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आज का आलेख

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

साधन- "भजन कीर्तन" # २ ७ ३

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हनुमत कृपा - अनुभव 
साधक साधन साधिये                          साधन  -"भजन कीर्तन"

संसार सागर के अथाह जल में, लहरों के शिखर पर उछलते कूदते तिनके के समान मानव को कहाँ अवकाश है कि वह ,विश्व के सभी धर्मों के आध्यात्मिक साहित्य का अध्ययन करे और उनमें से  अपने लिए चुन सके वह विशिष्ट "साधन पथ" जिस पर चल कर वह अपना मानव जीवन सफल कर पाए ! 
विश्व के अन्य धर्मों की छोड़िये , ह्म भारतीय   हजारों वर्षों से "वेद पुराण उपनिषद" आदि सदग्रन्थों में  प्रतिपादित "जीवत्व से देवत्व" तक पहुंचने के राजमार्ग को ,उसके अनमोल  ज्ञान को  एवं उसके विधि विधा नको  आज तक ठीक से समझने में असमर्थ रहे !इसी कारण आजतक  उन्हें अपने जीवन में उतार पाने में भी असफल रहे  !

ह्मारे लिए तो "भजन गायन"के रूप में लोक भाषा में रचित  ह्मारे संत महात्माओं की वाणी का पवित्र परायाण  ही हमें  इस भव सागर से पार करा देने के लिए काफी है ! प्रियजन ! मैं सरलता से इन भजनों का रसास्वादन कर भारतीय आदि ग्रंथों के गूढ़तम रहस्यों को थोड़ा बहुत समझ पाया हूँ और उस ज्ञान से कुछ कुछ लाभान्वित भी हुआ हूँ !

भक्ति साहित्य में महात्मा तुलसी, सूर, कबीर,जायसी आदि कवियों  की दिव्य वाणियाँ अनुपम हैं !  भक्तिकालीन साहित्य में  अष्टछाप के  भक्त कवि , स्वामी हरिदास, हितहरिवंश जैसे, बृज -रस-भ्रमरों  के पदों का सुमधुर गुंजन तथा गुरु नानक, दादू, रैदास, मलूकदास, आदि महान संतों के पद  जहाँ  ज्ञान तथा  भक्तिरस से परिपूर्ण हैं वहाँ  सारगर्भित भी  हैं ! 
इस सन्दर्भ में ह्म हरिभक्त देवियों के पदों को कैसे भूल सकते हैं ,जिनमें उनकी आत्मा बोलती है ! मतवाली मीरा , सहजो बाई, जुगलप्रिया जी तथा मंजुकेशी जी के भाव भक्ति पूर्ण पदों के जादू से कौन अछूता बचा है?  हाँ इस बीच ह्म उन रंगीले मुसलमान भक्तों को भूल गये थे  जिनका कृष्ण प्रेम अविचल और आद्वितीय था !-रहीम, रसखान, खुसरो बुल्लेशाह, आदि को कौन भुला सकता है ! इन भक्त मौलवीयों की रचनाये "प्रेम-भक्ति" के भाव से सराबोर हैं ! 
कैसे धन्यवाद दें "उन्हें" जिनकी कृपा से मुझे इस जीवन में यह सुधन्य अवसर मिला कि मैं इन दिव्य रचनाओं की धुन बनाने तथा छोटी बहिन को सिखाने के बहाने  इन्हें जहाँ तहाँ असंख्य बार गा-गुनगुना सका ! 
प्रियजन ! जरा यह भी सोच  कर देखिये,"चर्मकारी"के पेशे से आजीविका कमाने वाला मैं पशुओं के कच्चे खाल के दुर्गन्ध भरे गोदाम में , कभी अपनी कुर्सी पर बैठ कर ,कभी सुपरविजन का आडम्बर करते हुए इधर उधर टहल टहल कर , मशीनों की गड़गड़ाहट के स्वर और ताल के सहारे इन पवित्र वाणियों को स्वर बद्ध करता था ! पर कुछ ऎसी कृपा थी प्रभु की वहाँ कि उस दुर्गंधमय वातावरण का कोई दूषित प्रभाव न उन दिव्य रचनाओं पर हुआ न उनके लिए मेरी बनाई धुनों पर ही हुआ ! सच पूछिए तो वहाँ पर बनी धुनें इतनी हृदयग्राही बनी कि जब जिसने भी उन भजनों को सुना वह भक्ति रसामृत में डूब गया ! आनंद विभोर हो गया ! 
कालान्तर में धीरे धीरे  इन पदों के सारगर्भित तथ्य ,उनमें निहित आध्यात्मिक विचार तथा निष्काम प्रेमभाव के बीज मेरे मन मानस में पुष्पित पल्लवित हो गये और मैं वह बन गया जिसे आज आप मजबूरन झेल रहे हैं (थोड़ा हंस लीजिये) ! क्षमा करिएगा !
क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: धर्मपत्नी श्रीमती (डोक्टर) कृष्णा श्रीवास्तव  

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