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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

साधन - भजन कीर्तन # 2 9 9

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हनुमत कृपा - अनुभव                                            साधक साधन साधिये 

साधन - भजन कीर्तन                                                                  २ ९ ९ 



"संगीत शिक्षा"


उस जमाने में ( १९३०-४० के दशक में ) मध्यम वर्ग के कायस्थ परिवार में यदि विवाह के योग्य एक कन्या हो तो ,यह आवश्यक हो जाता था की घर पर ही एक म्यूजिक टीचर लगाकर बिटिया को बाजे  पर "स रे ग म प ------"  निकालना सिखा दिया जाय ! ऐसा था कि उन्रदिनों अधिक वर पक्ष वाले ,कन्या  में अन्य गुणों के साथ साथ यह भी चाहते थे की कन्या को थोडा बहुत गाना बजाना जरुर आना चाहिए !

मेरी उषा जीजी  अभी १२ वर्ष की ही थीं जब उनके विवाह की चिंता घर वालों को सताने लगी ! कलकत्ते से हार्मोनियम मंगवाया गया और उन्हें संगीत सिखाने के लिए म्यूजिक मास्टर की तलाश शुरू हुई ! कानपूर में उन दिनों तो तीन संगीत टीचर ही थे !जोगलेकर जी , बलवा जोशी जी और बोडस जी ! इन  तीनों में से नेत्रहीन श्री जोगलेकर जी हमारे घर के पास में रहते थे और उन्होंने उषा जीजी को संगीत सिखाना शुरू किया !जब वह सीखती थीं , तब ८-१० वर्ष का मैं भी उनके निकट बैठ जाता था ! समझिये इस प्रकार मेरी संगीत शिक्षा का  शुभारम्भ हुआ ! जीजी का विवाह हो जाने तक रुक रुक कर यह शिक्षा चली.

बाकायदा मेरी संगीत सिक्षा शुरू हुई बहुत बाद में ,१९५० के दशक में !

पद्मभूषण उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहिब का उन दिनों (१९५० के दशक में) अक्सर  कानपुर आना जाना  होता था ! उस्ताद तब कानपूर के प्रोफेसर ब्रहस्पति जी के साथ मिलकर , आज  से लगभग ८०० वर्ष पूर्व  मतंग ऋषि द्वारा रचित नाट्य शाश्त्र में वर्णित "जति गायन" की भूली बिसरी पद्धति का व्यावहारिक प्रयोग करके उस गायन पद्धति की पुनर्जीवित  करने का प्रयास कर रहे थे !

सहसवान-रामपुर -ग्वालियर घरानो से सम्बन्धित गुलाम मुस्तफा खान साहेब ,बदायूं के (मरहूम) उस्ताद इनायत हुसैन खान के बेटे और रामपुर के (मरहूम) फिदाहुसैन साहेब के नाती हैं ! उनके  मामू (मरहूम) निसार हुसैन खान साहेब ने उन्हें अपनी शागिर्दी में लेकर उनसे इतनी सुंदर तैयारी करवायी की छोटी अवस्था में ही वो अति सुगमता से संगीत के चार स्वर सप्तकों पर सुगमता से विचरण कर लेते थे ! उनका कंठ अति मधुर था ! थोड़े समय में ही वह तराना गायकी में अपने मामू साहेब के समानंतर हो गये !

उन दिनों मैं अपनी छोटी बहेंन माधुरी को उसके सुगम संगीत के प्रोग्राम प्रसारित करने के लिए अपने साथ आकाशवाणी लखनऊ ले जाया करता था ! अभी याद नहीं कि किसने हमें गुलाम मुस्तफा साहेब से मिलवाया था पर बहुत संभव है कि रेडिओ स्टेशन के संगीत विभाग के  जनाब शफाअत अली साहिब ने हमारी मुलाकात उनसे करायी होगी !


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क्रमशः
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
  

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