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मंगलवार, 2 अगस्त 2011

घर घर में "मीरा" (भाग २ ) # ४१२

देश में "मीरा"
विदेश में "मीरा"
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मीरा बाई की प्रेमभक्ति में सराबोर तथा आध्यात्मिकता से ओतप्रोत काव्य रचनायें भारत के सुदूरपूर्व के बंगाल प्रान्त से लेकर पश्चिमोतर के फ्रंटियर प्रान्त तक तथा उत्तर में तब के यू पी के ऋषीकेश से लेकर सम्पूर्ण दक्षिण भारत में प्रख्यात संगीतज्ञों- गायक-गायिकाओं द्वारा गायी जाने लगीं !

बाल्यावस्था में मैंने पंडित नारायन राव व्यास जी ,पंडित एन .वी . पटवर्धन जी , पंडित डी. वी.पलुस्कर जी तथा पंडित ओमकार नाथ ठाकुर जी द्वारा गाये अनेक भक्ति रस भरे पद सुने ! उनमे से कुछ अविस्मरणीय पद हमे तो याद है ,आप को भी अवश्य ही याद होंगे जैसे पलुस्कर जी द्वारा स्वरबद्ध "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो " तथा "चलो मन गंगा जमुना तीर"! तब से लेकर आज तक कितने ही नामी संगीतकारों ने "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो " के लिए नयी धुनें बनाने के प्रयास् किये लेकिन पलुस्कर जी द्वारा गायी धुन से अच्छी कोई दूसरी धुन , मेरे खयाल में ,अभी तक बन नहीं पायी है !

सबसे पहिले बचपन में मैंने प्रथम बार १९३४-३५ में , ५-६ वर्ष की अवस्था में, सुगम धुनों में स्वरबद्ध, आधुनिक सुनियोजित बाजे गाजे के साथ गाये हुए "मीरा के पद" सुने ! HMV के ग्रामाफोन रिकार्डों पर ये भजन किसी बंगाली भद्र महिला के द्वारा गाये हुए थे ! बडी मधुर भक्ति पूर्ण आवाज़ थी उनकी और उनकी धुनें भी अति कर्ण प्रिय थीं ! उस छोटी उम्र में सुने मीरा के वे शब्द ,तथा उनकी धुनें मेरे जहन में इतनी मजबूती से समा गयीं कि उन्हें मैं आज ७० -८० वर्षों के बाद भी भुला नहीं पाया हूँ ! यूं समझिए कि मीरा की वो रचनायें मुझे वैसे ही याद हो गयीं जैसे उन दिनों ( १९२०-३० ) के दशक में अँग्रेजी की राईम " Twinkle twinkle little star " तथा "Jack and Jill went up the hill " स्कूली बच्चों को रटाईं जातीं थीं ! आम घरों में अक्सर इनका प्रयोग गाँव से पधारे मेहमानों पर इम्प्रेसन जमाने के लिए होता था ! हमारे घर में ,इन राइम्स की जगह, उषा दीदी और मुझसे , मीरा के वे पद सुनवाए जाते थे जिन्हें हम ने उन रेकार्डों से सीखा होता था ! हमारे अच्छे प्रदर्शन पर पूरा परिवार दादी ,माँ बाबूजी , और हम चारों बच्चे एक साथ ही यूसुफ मिया के तांगे पर बैठ कर निशात टाकीज में लगी "गंगावतरण ","सत्य हरिश्चंद्र " ,"गोपाल कृष्ण " ," सावित्री सत्यवान " जैसी फ़िल्में देखने जाते थे ! इस प्रकार भजन गाकर पुरुस्कृत होने की लालच ने हमे अधिकाधिक भजन गाने की प्रेरणा दी और भजनों की हमारी गुरु बन गयीं वह अज्ञात बंगाली भद्र महिला !

तब बहुत छोटा था रिकार्ड पर छपा नाम पढ़ नहीं सकता था अस्तु उन गायिका देवी का नाम नहीं जानता !(हो सकता है वो गायिका- जूथिका राय ही रही हों अथवा उनसे पहले की बंगाल की कोई अन्य महिला गायिका )! उनके वे रिकार्ड सुन सुन कर हमने भजन गाना सीखा ! प्रियजन ! वह देवी ,जिनकी वाणी ने उस छोटी अवस्था में हमे मीरा की संगीतमयी "भक्ति" से परिचित कराया चाहे वह जो भी हों मैं आज नतमस्तक होकर उनका वंदन करता हूँ !

