सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 19 नवंबर 2012

गुरू कृपा से नाम दीक्षा

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गुरू दीक्षा

(गतांक से आगे)
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           गुरु दीक्षा पर वार्ता प्रारम्भ करने से पूर्व , आपसे एक अपनी बात कहने की इच्छा है :   

प्रियजन ,    हमने बार बार कहा है कि ज्येष्ठ सम्बन्धियों और गुरुजन से विरासत में प्राप्त शुभ संस्कारों और दिव्य ज्ञान के अतिरिक्त हमारी झोली में आध्यात्मिकता का कोई अन्य एक दाना भी नहीं है ! और हम उनमे से केवल वो बातें हीं आपको बताते हैं जिनकी सच्चाई की अनुभूति हमे स्वयम इस जीवन में हुई है ! 

एक बात और बतानी है भैया कि पिछले लगभग १० वर्षों से ,यहाँ की तेज तर्रार, विशुद्ध ,विलायती  औषधियों के सतत सेवन ने हम दोनों की "स्मृति" [स्मरण शक्ति] बहुत क्षीण कर दी है ! आप माने न माने कभी कभी तो हम ,नाती पोतों की कौन कहे , अपने ही नाम भूल जाते हैं !

ऐसे में अवश्य ही हम अनेको बार कमेंट्स पर किये अपने "वादे" भी भूल जाते हैं और हमारी  वे कथाएँ जो हम स्वयम आपको सुनाना चाहते हैं , अधूरी छूट जाती हैं ! इस प्रकार हमारी अपनी ही इच्छा हम पूरी नहीं कर पाते और आपसे कहीं अधिक निराशा और हताशा  हम महसूस करते हैं !

अस्तु  हमारे अतिशय प्रिय पाठकगण हमारी भूल चूक माफ कर के कृपया हमे याद दिलायें वे प्रसंग जो हम ने अधूरे छोड़ दिए हैं ! 
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आइये देखें आज "गुरू दीक्षा" पर क्या लिखवाते हैं हमारे "ऊपर वाले" 

संत-महापुरुषों से हमने सुना है कि सच्चे सदगुरु द्वारा अपने शिष्यों की वृत्तियों को परमतत्व से जोड़ने की क्रिया "दीक्षा" है ! 

सद्गुरु स्वामी सत्यानन्दजी महाराज ने इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए समझाया है कि गुरुजन तीन विधियों से अपने योग्य शिष्यों को दीक्षित करते हैं !

[१] स्पर्श से ,
[२] दृष्टि अथवा  देखने से , तथा
[३] ध्यान से

इन तीनों विधियों में से किसी एक का अथवा दो का या तीनों का एक साथ ही प्रयोग कर के गुरुजन अपने शिष्यों के अंतर्घट में दिव्य आनंदप्रद तरंगें पैदा कर देते हैं !

इस संदर्भ में स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने कहा है कि
" सूक्ष्म जगत में दीक्षा इन तीनों प्रकार से होती है !  स्थूल जगत में प्रगति भी इन तीन प्रकारों से ही होती है तथा जीवों में बुराई भी इन तीन प्रकारों - स्पर्श ,दृष्टि और ध्यान से ही आती है !"

चलिए इन तीनों दीक्षा पद्धितियों पर कुछ प्रकाश डालें

स्पर्श दीक्षा 

प्रियजन यह दीक्षा सर्वाधिक दुर्लभ है ! सच पूछो तो सच्चे सद्गुरु के दर्शन होना ही अति कठिन है  ! जब तलक जीव पर  हरि की विशेष कृपा न हुई हो ,जब तक किसी जीव का पूर्ण भाग्योदय न हुआ हो, उसे सच्चा सद्गुरु मिल ही नहीं सकता ! हम साधारण जीव किस खेत की मूली हैं ?  

