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आज का आलेख

सोमवार, 3 जनवरी 2011

साधक साधन साधिये # २ ५ ८

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हनुमत कृपा 
अनुभव 
                                            साधक साधन साधिये  
                                               साधन - "ध्यान"
                              "राम शब्द को ध्याइये , मन्त्र तारक मान"  
                 (श्रीस्वामी सत्यानन्द जी महाराज के प्रवचनों से संकलित )

आध्यात्मिक  क्षेत्र में "ध्यान" शब्द का अर्थ है ,सजीव विश्वास के साथ ,--- एक मन, एक चित्त हो कर अपने "इष्ट" को पूरी "तवज्जा" देना ,उसके सद्गुणों को स्मरण करना और उसकी कृपा से प्राप्त आत्मिक आनंद की अनुभूतियों को याद करके उसका चिन्तन करना !आसान भाषा में कहना यह है क़ि ध्यान है एक मन होकर याद करना अर्थात एक मन होकर सुमिरन करना  !

वेदव्यास जी के कथन की व्याख्या करते हुए डोंगरे महराज ने एक प्रवचन में कहा है क़ि 'ध्यान" का अर्थ है मानस दर्शन ! याद रखो क़ि "ईश्वर" एक  है ,केवल  उसके नाम और स्वरुप अनेक हैं ! राम ,कृष्ण,शिव, किसी भी नाम या स्वरूप का ध्यान करो ! व्यास जी एकमात्र श्री कृष्ण का ध्यान करने का आग्रह नहीं करते ! वह कहते हैं क़ि ,सत्य यह है क़ि एक ही स्वरूप के अनगिनत नाम हैं ! जो व्यक्ति जिस किसी नाम या  स्वरूप के प्रति आस्थावान हो , जिस के सिमरन में उसे आनंद आये उसका ही ध्यान करें !चाहे किसी देव को पूजो, किन्तु ध्यान एक मात्र "ईश्वर" का ही करो !

ह्मारे सद्गुरु ने हमे "नाम दीक्षा " देते समय हमको "राम" शब्द का ध्यान लगाने की मंत्रणा दी है ! अमृतवाणी में "राम कृपा अवतरण" के १४ वें दोहे में उन्होंने स्पष्ट कहा है !

राम  शब्द को ध्याइये   मन्त्र   तारक    मान !
स्वशक्ति सत्ता जग करे उपरि चक्र को यान !!  

जिसका अर्थ है ," राम नाम को तारक मन्त्र मानकर उसका ध्यान करने से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है ,ऊपरी चक्र में गति होती है और आत्म शक्ति जागृत होती है " इसका विश्लेषण करते हुए महाराज जी ने कहा है क़ि "राम नाम में ध्यान लग जाने पर , साधक और साध्य का एकीकरण हो जाता  है ,वे एक दूसरे से अभिन्न हो जाते हैं !

स्वामी जी ने एक प्रवचन में कहा था क़ि सत्य ध्यानरत साधक को ध्यान में ही साध्य से अभिन्नता का बोध होता है ! इस स्थिति में ध्यान के बीच उसके शरीर में शिथिलता आ जाती है और उसके अन्तर में एक अद्भुत नाद बज उठता है ! प्रारम्भ में यह नाद जरा स्थूल होता है लेकिन धीरे धीरे वह अपने आप ही सूक्ष्म होता चला जाता है ! नाद आत्मगत होता है ! नाद की मधुरता को कौन कहे ? इन नादों में बड़ी मोहिनी शक्ति होती है जो अनायास ही मन मोह लेती है ! आज के वैज्ञानिकों ने अणू परमाणु में भी नाद सुने हैं ! ह्मारे ऋषि मुनियों ने ध्यानावस्था में यह तथ्य हजारों वर्ष पूर्व जान लिया था !

ध्यानिथित साधक में आत्म शक्ति जगने तथा भगवत्कृपा प्राप्ति के  लक्षण हैं , साधक के शरीर में अनायास ही कम्पन होना , देहपात होना , उसका हर्षित होना अकारण ही  हंसने लग जाना , पसीना आजाना व रोंगटे खड़े हो जाना  !

स्वामी जी महराज के उपरोक्त विचारों का ज्ञान हमे महराज जी के कृपा पात्र परम भक्त 
दिवंगत पंडित राम अवतार शर्मा जी भूतपूर्व M.P., तथा दिवंगत माननीय श्री शिवदयाल जी ,भूतपूर्व चीफ जस्टिस ,मध्य प्रदेश  के सौजन्य से हुआ ! 

अपने अपने गुरुजनों के मार्ग दर्शन के अनुसार ,ध्यान लगाने की विधि प्रत्येक साधक की अलग अलग होती है ! मेरा स्वयं आज तक औपचारिक विधि से ध्यान लगाने से ध्यान नहीं लगा है , इसकारण ध्यान लगाने की योगिक विधि के विषय में , प्रियजनों  मैं अपने अनुभव के आधार पर कुछ भी नहीं कह सकता ! पर बिना ध्यान लगाये कभी कभी गुरु दर्शन होने पर तथा  "इष्ट" का  विचार आने पर रोमांच होना , "उनका" नाम सुन कर मन का आनंदित होना , भजन कीर्तन करते हुए आँखों में आंसुओं का छलछलाना  ये सब अनुभव अवश्य हुए हैं मुझे ! गुरुजन की महती कृपा है , मेरी अपनी न कोई साधना है न उपासना न आराधना ! 

क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव. "भोला"

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