सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

'कृष्ण-दीवानी' मीरा की राम-भक्ति' # 3 9 9

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मीरा मगन भई हरि के गुन गाय
कबहूँ गिरिधर के रंग राते, कभौं राम गुन गाय  ! 
माई वाको "राम श्याम" में भेद न कोऊ लखाय !
मीरा मगन भई हरि के गुन गाय
("भोला")


मीरा का तन उसका मन उसका रोम रोम उसका सर्वस्व ही कृष्णमय है !  गिरिधर गोपाल के अलावा उसका और कोई है ही नहीं ! मीरा के स्वांस प्रस्वास के स्वरों में ,उसके हृदय की धडकन की लय पर ,उसकी विशुद्ध प्रीति को संजोये कृष्ण प्रेम के गीत प्रस्फुटित होते रहे ! उन गीतों का एक एक अक्षर उसके प्रियतम "कृष्ण "को पुकारता  है !

कृष्ण प्रेम की ऎसी मतवाली मीरा के मुख से उतनी ही श्रद्धा विस्वास और भक्ति के साथ   "राम नाम" निस्त्रित होते देख कौन आश्चर्य चकित नहीं होगा ? मीरा की वह रचना जो मैंने गुरुदासपुर में गाई थी वैसी स्थिति का बस एक नमूना मात्र थी ! वह भजन था : 
"मेरो मन राम ही राम रटे रे " ,
पर मीरा ने  इस भजन के अतिरिक्त भी अनेक राम भक्ति की भावना को संजोये भजन गाये थे ! मुझे यहाँ अभी दो चार ही याद आ रहे हैं :
"मेरे मन बसियो,रसियो राम रिझाऊँ " 
"माई रे मैंने राम रतन धन पायो"
"राम मिलन के काज आज जोगन बन जाऊंगी "

उपरोक्त पदों को सुनकर हम साधारण प्राणियों के जहन में यह सवाल उठ खड़ा होता है  कि पूर्णतः कृष्ण को समर्पित ,कृष्ण की दीवानी मीरा ने राम-भक्ति के इतने मर्म भरे पद कैसे रच दिए ?  बात यह है की प्रियजन,हम उनके इन पदों में अभिव्यक्त भावनाओं को नहीं समझ पाते ! मीरा की इन रचनाओं में निहित है उनका यह सनातन संदेश कि "राम कहो या श्याम कहो मतलब तो "उसकी" चाह से है", "उनको" अपने मन में रमा लेने से है "उन्हें" अपने मन की गहराइयों में सदा सदा के लिए उतार लेने से है ! मीरा का यह कहना की " रे  माई मैं अब अपने राम को रिझाने का काम करूंगी " इस भावना का प्रतीक है  !मीरा ने ऐसे पद गा गा कर जन साधारण की इस मिथ्या धारणा को  'कि राम और कृष्ण एक दूसरे से भिन्न है' ,दूर करने का प्रयास किया !  

सच तो यह  है कि साधक को प्रभु के जिस रूप,जिस गुण,जिस नाम में श्रद्धा होती है ,उसे  जिसके प्रति निष्ठां हो जाती है ,जिसमे उसकी प्रीति दृढ़ हो जाती है ,जिसके प्रति उसका समर्पण भाव जाग्रत हो जाता है,वही उसकी साधना का,भक्ति का ,सिद्धि का बीज मन्त्र बन जाता  है ! कृष्ण अर्पिता मीरा को बचपन में ही कृष्ण का स्वरूप मन भा गया था और कृष्ण क़ी उस मनमोहिनी छवि के प्रति उनके हृदय में इतनी प्रबल निष्ठा जागृत हुई थी कि उन्होंने मात्र तीन वर्ष की आयु में ही अपना सर्वस्व अपने उन प्रियतम इष्ट  गिरधर गोपाल के श्री चरणों पर अर्पित करके अपना समग्र असितत्व ही उनमे विलीन कर दिया !

