सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

पिछले दो मास कैसे जिया

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कैसे जिया ?

लगभग डेढ़ महीने में कुछ लिख न सका परन्तु मैं क्रिया हींन नही रहा !  प्यारे प्रभु" की कृपा से मैं उन दिनों भली भांति "जीवित" रहा , क्रियाशील रहा ,"उनके"आदेशानुसार कुछ न कुछ काम करता ही रहा !

कोई न कोई 'सेवा' कार्य मेरे "प्यारे प्रभु" मुझसे करवाते  रहे ! क्या करवाया "उन्होंने"? इस विषय में यह बात साफ़ कर दूँ कि इस जर्जर शक्तिहीन  काया द्वारा मुझसे कोई "परसेवा" अथवा "परोपकार'  का कार्य न तो हो सकता था न हुआ ही !!

भैया  इन दिनों मैंने न तो जगत की सेवा की न 'आत्मा' की और न 'परमात्मा की ही ! ,मैंने तो सतत केवल "अपने" नाते "अपनी" ही सेवा करी !  सर्व विदित सत्य है कि हम मानव इस संसार में अपनी इस 'काया' के नाम और अपने इस 'मन' के नाते ही जाने पहचाने जाते हैं ! और वर्तमान काल में हमारे तन मन दोनों ही प्यारे प्रभु की इस विशाल 'कला- कृति- इस "श्रृष्टि" अथवा इस "जगत"' के  अभिन्न अंश है !

इस सन्दर्भ में प्रज्ञाचक्षु स्वामी शरणानंदजी महाराज का यह कथन याद आया

परमात्मा के नाते जगत की  सेवा करें तो मानव की प्रत्येक  प्रवृत्ति  'पूजा 'बन  जाती है  !
आत्मा के नाते जगत की सेवा करें तो 'वह क्रिया मानव की "साधना" कहलाती है !
जगत के नाते जगत की सेवा करें तो वह क्रिया मानव का 'कर्तव्य 'कहलाती है !

प्रियजन मैंने उन दिनों न कोई "साधना" की और न कोई "पूजा" ही की मैंने , जैसा अभी कहा एकमात्र "निज" के नाते "निज" की ही सेवा की ! अपने उस "निज" की जो वर्तमान काल में इस समग्र "श्रृष्टि जगत" का एक अभिन्न अंग है ! स्वामी जी के उपरोक्त कथनानुसार , मैंने वह क्रिया की जो कि "मानव का कर्तव्य" है !

मैंने किया क्या ?

मुझे मेरे सद्गुरु जन के संदेश याद आये ! १९५९ में बाबा सद्गुरु स्वामीजी ने इशारे इशारे में  जताया था कि वर्तमान काल के "फिल्मी" भजनों को न गाकर हमे तुलसी . मीरा, सूर ,कबीर आदि संतों के भजन गाने चाहिए !

लगभग 198१ - ८२ में श्री प्रेमजी महाराज ने सुझाया कि सत्संगों में हमे आधुनिक कवियों के फिल्मी ढंग के गीत न गाकर अपने स्वामी जी महाराज द्वारा रचित सारगर्भित शिक्षाप्रद भजनों को गाना चाहिए ! और इस सन्दर्भ में श्रीराम शरणम के तत्कालीन प्रमुख साधकों से मुझे प्रेमजी महाराज का यह संदेश मिला  कि मैं सद  गुरु स्वामीजी महाराज के सब १८  भजन गा कर रेकोर्ड करूं और उन्हें दिल्ली भेजूं!

१९८१ से आज २०१४ तक विविध कारणों से मैं महाराज जी के इस सुझाव को कार्यान्वित न कर सका ! विविध व्यवधानों ने अवरोध प्रस्तुत किये , यहाँ तक कि २०१२ में मैं गुरुदेव डॉक्टर महाजन जी के समक्ष भजन गाने में असमर्थ रहा ! आज सोचता हूँ तो ये समझ पाता हूँ कि उस दिन मैं एक आधुनिक कवि की आधुनिक फिल्मी तर्ज़ की भक्ति रचना सुना रहा था और गुरुजन उसकी जगह स्वामी जी महाराज की रचना सुनना चाहते थे !

अस्तु अनायास ही इस वर्ष के अक्टूबर के अंत में यह आभास हुआ कि मुझे शीघ्रातिशीघ्र वह पुराना ऋण चुका देना चाहिए ! बुढापे में सर्दी जुखाम के कारण  अवरुद्ध कंठ , और फेफड़ों की कमजोरी के कारण सांस लेने में होती कठिनाइयों के बावजूद सद्गुरुजन की दिव्य प्रेरणाओं एवं उनसे प्राप्त  क्षमता के संबल से मैंने नवम्बर दिसम्बर में अपना वह वर्षों पुराना ऋण उतार लिया !

मैंने स्वामी जी महाराजजी के उन सभी भजनों को जो श्रीराम शरणं की भजन पुस्तिका में प्रकाशित हैं  स्वरबद्ध किया और गाकर उन्हें रेकोर्ड भी कर लिया !

बेताब न हों , आप को सुनाने हेतु ही गुरुजन ने यह काम मुझसे करवाया है ! सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी के उपदेशामृत से सिंचित ये पद जो जो सुन सकें सुने और लाभान्वित हों , आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करें !

स्वामी जी का पहला पद नीचे प्रस्तुत है! सहयोगिनी धर्मपत्नी श्रीमती कृष्णाजी ने इसका वीडियो बनाकर "यू ट्यूब" के "भोला कृष्णा चेनेल "में प्रकाशित कर दिया है जिसका लिंक यहाँ दिया है :! तो लीजिए देखिये सुनिये

वन्दे रामं सच्चिदानंदम

भजन का यू ट्यूब लिंक http://youtu.be/Jk3WCt-dInI




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निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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