सोमवार, 1 नवंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 0 7

हनुमत कृपा 
पिताश्री के अनुभव


पिताश्री के अनुभव की यह गाथा उनके जीवन में (१८९५ से १९७१ ) तक घटीं  प्रमुख आध्यात्मिक उपलब्धियों की कथाएं समेटे है !उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं के शुरू के ब्रिटिश शासन काल में जमींदारों के उत्पीडन झेलते यू.पी और बिहार राज्य के काश्त्कार्रों की दशा अत्याधिक दयनीय थी !वे निर्धन थे ,अशिक्षित थे असहाय थे ! दोनों ही राज्यों का ग्रामीण अंचल पूर्णतः अविकसित था!


यू. पी.मे गाजीपुर के "नील"(INDIGO)उद्योग को अंग्रेजों ने पूरी तरह हथिया लिया था ! बिहार के भागलपुर की Raw Silk Industry को भी ,ढाका के मलमल वालों की तरह अंग भंग कर निष्क्रिय किया जा रहा था ! बिहार की कोयले की खदानें अंग्रेजी कम्पनीयों की हो चुकी थीं ! गाँव के चरखे और हथकरघे ईंधन में जल चुके थे और उनकी कमी पूरी करने  के लिए , ब्रिटिश कम्पनीयों ने कानपुर बम्बई और अहमदाबाद में कताई और बुनाई की बड़ी  बड़ी (Textile Spinning & Weaving)  मिलें लगा लीं थीं ! 


उसी अविकसित और अशिक्षित पूर्वी यू पी के एक अति साधारण व्यक्तित्व वाले (ऊपर से बिल्कुल गंवार दिखने वाले) अजनबी महापुरुष के मार्ग दर्शन से चल कर ह्मारे पिताश्री ने जीविका के लिए वह धंधा अपनाया जो तब तक परिवार में किसी अन्य ने नहीं किया था ! पढ़े लिखे कायस्थ परिवार के ग्रेजुएट युवक I C S , P  C S बनने का मोह भंग होने के बाद ज्यादातर साफ़ सुथरे लिखा पढी के काम ही खोजते थे ! मेट्रिक तक पढ़े युवक छोटे  व्यापारिओं के मुंशी बनना या सरकारी दफ्तरों में क्लर्क,बड़े बाबू,खजांची इंस्पेक्टर दरोगा बन पाना बड़े सौभाग्य की बात मानते थे !


ह्मारे पिताश्री के तीनो बड़े भाई लिखापढ़ी का काम करते थे ! एक ताऊ जी जज थे ,एक वकील थे ,एक ओनररी स्पेशल मजिस्ट्रेट ! चौथे ह्मारे पिताश्री कोई White Collar Job न मिलने के कारण ,उन बाबाजी की भविष्य वाणी के संबल पर अंग्रेजों की टेक्सटाइल मिलों   में काम करने के लिए कपड़ा रंगने (TEXTILE DYER ) जैसा निम्न स्तर का कार्य पढने सीखने और करने जा रहे थे ! उस जमाने में ह्मारे परिवार और हमारी बिरादरी वालों को पिताश्री का ऐसा कार्य करना बहुत अनुचित लगा था लेकिन ===  


पिताश्री के जज भइया बहुत सुलझे हुए विचारों के समझदार व्यक्ति थे ,इसके अतिरिक्त प्रबल राम भक्त होने के कारण उनकी सोच उनकी प्रेरणा लगभग शत प्रतिशत सत्य  ही होती थी ! उनके आदेश से पिताश्री कानपूर गये और जैसा पहले लिख चुका हूँ उनका एडमिशन कानपूर डाइंग स्कूल में हो गया ! 


क्रमशः  
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"





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