चालीस के दशक में मैंने पहली बार ,भारत की , स्वरसम्राज्ञी,कोकिलकंठी ,संगीत के क्षेत्र में सर्व प्रथम भारतरत्न की उपाधि से विभूषित,प्रख्यात गायिका श्रीमती एम् एस सुब्बालक्ष्मी द्वारा गाये मीरा,के पद सुने ! ये पद उन्होंने संगीत निदेशक दिलीप कुमार राय जी के निदेशन में "मीरा" फिल्म की मीरा का किरदार निभाते हुए गाये थे!शास्ष्त्रीय रागरागिनियों के परिधान में ,भक्ति भाव के आकाश से नील वर्ण ( M S Blue) में रंगे ये भजन इतने आकर्षक थे कि उसकी चमक दमक के आगे अन्य सब धुनें ही फीकी पड गईं ! इन भजनों की धुनें इतनी भावपूर्ण थी कि अहिन्दी भाषी श्रोतागण भी बिना शब्दार्थ जाने उनके भाव समझ जाते थे ! उनका "तुम बिन रह्यो न जाय प्यारे दर्शन दीजो आय " सुन कर तो ऐसा लगता था जैसे मीराबाई स्वयम अपने कृष्ण के वियोग में विलख रहीं हों !
तभी तो त्रिकालज्ञ साध्वी श्री श्री माँ आनंदमयी जब एक बार मद्रास गयीं तब उन्होंने मद्रास के गवर्नर के राज भवन में न ठहर कर , M S S के घर जाने की इच्छा जतायी ! माँ ने साफ साफ कहा कि "मैं मीरा के साथ रुकूंगी"! माँ आनंदमयी की दिव्य दृष्टि ने M S S के स्वरूप में ५ शताब्दी पूर्व की श्री कृष्ण प्रेम दीवानी मीरा के दर्शन किये !
यहाँ U S A के जिस नगर में आजकल हम रह रहे हैं वहाँ एक अति भव्य मारुती मंदिर है ! ऐसा लगता है कि इस मंदिर के "महावीर विक्रम बजरंगी" को संगीत से कुछ विशेष लगाव है शायद तभी इनके स्थानीय कम्प्यूटर इंजिनिअर तथा डाक्टर भक्तों में से अनेक बहुत सुंदर गायक वादक भी हैं ! इन संगीत प्रेमियों ने एक भजन मंडली भी बना ली है ! ये सब मंदिर में ही नियमित रूप से संगीत का अभ्यास करते हैं और यदा कदा भजन गाकर ,अपनी श्रद्धा के सुमन श्री हनुमान जी के श्री चरणों पर अर्पित करते रहते हैं !

पिछले गुरूवार यहाँ के एक प्रमुख हस्पताल में कार्यरत डाक्टर श्रीमती लक्ष्मी रमेश ने मेरे अनुरोध पर मंदिर में रिहर्सल के दौरान मीरा का यह पद सुनाया , आप भी सुने :

बसों मोरे नैनन में नन्द लाला
अधर सुधा रस मुरली राजत उर वैजन्ती माला
बसों मोरे नैनन में नन्द लाला
क्षुद्र घंटिका कटि तट शोभित नूपुर शबद रसाला
बसों मोरे नैनन में नन्द लाला
मीरा प्रभु संतन सुखदाई ,भक्त वत्सल गोपाला
बसों मोरे नैनन में नन्द लाला



चित्र में बांयें से दायें - मैं , मंडली के सदस्य मधू जी ,गायक व हारमोनियम वादक रवि जी ,गायिका डाक्टर लक्ष्मी जी , उनके पति श्री रमेश जी ,श्री नरेश जी तथा तबले पर हमारे पुत्र श्री राघव जी !

इस मंडली के अधिकांश सदस्य मूलत: दक्षिण भारत के हैं ,सभी अहिन्दी भाषी होते हुए यहाँ U S A में तुलसी कृत "राम चरित मानस" का अति सुंदर पाठ करके सब को आनंदित कर रहे हैं ! इनका संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण भी सराहनीय है ! डाक्टर लक्ष्मी के गायन ने हमे श्रीमती M S सुब्बालक्षमी द्वारा गाये मीराबाई के भजनों की याद ताजी कर दी !आभारी हूँ हम चिन्मय मारुती भजन मंडली का; उनके सहयोग के लिए !