नके रोम रोम में कृष्ण बस गये ! उनके होठों पर कृष्ण ,उनके हृदय में कृष्ण ,उनके नयनों में कृष्ण ,उनके तन मन में कृष्ण ,उनके अंग अंग में कृष्ण विराजित हो गये ! सब जानते है की उसके बाद ,कृष्ण उनके अराध्य ही नहीं बल्कि उनके प्रीतम ही बन गये और उनका समग्र जीवन कृष्णमय हो गया !

चलिए आपको बचपने में अपनी अम्मा से सुनी "मीरा" की यह कथा सुना दूं :


एक प्रातः मारवाड़ के किसी राजप्रासाद में उस राज परिवार की नन्ही सी तीन वर्षीय राज कुमारी ने जिद कर के रसोई में राजमाता के साथ अपने कोमल नन्हे हाथों से भगवान का भोग पकाने में राजमाता का सहयोग किया !और तभी उस महल के द्वार पर एक संत का पदार्पण हुआ ! राजकीय परम्परा के अनुसार आगंतुक संत को भोग का पहला प्रसाद एक थाल में लगा कर , वह नन्ही राजकुमारी स्वयम ही राजमाता के साथ उस संत के सामने गई ! संत को प्रासद सौंप कर राजकुमारी ,बाल सुलभ उत्सुकता से वहीं चुपचाप खड़ी हो गई ! वह संत के मुख से यह सुनने को बेताब थी कि " वाह, आज का प्रसाद कितना मधुर है , महारानी जी आज किसने बनाया है इसे ?"! पर संत ने न वैसा कुछ किया न वैसा कुछ कहा ही ! नन्ही गुडिया सी वह राजकुमारी थोड़ा उदास हो गई !

इस बीच संत ने धरती पर आसन जमाया लेकिन  सीधे प्रसाद ग्रहण कर लेने के बजाय उसने धीरे धीरे पहले अपना झोला खोला ! राजकुमारी  के मन का कौतूहल प्रति पल प्रबल हो रहा था ,यह जानने के लिए कि भिक्षुक अपने झोले से कौन सा जादूई जम्बूरा निकाल रहा है ! पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ,झोले में से जादू का तो कुछ निकला नहीं, उसमे  से निकला खिलौने जैसा एक छोटा सा पीतल का सिंघासन जिसपर "गोपाल कृष्ण" की एक अति मनमोहक मूर्ति आसीन थी !

निकट ही खड़ी वह नन्ही तीन वर्षीय राजकुमारी ,अतीव कौतूहल से यह दृश्य देखती रही !
संत ने स्वयम वह भोग ग्रहण न कर के ,उसे अपने इष्ट देव श्री कृष्ण को विधिवत ,अति श्रद्धा से अर्पित किया और उसके बाद उसने स्वयम उस भोग का प्रसाद ग्रहण किया !

संत के झोले से निकले अपने जन्म जन्म के इष्ट "श्रीकृष्ण"  के मनमोहक विग्रह का दर्शन करते ही बालिका मीरा की पूर्व जन्म की स्मृतियां और जन्म जन्म के संचित उसके संस्कार उजागर हो गये ! फिर क्या था वह राजकुमारी से प्रेमदीवानी, दर्ददीवानी ,मतवाली कृष्णप्रिया "मीराबाई" बनने के अनंत पथ पर अग्रसर हो गई ! उस विग्रह को अपना बना लेने के लिए वह मचल पड़ी !

कृमशः 
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निवेदक: व्ही , एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. मीराबाई के बारे में बताती आपकी पोस्ट बहुत अच्छी रही आभार

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  2. काकाजी प्रणाम - " साधक को प्रभु के जिस रूप,जिस गुण,जिस नाम में श्रद्धा होती है ,उसे जिसके प्रति निष्ठां हो जाती है ,जिसमे उसकी प्रीति दृढ़ हो जाती है ,जिसके प्रति उसका समर्पण भाव जाग्रत हो जाता है,वही उसकी साधना का,भक्ति का ,सिद्धि का बीज मन्त्र बन जाता है !' बहुत सुन्दर तथ्य !

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