सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शनिवार, 29 मई 2010

श्री हनुमान जी द्वारा मार्गदर्शन

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बाबा-दादी की तीर्थयात्रा
श्री हनुमान जी द्वारा मार्गदर्शन

गंतव्य बदल गया. पश्चिमोत्तर हिमांचल में गंगोत्री न जा कर बाबा-दादी अब पूर्वांचल में बंगाल की खाड़ी तट पर स्थित , मां गंगा और हिंद महासागर के संगम पर स्थित मौक्ष प्रदायक तीर्थ "गंगासागर" जाने का अपना स्वप्न साकार कर रहे थे. दोनों गंगासागर में एक साथ एक दूसरे का सहारा लिए ,  डुबकी लगाकर ,सात जन्मो तक पति पत्नी बने रहने की अपनी चिर कामना सत्य करवाना चाहते थे. साथ ही वह पुरी स्थित श्रीजगन्नाथजी के मंदिर में श्री कृष्ण ,श्री बलराम एवं सुश्री सुभद्रा जी की सर्व मंगलकारिनी त्रिमूर्ति का दर्शन करना चाहते थे.

हाँ एक अन्य संकल्प भी उनके मन में उठा था. श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमाश्रु से पवित्र हुई कलिंग की उस पावन धूलि को अपने मस्तक पर लगा कर वह प्रेम-योग द्वारा अपने कुटुंब के प्रियतम इष्ट श्री महाबीर जी को रिझाना चाहते थे. उन्हें विश्वास था क़ि उनके इष्ट रामभक्त हनुमान को, "श्रीराम" के समान "प्रेमीभक्त" ही प्रिय हैं ..

रामहि केवल प्रेम पियारा
जान लेहु जो जाननिहारा .


यात्रा की व्यवस्था कुछ परिवर्तित हुई. ऊंनी कपड़ों की जगह सूती कपड़ों ने ली. गर्मी में बिगड़ने वाले खाद्य पदार्थों की जगह ठेकुआ ,मठरी, सेव दालमोठ , तेलवाले अचार , सत्तू, लईया, चबेना, चूरन और अमृतांजन के साथ साथ कुछ अन्य दवाइयाँ भी पोटलियों में बाँध ली गयीं. अब अधिक यात्रा रेल और पानी के जहाज़ से करनी थी.

शेष विवरण कल के लेख में---

-- निवेदन :श्रीमती डॉ कृष्णा एवं व्ही. एन. श्रीवास्त भोला"

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