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निवेदक : व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमाती कृष्णा भोला श्रीवा
एवं
चिन्मय मारुती भजन मंडली
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शनिवार, 30 जुलाई 2011

घर घर में मीरा # ४१०



मीरा की प्रेमा भक्ति

नन्ही राज कुंवरि मीरा को तो उसका जन्म जन्म का साथी मिल गया ! इस प्रिया - प्रियतम मिलन से भारत भूमि पर "भग्वद भक्ति" की एक नूतन परम्परा -"प्रेमा भक्ति" का बीज अंकुरित हुआ ! उस बीज से उगे वृक्ष के पत्र पुष्प एवं फलों से ,लाभान्वित हुईं देश की करोड़ों गृहस्थियां ! क्या हुआ ?

साधारण (आम) परिवारों की बड़ी और छोटी हर उम्र की बहू बेटियाँ अब निःसंकोच अपने घर आंगन - गलियारों में ठुमक ठुमक कर मन लुभावने नृत्य तथा गायन से अपनी माताओं , सासू माँओं , दादियों नानिओं का मनोरंजन करने का साहस करने लगीं ! उनका कार्यक्रम अधिकतर मीरा की भक्ति रचनाओं पर तथा मीरा की ही भावनाओं को संजोये पदों एवं लोक गीतों पर आधारित होता ! प्रियजन ! "पग घुघरू बाँध मीरा नाची " और " मीरा मगन भई हरी के गुण गाय" जैसे प्रेम पूरित कार्यक्रम निरा मनोरंजन नही करते थे अपितु , कितनी ही बुज़ुर्ग माताओं को ध्यान मग्न कर देते थे ! ऐसे कार्यक्रम में उन्हें अपने बीते दिनों और वर्तमान के मधुर अनुभवों की स्मृति के साथ साथ अपने परम कृपालु "इष्ट" की भी याद आ जाती थी जिनकी कृपा से उन्हें जीवन में आनंद की वैसी बहुमूल्य घड़ियाँ प्राप्त हुईं !

प्रियजन , गुरुजनों ने कहा है कि अपनी सारी उपलब्धियों के लिए "प्रभु" को धन्यवाद देना अथवा किसी अन्य मतलब से भी अपने "इष्ट" को सप्रेम याद करना ही "उपासना" है !

उपरोक्त कथन मेरे अपने जीवन के , ८२ वर्षों के निजी अनुभव पर आधारित है ! मेरी दादी और मेरी अम्मा ने भी अपने अपने घर पारिवार में , अपनी बाल्यावस्था में कुछ ऐसा ही अनुभव किया था और हमारी बाल्यावस्था में हमे सुलाने और जगाने के लिए उन्होंने भी मीरा के वैसे ही पद गाये थे !

अपने जीवन की अंतिम घड़ियों में केन्सर जैसे भयंकर रोग को झेलते हुए हमारी माँ ने हम बच्चों से , प्रेम भक्ति की वैसी ही रचनाएँ सुनीं ! मीरा के उन पदों का माधुर्य ही था जिसने हमारी माँ को उन दुसह पीडाओं को हंस कर झेलने की शक्ति दी ! उनका मनोबल इतना सशक्त कर दिया कि अंतिम क्षणों तक वह मुस्कुराती ही रहीं और मुस्कुराते हुए उन्होंने हमे जो आशीर्वाद दिए वे आजीवन हमे आनंदित करते रहे !

हम आपको मीरा का एक वैसा ही पद बताते हैं जिसे १९४५ में , हमारी छोटी बहन माधुरी ने १० वर्ष की अवस्था में अपने स्कूल की नृत्य नाटिका में मीरा का किरदार निभाते हुए गाया था ! नाटिका में ,यह पद गाते गाते मीरा ने द्वारिका के रणछोड जी के मंदिर में प्रवेश किया और फिर सदा सदा के लिए अपने प्रियतम कृष्ण की हो कर वहीं अन्तर्ध्यान हो गयी ! हमारी अम्मा को यह भजन अतिशय प्रिय था , अपनी अंतिम घडी में उन्होंने मीरा का यह ही पद सुनने की इच्छा व्यक्त की ! हम चारों भाई बहेंन तथा हमारे पूरे परिवार ने मिल कर वह भजन गाया जिसे मुस्कुराते मुस्कुराते सुनते हुए हमारी अम्मा भी अपने गोपाल जी में प्रवेश कर गईं !

दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

जल बिनु कमल चन्द्र बिनु रजनी ,वैसे तुम देखे बिनु सजनी
आकुल ब्याकुल फिरूं रैन दिन ,बिरह करेजो खाय
दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

दिवस न भूख नींद नहीं रैना ,मुख सों कहत न आवे बैना
कहा कहूँ कछु समुझ न आवे, मिल कर तपत बुझाव दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

क्यों तरसाओ अंतरयामी , आय मिलो किरपा करो स्वामी
मीरा दासी जनम जनम की ,पडी तुम्हारे पाय
दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

अम्मा के जाने के बाद भी हम लोग यह भजन अक्सर गाते थे ! उपरोक्त चित्र में हम सब कानपूर के दवारका धीश मंदिर के प्रांगण में यह भजन गा रहे हैं ! मेरे साथ गा रही है मेरी धर्मपत्नी कृष्णा जी , बेटी प्रार्थना ,और उसकी सहेलियां ,कानपुर की सुप्रसिद्ध गायिका सुश्री अंजना भट्टाचार्य (अब बडोदा में) और मेघना श्रीवास्तव (अब लखनऊ / मुम्बई में ) !

क्रमशः
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निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव
सहयोग : सम्पूर्ण भोला परिवार
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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

संकल्प शक्ति - # ४ ० ९

प्रेम दीवानी मीरा
(अंक # ४०७ के आगे)

राजा रतन सिंह राठौर के महल में वह संत दुबारा यह मन बना कर आया क़ि वह अपने इष्ट श्रीकृष्ण की वह मूर्ति , (जिसकी उसने वर्षों जी लगा कर सेवा की है ), मूर्ति की वास्तविक अधिकारिणी - राजकुंवारि मीरा को समर्पित कर देगा ! और उसने निःसंकोच वैसा ही किया ! पेश्तर इसके कि राजा उससे कुछ कहते , संत ने उन्हें चिंतामुक्त कर दिया ,संत ने राजा को एक भिक्षुक संत के समक्ष हाथ फ़ैलाने से बचा लिया और उनके बिना मांगे स्वेच्छा से ही वह मूर्ति मीरा के हाथों पर रख दी !

मूर्ति ग्रहण करते समय , मीरा के प्रफुल्लित मुख मंडल पर दृष्टि पड़ते ही संत को जिस मधुर आनंद की अनुभूति हुई उसका एक पासंग भी उसे इसके पूर्व नहीं मिला था ! संत को ऐसा लगा जैसे मरुस्थल के तपते भूखंड पर सहसा सावन के कजरारे घन छा गए ,छम छमा छम एक दिव्य आनंद की शीतल वर्षा होने लगी और उसको तत्क्षण ही वह प्राप्त होगया जिसके लिए वह युगों युगों से तपश्चर्या कर रहा था !

संत ने मन ही मन उस "परमानंद" का अनुभव किया जो "ध्रुव" को गहन तपश्चर्या के बाद श्री हरि नारायण के दर्शन से मिला था ! पलक झपकते ही संत का मानव जीवन धन्य हो गया ! मूर्ति देते ही उसे मिला "हरि दर्शन" का अनमोल जवाबी तोहफा (आजकल जिसे रिटर्न गिफ्ट कहते हैं) ! यह वह अनुभूति थी जिसके लिए वह तरसता रहा था ! संत का रोम रोम उस नन्हीं सी देवी मीरा का ऋणी हो गया ! वह इस सोच में पड़ गया ,कि कौन है यह बालिका ? राधा है या रुक्मिणी ? अथवा है वह उन अनगिनत गोपिकाओं में से एक जिन पर बाल्यावस्था में बालगोपाल निहाल थे ! कहीं ये वह चंचला "ललिता" तो नहीं जो राधा-कृष्ण दोनों को ही उनकी रास लीलाओं में अकारण सताती रहती थी ?

