सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 24 मई 2011

संकट से हनुमान छुड़ावें # 3 7 1

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गतांक से आगे:

उस दिन मैंने बहुत श्रद्धाभक्ति से संकटमोचन की आराधना की ! पूरे जोर शोर से हनुमान चालीसा का पाठ पूरा करके जब मैंने आँखें खोली तो देखा कि मन्दिर के महंत जी हाथों में एक माला और प्रसाद का दोना लिए मेरे सन्मुख खड़े हैं ! मेरे सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते हुए उन्होंने मुझसे कहा " बेटा ! तुम ने बड़ी श्रुद्धा से पाठ किया ! बेटे, ये देखो मेरे रोंगटे अभी तक खड़े हैं  इतना रोमांच हुआ है मुझे ! अवश्य ही संकटमोचन हनुमान जी तुम पर बहुत प्रसन्न हैं ! वह  असीम कृपालु  हैं , तुम्हारा कल्याण सुनिश्चित है ! तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी होगी "    इतना कह कर उन्होंने मूर्ति के चरणों से उठाई वह गेंदे  के फूलों की माला मेरे गले में ड़ाल दी और अपने हाथ से पेड़े का मधुर प्रसाद मुझे दिया ! मैं पहले से ही रोमांचित था महंत जी की बात सुन कर मेरी आँखों से अश्रुधार दुगने वेग से बह निकली ! मैं गदगद हो गया !

मेरे प्रिय पाठकगण ! किसी अहंकार की भावना से नहीं - वास्तविकता की श्रंखला में  प्रसंगवश उठी यह बात आपको "उनकी" प्रेरणा से ही बता रहा हूँ ! क्यों ? ये तो बस "वह" ही जाने ! बात ये है कि २० वर्ष की अवस्था में १९५० में हुई उपरोक्त घटना के बाद मेरे जीवन में बिलकुल वैसी ही घटनाएँ और अनेको बार हुई.! १९६९ - ७० में दिल्ली के कनाट प्लेस वाले हनूमान जी के मन्दिर में और १9७३- ७४ में ( तारीखें अब याद नहीं हैं)  माँ  वैष्णो  देवी मन्दिर की गुफा के द्वार पर , जब मेरे भक्तिपूर्ण भजन सुनने के बाद वहां के प्रमुख महंतों ने मुझसे  कुछ ऐसी ही बातें कहीं थीं !

संकटमोचन  मन्दिर में उस प्रातः मुझे डबल आशीर्वाद मिले ! एक तो श्री हनुमान जी का और दूसरा उनके नित्यसेवक महंतजी का ! सच पूछो तो मुझे सख्त ज़रूरत भी थी उतनी ही जबरदस्त दुआओं और आशीर्वाद की ! पहली थी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की और दूसरी थी उस सुपर डीलक्स "कार"वाली देवी से - "उसने कहा था" के गुलेरी जी के शब्दों में - "कुडमाई" के लिए ! नहीं समझे ,भाई  टी वी  की भाषा  में ,आजकल  "स्टार +" के सीरिअल "गुलाल" में बार बार सुनाई पड़ने वाला " केसर -गुलाल के "जियाबत्तू" या "बियाबत्तू" के लिए ! भैया आदत से मजबूर मुझे अभी भी शर्म  लग रही है लेकिन अब आपको ,आपकी भाषा में बता ही दूँ , अपनी और उनकी "सगाई" के लिए मुझे इन दुआओं और आशीर्वादों की बड़ी सख्त ज़रूरत थी ! मन्दिर में मिले आशीर्वादों ने मेरे मन को प्रसन्नता से भर  दिया था ! मेरी सारी मनोकामनाएं अवश्य ही पूरी होंगी ,मुझे इसका  पूरा भरोसा हो गया था !

भयंकर भूख लग रही थी ,मन्दिर से निकल कर सीधे यूनिवर्सिटी के गेट के पास मद्रासी अइयर जी की नयी केन्टीन में गया ! गर्म साम्भर ,गरी की चटनी ,शुद्ध देसी घी और गन पाउडर के साथ इडली और मसाल दोसा खाकर ,मिर्ची की जलन मिटाने के लिए पश्चिमी पंजाब से बटवारे के बाद भारत आये पुरुषार्थी रिफ्यूजी गुरुचरण सिंह के ठेले पर बड़े वाले अमृतसरी गिलास भर लस्सी का सेवन किया ! आत्मा और उदर दोनों ही तृप्त हो गये !

खा पीकर साईकिल यूनिवर्सिटी के सेन्ट्रल ऑफिस की और बढा दी !  परीक्षा में सब प्रेक्टिकल और सारे पर्चे  बहुत ही अच्छे हुए थे !  संकटमोचन महाबीर जी की कृपा से उच्च श्रेणी में सफल होने की पूरी आशा थी और उसी के साथ जुडा था मेरा उन देवीजी का जीवन साथी बन जाना और उस दूसरी सुन्दरी जैसी किसी अन्य सुंदर कार का इंग्लेंड या अमेरिका से हमारे मोटर गराज में आ जाना !  

रजिस्ट्रार ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर उस दिन B. Met. ,B.Pharm , B Sc. (Geology) के  रिजल्ट तो लग गये थे , हमारे कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी के रिज़ल्ट नहीं थे ! निराश हो कर कमरे में लौट आया ! कल तक इंतज़ार करना पड़ेगा !

आप भी प्लीज़ काफी देर से अपने कम्प्यूटर पर झुके बैठे हैं ! अब थोड़ा आँखों को रेस्ट दे ही दीजिये !

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देख रहा हूँ हिन्दी में मेरे आलेखों पर कमेन्ट भेज पाने में आपको कुछ कष्ट हो रहा है ! मेरी बेटी ने अब यह बड़ा सुगम कर दिया है ! 

कमेन्ट के लिए बने ऊपर वाले डिब्बे में आप अंग्रेज़ी के अक्षरों (रोमन ) में अपना कमेन्ट छापिये. वह आप से आप हिन्दी लिपि में छप जायेगा ! हिन्दी लिपि में छपे अपने उस कमेन्ट को सिलेक्ट करके आप उसकी नकल नीचे वाले डिब्बे में उतार लीजिये ! जिसके बाद अपना प्रोफाइल बता कर आप अपना कमेन्ट पोस्ट कर दीजिये ! मुझे मिल जायेगा ! हनुमान जी कृपा करेंगे !
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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5 टिप्‍पणियां:

  1. काकाजी प्रणाम यह कड़ी बहुत ही सुन्दर ढंग से चल रही है !

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  2. aap hamare rest kee chinta n kiziye apni aatmkatha kahte jaiye ham use padhne ke liye vyagr hain.

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  3. बहुत सुन्दर व्याख्यान. साठ साल पुरानी घटना का आपका विवरण आज के सीरियल को मात दे रहा है. Suspense जल्दी ही दूर करें.
    हिंदी में टाइप करने की सुविधा के लिए धन्यवाद.

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  4. लिखवाता है मेरा स्वामी , बस मै लिखता जाता हू ,
    करते हैं सब् वह , मै "भोला" यू ही नाम कमाता हू !!
    बनी रहे उन्की यह करुणा सदा सदा मानवता पर
    मै हर दम मन ही मन उनसे केवल यही मनाता हू !!

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महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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