राम ने हनुमान जी के विषय में कहा था कि  रावण और बाली के सम्मलित बल का मुकाबला हनुमान जी अकेले ही कर सकते हैं !  पराक्रम,उत्साह, बुद्धि, प्रताप,सुशीलता, मधुरता, गंभीरता, चातुर्य, धैर्य तथा नीति -अनीति का विवेक श्री हनुमान जी से बढ़ कर किसी और में नहीं है !

क्यों न हो ऐसा जब उनके रोम रोम पर साक्षात् श्री राम बिराजे हैं ,उनके अंग प्रत्यंग में , उनके साज सिंगार ,वस्त्राभूषण में सर्वत्र राम ही राम , बस राम ही राम हैं --एक हनुमान जी के दर्शन के साथ साथ कोटि कोटि श्री राम का दर्शन होता है ! चलिए एक पारंपरिक रचना में हम सब श्री हनुमान जी के श्री विग्रह का दर्शन करें -

राम माथ ,मुकुट राम ,राम हिय, नयन राम
राम कान, नासा राम, ठोड़ी राम नाम है  
राम कंठ ,कंध राम, राम भुजा बाजूबंद  
राम हृदय अलंकार , हार राम नाम है
राम उदर नाभि राम, राम कटी कटी सूत
राम बसन जन्घ राम पैर राम नाम है  
राम मन बचन राम राम गदा कटक राम 
मारुती के रोम रोम व्यापक राम नाम है             

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माननीय चीफ जस्टिस श्री शिवदयाल जी के एक प्रवचन से प्रेरित  
निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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बुधवार, 4 मई 2011

हनुमान तेरा आसरा # 3 5 9

हनुमान तेरा आसरा 

(गतांक से आगे) 

महापुरुष कहते हैं  कि ,सच्चे साधक का एक ध्येय, एक इष्ट और एक गुरु होना चाहिए !आसरा - आश्रय, भी मात्र एक का ही लेना उचित है ! सागर पार करने को केवल एक सुदृढ़ नौका चाहिए ,अनेकों नौकाये हो कर भी काम नही आयेंगी ! मानते हैं , लेकिन क्या करें/ जब तक हमारी  अपनी सद्वृत्तियों के अनुरूप हमे हमारी मंजिल तक ले जाने वाला या हमारा पथ प्रशस्त करने वाला सद्गुरु नहीं मिलता ,तब तक  हम डगमगाते रहते हैं ! जब हमारा भाग्योदय होता है ,तब हमे सदगुरु मिलते हैं जो हमारी स्थिति के अनुरूप , हमे हमारे इष्ट का परिचय देते हैं, अथवा अपने किसी सुयोग्य सहयोगी  के पास उनकी कृपा मागने के लिए भेज देते हैं  ! मेरे  साथ ऐसा  ही हुआ !

शैशव में जननी माँ बनी हमारी पहली इष्ट ,पहली गुरु, पहली मार्ग दर्शक ! बाल्यावस्था में  ही, मुझे अपने पैरों  पर खड़ा कर के उन्होंने आंगन के महाबीरी ध्वजा वाले हनुमान जी को सौंप दिया ! गुरु मन्त्र दिया कि " कभी भी , कहीं भी ,अँधेरे में डर लगे , रास्ते में कुत्ता पीछा करे, भूत प्रेत का भय सताए तो  हनूमानजी को याद कर लेना , उनसे केवल इतना ही कहना की हे  " हनुमान जी -

को नही जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो ?: 
काज कियो बड देवन के तुम बीर महाप्रभु देहि बिचारो 
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहीं जात है टारो 
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु  संकट होइ हमारो 

फिर तुम्हारा डर पल भर में फुर्र से उड़ जायेगा ! "

अम्मा से मिला यह गुरु मन्त्र बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ ! जब कभी भय ने सताया ,हमने "उनको" याद  किया और बात बन गयी ! इसके बाद अम्मा की बात गाँठ बांधे मैं एक के बाद एक मंजिल पार करता गया ! आत्म कथा के पिछले अंकों में बता चुका हूँ की कैसे "पनकी" वाले हनुमान जी की कृपा से मुझे खानदानी मुंशीगीरी का पेशा छोड़ कर कोई टेक्नीकल काम सीखने की प्रेरणा मिली ! यही नहीं मेरी अभिलाषा पूरी करने के लिए श्री  हनुमानजी की ने  मुझे भारत की उस जमाने की सर्वश्रेष्ठ युनिवर्सिटी B H U  के कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी में out of turn - most unexpectedly बिना किसी सोर्स या शिफारिश के एडमिशन भी दिला दिया ! अपना तो एक ही सोर्स था , और अपने को भरोसा भी एक हनुमंत का ही था अन्य किसी का नहीं !  

वाराणसी में पढाई के दौरान पूरे समय अम्मा द्वारा नियुक्त हमारे इष्ट श्री हनुमान जी  हमारे अंग संग रहे ! उन्होंने एक से एक भयंकर दावानल में ,मुझ पर कोई आंच न आने दी ! इन घटनाओं में मेरे साथ मेरे अनेकानेक अतिप्रिय घनिष्ठ  मित्रगण ,सगे सम्बन्धी मेरे ही जैसे १७-१८ वर्ष के अन्य प्रदेशों और सुदूर साउथ अफ्रिका आदि विदेशों से आये अनेकों सहपाठी , युवक-युवतियां तथा गुरुजन सभी शामिल हैं ! जिनका अभी यहाँ उल्लेख करना मुझे उचित नहीं लग रहा है ! विद्याध्ययन  के दिनों में वाराणसी में मेरे साथ अनेकों ऎसी अनूठी घटनाएँ घटीं जिन पर विश्वास करना स्वयम मेरे लिए कठिन होता यदि मैं खुद ही उसका गवाह न होता !

प्रत्येक अवसर पर श्री हनुमान जी ने अपना वरद हस्त मेरे मस्तक पर रख कर मुझे  विजय श्री दिलवायी ! हमारा हनुमंत- भरोसा दिन प्रति दिन दृढ़ ही होता गया !

(ये सारी घटनाएँ अति रोचक हैं !  १९४०-५० के भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे युवक युवतियों के रहन सहन चाल ढाल पर प्रकाश डालतीं हैं लेकिन इन कथानकों में मेरे भागीदार अधिकांश साथी अब तक यह संसार छोड़ चुके हैं, और फिर किसी की सम्मति के बिना उसके विषय में कुछ भी कहना मेरे प्यारे पाठकों , मुझे प्रभु से मिल रहे अभी के संकेतों के मद्देनजर अनुचित लग रहा है ! इसलिये अभी उनके विषय में  कुछ नहीं बोलूँगा लेकिन जैसे जैसे "ऊपर वाले" से आदेश मिलेगा, आत्म कथा में उनका समावेश करूंगा)

क्रमशः
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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