और फिर न जाने क्या भाव उठा संत के मन में कि ,वह शून्य सा होगया और वास्तविकता की अनदेखी करके उसने स्थान काल वयस के भेद भुला कर ,समस्त राजपरिवार के समक्ष नन्हीं राज्कुंवरि मीरा के श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम किया ! सभी भौचक्के रह गए !

उन संत भक्त के विषय में अनेकानेक किम्वदंती हैं , अटकलों के आधार पर कहिये या साहित्यकारों तथा इतिहासकारों के कथनानुसार मानिये ,हम सब उन्हें ( संत ? दास) के नाम से जानते हैं ! मैं कोई नाम नहीं लूंगा ! जो कोई भी रहे हों वह , वह थे बड़े भाग्यशाली, जो मीरा जैसी प्रेम दीवानी के जीवन काल में जन्मे और मीरा के प्रेम-भक्ति मार्ग का अनुसरण किया !

और हाँ इधर ,राजमहल में एक अद्भुत आनंद की गंगा बह निकलीं ! चहूँ ओर आनंदोत्सव का माहौल छा गया ! उतनी खुशी मनाई गयी जितनी युवराजों के जन्म पर रजवाडों में मनायी जाती है ! डगर डगर में नौबत बाजी , घर घर बजी बधायी-

मीरा ने न केवल अपने इष्ट को पहचाना ,जाना और पा भी लिया ,उसने उनके साथ एक ऐसा सम्बन्ध जोड़ा जो हर प्रकार से अटूट था ! बालपन से लेकर अपने जीवन के अंत समय तक एक पल को भी मीरा ने उस मूर्ति को अपने से विलग नहीं होने दिया ! सदा उसे अपने अंग- संग रखा! वह उस मूर्ति के साथ ही उठती बैठती ,खाती -पीती ,घूमती फिरती ,सोती जागती, खेलती, गाती नाचती रही तथा उसीसे रूठती और उसे ही मनाती रही !

मीरा की भक्ति किसी पिटी पिटायी पन्थ की अनुगामिनी नहीं थी ! वह जानती थी केवल एक राह - "प्रेम प्रीति की राह" ! उसका पन्थ था समर्पण का ! उसका पन्थ था निर्मल मन से प्रभु-प्रेम के माधुर्य का आस्वादन करने का , अपने आपको अपने इष्ट में विलय कर देने का !
शेष क्रमशः
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

प्रेम दीवानी मीरा - # ४ ० ५


पिछले कुछ दिन :

उम्र की मार से मजबूर हो खामोश रहा
ये लम्हे कैसे कटे ,यार नहीं याद मुझे

आज जब होश में आया हूँ तो मुश्किल ये है
इब्तदा कैसे हो ,जब अंत नहीं याद मुझे

होश में हूँ मगर बेहोश ही समझो मुझको
चंद नामों के सिवा ,कुछ भी नहीं याद मुझे
"भोला"
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प्रेम दीवानी मीरा

"ना मैं जानूँ आरती वंदन ,ना पूजा की रीति"
(गतांक से आगे)

राजकुवरि मीरा का हठ मिश्रित करुण रुदन तथा कृष्ण की मूर्ति पाने की उत्कट इच्छा का चिंतन करते हुए संत इतना विव्हल हो उठा कि पूरी रात ठीक से सो न सका और उसने तभी निश्चय कर लिया कि प्रातः उठटे ही वह शीघ्राशीघ रतन सिंह राठौर के महल जायेगा और महल का भोग अपने "गोपाल जी" को खिलायेगा ! प्रियजन ,यह तो केवल एक बहाना है ! असल बात तो यह है कि उसे एक बार फिर महल में प्रवाहित प्रेम भक्ति की गंग-तरंग में जी भर कर स्नान करना है !



अगले दिन ,अपनी कुटी से, राजप्रासाद की ओर जाते हुए , संत विचार कर रहा था कि "मैंने आजीवन अपने गोपालजी की सेवा पूरी निष्ठां और विश्वास के साथ विधि पूर्वक की है फिर क्या कारण है कि मेरे गोपालजी ने आज तक मेरी सेवाओं को , इतने उत्साह से नहीं ग्रहण किया जितनी तत्परता से ,जितने उल्लास और जितनी रूचि से उन्होंने नन्हीं मीरा के हाथ से निर्मित प्रसाद ग्रहण किया !मेरी आराधना में अवश्य ही कोई बडी कमी है ,मेरे निवेदन में निश्चित ही कोई भयंकर चूक हो जाती है जिससे मेरे इष्टदेव मुझ पर आज तक एक बार भी इतना प्रसन्न नहीं हुए जितना वह रतन सिंह राठौर की बिटिया द्वारा अर्पित भोग ग्रहण करके हुए !