हम साधारण जीवों के लिए सद्गुरु के "इतने निकट" पहुँचने का सौभाग्य कि हम उनके श्रीविग्रह का स्पर्श कर सकें या वे ही हमे छू सकें दुर्लभ ही नहीं , असंभव है !, ऎसी दीक्षा तो बिरले सौभाग्यशालियों को ही प्राप्त होती है !

दृष्टि दीक्षा

जैसे कछुआ अपने अण्डों को अपनी आँखों से लगातार उसकी ओर देख कर ही "सेता" है इसी प्रकार संत -जन भी अपने से दूर बैठे जिज्ञासु साधकों को केवल देख कर ही अथवा दृष्टि द्वारा ही उन पर प्रभाव डालते हैं, उन्हें सेते हैं ,उनका पालन पोषण करते हैं!

ध्यान दीक्षा

स्वामी सत्यानान्द्जी महाराज का कथन है कि "  मच्छ ध्यान मात्र से अपने बच्छों को  सेता है !  इसी प्रकार सद्गुरु अपने दूर देशस्थ साधक को ध्यान द्वारा ही सहायता की खेंप पहुंचाता रहता है ! (प्रवचन -पीयूष) ! ज़रा सोचें ,वैसे स्थानों तक जहां दृष्टि नहीं पहुंच पाती ,जहाँ शब्द भी नहीं पहुँच सकते वहाँ केवल ध्यान द्वारा ही पहुँच कर गुरुजन अपने शिष्यों  का मार्ग -प्रदर्शन और उनकी सहायता कर देते हैं !

प्रियजन ध्यान दीक्षा का अनुभव इस दास को तथा इसके परिवार के सभी सदस्यों को आजीवन हुआ है ! वर्षों श्री राम शरणम के अपने इन महान गुरुजन से बहुत बहुत  दूर रहकर भी हम लोग इन कृपालु गुरुजन की कृपाओं से वंचित नहीं रहे ! अपनी "आत्म कथा" में हमने  साउथ अमेरिकन प्रवास के दिनों में हमारे ऊपर सद्गुरु श्री प्रेमनाथ जी  महाराज की "ध्यान"  द्वारा  की हुई अनन्य कृपाओं का विस्तृत वर्णन दिया है ! तदनंतर सद्गुरु डॉक्टर विश्वामित्र जी महाराज ने भी हमारे ऊपर पल पल  यह ध्यान जनित कृपा ही बरसाई !  और देखा आपने स्वामी जी के कहे अनुसार ,यह दासानुदास तथा उसका पूरा परिवार "मच्छ शिशुओं" के समान गुरुजन की "ध्यान दीक्षा" से  ही प्रतिपालित हुआ !

सद्गुरु की पहचान 


इस विषय में , स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने कहा है 

सद्गुरु की पहचान यह ,उपरति प्रेम विचार ! 
वीतरागता सुजान्ता ,रहित हठ पक्ष विकार !!
शान्ति भक्ति संतोष का कोश  ,रोष से पार !
राम नाम  में लीन जो , प्रतिमा  प्रेम  प्यार !!
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प्रियजन ,

                          अपने इस जीवन में हमने ऐसे अनगिनत 'गुरू' देखें हैं 
जो देश की भोली भाली साधारण जनता को लच्छेदार बातों से लुभा कर   
 उनसे कीमत वसूल करके उन्हें अपनी चमत्कारी' ? दीक्षा" देते हैं ! 
ये गुरूजन  साधकों की 'पाकेट' की गरमी से प्रोत्साहित होते हैं 
और धनवान साधकों को पास बुला कर , उन्हें गले लगाकर  
अति आदर सहित उन्हें दीक्षित करते हैं ! 
  समझदार साधकों को ऐसे गुरुजन से बचना चाहिए !

अस्तु  -



प्रियजन, गुरु  को खोजिये राम शरण में जाय !
प्रभु कृपा  से स्वयम दर्शन देवेंगे  गुरु   आय  !!  

 "भोला"



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क्रमशः 
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निवेदक :-  व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला" 
सहयोग :-  श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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