बुधवार, 9 नवंबर 2011

शरणागति

"शरणागतवत्सल श्रीराम"
"हर संकट में रक्षा करते ,'शरण पड़े ' की कृपानिधान"
जय श्री राम जय श्री राम

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घर की खपरैली छत पर गिरा पुराने 'मेपल' वृक्ष का एक भारी तना !

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राघवजी की नयी "लेक्सस" कार पर पड़ी एक पुराने ओक वृक्ष की भारी शाखा

(घर के चारों ओर बिखरे इन भारी भारी ओक ,पाइन, मेपल वृक्षों के

तनों को हटाने के लिए मशीनों की मदद लेनी पडी )


शरणागतवत्सल श्री राम
(गतांक से आगे)

"शरणागत" का "समय" फेर "प्रभु", बेगि सम्हालें ,उसके काम ,
"कुसमय" उसका बने "समय शुभ",एक बार जो सिमरे "नाम"!!

जो जन करम करे धीरजधर,बुधि-बिबेक की अंगुली थाम ,
संकट टाल तुरत उस जन को , देते "राम" परम विश्राम !!

"भोला"

समय के उस उग्र रूप को क्या नाम दूँ , जिसे आज यहाँ 'यू.एस.ए' में "स्नो एण्ड आइस स्टोर्म [बर्फीले तूफान] और हरीकेन के रूप में तथा संसार के अन्य देशों में , भूकंपों और नदियों तथा सागर में उठे भयंकर जलप्रलय के दुखदायी स्वरूप में हमारे इस भूमंडल की मानवता झेल रही हैं !

क्या कह कर संबोधित करें हम ऐसे दुखदाई लगने वाले समय को ? कुसमय , असमय ,राहु कालम , साढ़ेसाती, मारकेश या कुछ और ?

प्रियजन, ज्ञानी महापुरुष ऐसे समय को "कुसमय" न कह कर कभी "परीक्षा की घड़ी " और कभी "शिक्षा की बेला"" कहते है ! गुरुजनों का कहना है कि,परमपिता हमारे जीवन के एक एक पल में हम सब को हमारे समग्र "उत्थान का सुअवसर प्रदान करते रहते हैं ! "प्रभु" का दिया हुआ ऐसा सुअवसर साधकों को सदा "शुभसमय" में ही मिलेगा ! अस्तु ,हम जीवन के किसी क्षण को भी " बुरा - समय " अथवा "कुसमय" न समझ कर हर एक पल का आनंद उठायें !

गोस्वामी तुलसीदास ने दोहावली के निम्नांकित दोहे में इस प्रकार की स्थिति की एक अति भावपूर्ण विवेचना की है ! उन्होंने कहा है कि यदि कोई मनुष्य जीवन में आये "अशुभ समय" में भी, धीरज के साथ स्वधर्म निभाते हुए, विवेक व साहस सहित ,उपलब्ध ज्ञान व कलाओं का उपयोग तथा सत्य का पालन करते हुए , अपने इष्ट (या प्रभु) के आश्रित रहे तो उसे ऐसी आपदाओं से निपटने की शक्ति भगवद कृपा से प्राप्त हो जाती है !

तुलसी "असमय" के सखा धीरज धरम बिबेक!
साहस साहित सत्यव्रत "राम" भरोसो एक !!

तुलसीदास का संदेश है कि " 'राम' पर अविचल भरोसा रखो ; धीरज, धर्म ,विवेक ,साहस , ज्ञान तथा सत्यव्रत के साथ अपने कर्तव्यकर्म करते रहो ! इससे तुम्हारा मानसिक संतुलन व आत्मबल बना रहेगा और तुम 'कुसमय' को भी 'सुसमय" में परिवर्तित कर सकोगे ; तुम प्रसन्नता पूर्वंक समस्याओं से जूझने की शक्ति , मनोबल तथा साहस पा जाओगे और भयंकर से भयंकर 'असमय' में भी तुम्हारा कल्याण ही होगा !"