प्रियजन ,जैसे जैसे वह संत ,राजा रतन सिंह के महल के निकट आ रहा था उसके हृदय की गति बदल रही थी ,उसमें मन में एक विशेष तरंग उठ रही थी ,एक भिन्न ही भावना जागृत हो रही थी ! ( प्रियजन सच कहता हूँ यदि उसकी जगह मैं होता तो राह चलते चलते अवश्य ही यह गुनगुना रहा होता : ना मैं जानूँ आरती वंदन ना पूजा की रीति :)


इधर ,दूर से ही संत को महल के निकट आते देख कर द्वारपालों में अफरातफरी मच गई ! एक ने भाग कर महल के अंदर जाकर सूचना दी कि वह संत जिसकी झोली में वह दिव्य खिलौना था , जिसे पाने के लिए राज कुंवरि मीरा कल प्रातः से बेचैन है , वह संत जिसकी तलाश कल से हो रही थी और जो कल की खोज में राज्य की सीमा में दूर दूर तक कहीं नहीं दिखा था , वह झोली वाला संत आज प्रातः आपसे आप ही महल की ओर चला आ रहा है !

प्रातः से ही किसी दिव्य अन्तः प्रेरणा से नन्हीं मीरा कल की तरह ही अपनी अनुरागिनी माँ के पीछे पड़कर महल की रसोई में अपने प्यारे गिरिधर गोपाल के लिए कलेवा तैयार करने में जुटी थी !तीन वर्ष की उस नन्हीं बालिका के मुखारविंद पर अंकित भावभंगिमा ,प्रत्यक्ष रूप में , कृष्णा के प्रति उसकी चिरस्थायी अति पुरातन प्रेम की तन्मयता प्रदर्शित कर रही थी ! अप्रत्यक्षता से उनमे अंकित थी उसकी ,जन्म जन्मांतर से उससे बिछड़े उसके प्यारे गिरिधर गोपाल के विरह की गहन वेदना ,गहरी पीड़ा !

रणछोड दास के मंदिर में , सशरीर अपने प्रियतम द्वारकाधीश की मूर्ति में विलीन हो जाने के लगभग एक शताब्दी बाद संकलित मीरा के हृदय ग्राही पदों में तथा बीच के इन पांच सौ वर्षों में विक्रत अथवा संशोधित आधुनीकृत स्वरूपों में कौन से असली (वास्तविक) मीरा के हैं कौन नकली हैं यह तो शोध का विषय है , उस पचड़े में न पड़ कर चलिए मीरा के मन के उस भाव को पढ़ें जो उसके मुख पर तब अंकित था जब वह संत दुबारा राज महल में पहुंचा !

बालिका मीरा का मुख मंडल , प्रेम , प्रेम ,एकमात्र पेम - कृष्ण प्रेम रस में सराबोर था -उसका समग्र चोला (मीरा के ही एक पद में वर्णित भाव के अनुसार) कभी न कभी कृष्ण के मनहर स्वरूप में विलय की प्रतीक्षारत था

पच रंग चोला पहिर मैं , झिर्मिट खेलन जाती
ओहि झिर्मिट माँ मिलो सावरो , खोल मिली तन गाती
सैयां मैं तो गिरिधर के रंग राती

मीरा के उस दिव्य स्वरूप को देखते ही संत ने मन ही मन में यह संकल्प किया कि अब
उसे आराधना के कठिन परम्परागत औपचारिकताओं का परित्याग कर के अपने आप को ,प्यारे गोपाल जी के श्री चरणों पर ,अति निर्मल मन से (मन की सभी वासनाओं, दुर्गुणों और कुभावनाओं को त्याग कर ) ,
अतिशय प्रीति के साथ पूर्णतः समर्पित कर देना है !


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क्रमशः

परमप्रिय पाठकगण , दुआ करें कि मैं कल भी आपकी सेवा में सन्देश भेज सकूं

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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव


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