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बर्फ और पेड़ों की शाखाओं से बंद पड़ा घर का ड्राइव वे


जाने अनजाने ,नजाने कैसे ,शायद किसी दिव्य अंतर प्रेरणा से ,उस बर्फीली रात हमारे बच्चों('राघवजी-शिल्पी बेटी' तथा 'उलरिक-मीनाक्षी बेटी और रक्षा गुडिया ) ने संकट की उस घड़ी में एक क्षण के लिए भी अपना धैर्य नहीं खोया ! और उल्लेखनीय है कि इस बीच
बच्चों ने प्राप्त जानकारियों तथा वस्तुस्थिति के वास्तविक 'ज्ञान' के आधार पर ,
अपने बुद्धि - विवेक का समुचित उपयोग किया तथा निर्णय लेते समय ,
एक पल के लिए भी अपने "इष्टदेव" को नहीं भुलाया !

उन्होंने उस रात "कम्प्लीट पॉवर ब्रेकडाउन " के माहौल में गहन अंधकार में डूबे घर के अंदर ,तीव्रता से उतरते तापमान को झेलते हुए घर में ही रुकना उचित जाना !

बच्चों के बिस्तर गर्म रखने के लिए बोयलर के बचे खुचे गर्म पानी से "होट वाटर बैग" भरे गए ! बच्चे तो सो गए लेकिन बड़ों की आँखों में नींद कहाँ ? एक तो बर्फ सा ठंढा बिस्तर और दूसरे आँख मूंदते ही शाम की पार्टी के दृश्य - दिवाली के पटाखे, फुलझडियों की चिट्चिटाहट, दोस्तों के चुटकुले , सब का मिल कर बोलीवुड के गानों पर आधारित "अन्ताक्षरी" खेलना और अंत में उस रात के मौसम की जोर जबरदस्ती की वजह से "शोर्ट नोटिस" में सजाई "केंडिल लाइट डेजर्ट पार्टी " की टेबल के चारों तरफ बैठी मित्र मंडली ! एक एक कर के ये सभी नजारे किसी रंगीन चलचित्र के समान उनकी बंद आँखों में उतराते रहे !और हवाओं की 'सांय सांय' बादलों की गरज , सड़क और घर के चारों ओर भारी भारी पेड़ों के तनों के चरमराकर टूटने और धमाके के साथ घर की छत पर गिरने की भयंकर आवाजें , किसे सोने देती हैं ?

आंतरिक प्रेरणा से लिया उनका घर में रुकने का निर्णय कितना उचित था ;उसका आंकलन अगली सुबह होना है ! उस रात क्या क्या हुआ और कैसे किसी अदृश्य शक्ति के बलशाली हाथों ने राम परिवार के इन बच्चों की रक्षा की , एक लम्बी कहानी है ! प्रियजन ,सच पूछो तो न जाने कब शुरू हुई , राम कृपा की इस कथा का कोई अंत नहीं है !

हम सब ने पारिवारिक प्रार्थनाओं में एक साथ मिल कर "अमृतवाणी" का पाठ किया है !

मांगूं मैं राम कृपा दिन रात , राम कृपा हरे सब उत्पात !
राम कृपा लेवे अंत सम्हाल , राम प्रभू है जन प्रतिपाल!

मेरे अतिशय प्रिय पाठकगण आपही कहो
वह परमकृपालु - बिना मांगे देने वाला,
शरणागतवत्सल श्रीराम
क्या कभी किसी शरणागत को अपने द्वार से खाली हाथ लौटायेगा ?

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क्रमशः
श्रीराम कृपा और आप सब की शुभ कामनाओं से धीरे धीरे स्वस्थ हो रहा हूँ !
विशेषकर आँखों की कमजोरी के कारण अभी अधिक लिखना पढ़ना नहीं हो पा रहा है !
शायद यही "रामेच्छा" है !
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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