सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 4 3

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हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे) 



प्रियजन! ह्म दोनों का कल वाला हनुमान चालीसा पाठ (मेरा मूक और कृष्णा जी का स-स्वर गायन ) सुन कर श्री हनुमान जी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने तुरंत ही "बल ,बुधि ,विद्या" में से चुनकर ,हम दोनों की अभी की सर्वोच्च जरूरत -"सुबुद्धि" प्रदान कर दी ! इसके द्वारा हमे -(खासकर मुझे -क्योंकि ज्यादा नवाबी मैं ही झाड़ता हूँ ) यह ज्ञान हो गया ,क़ि मौसम की खराबी और अपने शारीरिक कष्टों के बहाने हम दोनों का अपना संयुक्त सत्संग बंद कर देना उचित नहीं है ! और तभी ह्म ने  निर्णय लिया कि ह्म दोनों अपना दैनिक सत्संग पुनः चालू करेंगे ! वचन बद्ध हैं ,निभाना पड़ेगा ! वह कृपा करें आप भी दुआ करें ,-बड़ी कृपा होगी !
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चलिए अब श्रीकृष्ण जी की लीलाओं पर पिछले अंकों में अमेरिकी छात्रों द्वारा उठायी  उनकी १६००० रानियों के विषय की शंका का भी समाधान कर लें  !

  • (e) प्रश्न : श्री कृष्ण की आठ पटरानियों के अतिरिक्त सोलह हजार रानियाँ भी थीं , क्या यह सत्य है और क्या श्री कृष्ण द्वारा ऐसा करना उचित था  ?
  • उत्तर  : श्रीमदभागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय ६९ , श्लोक ३३ से ४२ में भागवत कार ने हजारों वर्ष पूर्व , इस प्रसंग का वर्णन पूरे विस्तार के साथ किया है ,इसके अनुसार :-
  • भगवान श्री कृष्ण ने विलासी राजा नरकासुर (भौमासुर) को मार कर जब उसके वैभवशाली महल में प्रवेश किया तो देखा कि भौमासुर ने देश के विभिन्न राज्यों से सोलह हजार राजकुमारियों को लाकर  बंदी बना रखा है  ! 
  • भौमासुर की मृत्यु के उपरांत इन राजकुमारियों को पुनः उनके अपने  परिवारों में लौट पाना असंभव लगा ! अस्तु , अन्तःपुर में पधारे ,नर श्रेष्ठ भगवान श्री कृष्ण को देखते ही उन्होंने उनसे अपने जीवन एवं मान सम्मान रक्षा के लिए प्रार्थना की !श्री कृष्ण की मनोहारी छवि के दर्शन से सबकी सब उनपर मोहित हो गयीं थीं यहाँ तक क़ी  उन्होंने उनकी अहेतुकी कृपा तथा अपना परम सौभाग्य मान कर ,मन ही मन उनको अपने प्रियतम पति के रूप में वरण भी कर लिया था !(श्लोक ३१,३२,३३) ! श्री कृष्ण ने भी उन कन्याओं की जीवन रक्षा के लिए  एवं समाज में उन्हें उचित सम्मान दिलाने के लिए स्वीकार कर लिया ! 
  • तदनन्तर भगवान श्री कृष्ण ने एक ही मुहूर्त में  विभिन्न महलों में , अलग अलग रूप धारण कर के ,एक ही साथ ,उन १६००० राजकुमारियों के साथ विधिवत विवाह (पाणिग्रहण) किया  ! सर्वशक्तिमान अविनाशी भगवान  के लिए इसमें आश्चर्य क़ी कौनसी बात है ? 
  • जब   देवर्षि  नारद ने श्रीकृष्ण क़ी इन १६००० रानियों के विषय में जाना तो उन्हें वैसी ह़ी शंका हुई जैसी आपको हमको या अमेरिकी बच्चों को हुई थी ! वे सोचने लगे कि यह कितने आश्चर्य की बात है क़ी श्रीकृष्ण एक ही शरीर से ,एक  ह़ी समय ,एक साथ इतनी कुमारियों से ब्याह रचा सके !अब द्वारका में १६१०८ रानियों के साथ उनका वैवाहिक जीवन कितना दुखद अथवा सुखद है यह जानने की उत्सुकता लिए नारदजी  भगवान कृष्ण की गृहस्थी का दर्शन करने स्वयं द्वारका पहुँच गये !
  • द्वारका में जो नारद जी ने देखा ,उससे उनकी आँखें खुली क़ी खुली रह गयीं !उन्होंने देखा कि भगवान श्री कृष्ण अपनी सभी रानियों के साथ गृहस्थों को पवित्र करने वाले श्रेष्ठ धर्मों  का आचरण कर रहे हैं !यद्यपि वह एक ह़ी थे पर नारदजी ने उन्हें उनकी प्रत्येक रानी के साथ अलग अलग देखा ! उन्होंने श्रीकृष्ण की योगमाया का परम ऐश्वर्य बार बार देखा और उनकी व्यापकता का अनुभव किया !यह सब देख सुन कर नारदजी के  विस्मय और कौतूहल की सीमा नहीं  रही ! 
  • रामावतार में मर्यादा का अत्याधिक पालन करने वाले भगवान ने जहाँ एक पत्नीव्रत धर्म का पालन किया था वहाँ कृष्णावतार में उन्होंने वैसा नहीं किया ! श्री कृष्ण जी ने १६१०८ देविओं से विधिपूर्वक विवाह किया !
  • कुछ विद्वानों का मत है कि ,गृहस्थाश्रम धर्म का वर्णन करने वालीं, वेद की १६००० ऋचाएं ,कृष्णावतार के समय , प्रभु सेवा की भावना से राजकुमारियां बनी और अंततः श्री कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ हुईं !
  • अनेक महात्माओं का यह भी कहना है कि श्रीकृष्ण की १६००० रानियाँ लाक्षणिक भाषा में मानव शरीर की नाड़ियों का प्रतीक हैं ! 
इसके साथ साथ श्रीकृष्ण लीला से सम्बंधित शंकाओं के समाधान का अध्याय समाप्त हो रहा है !
इस  सम्बन्ध में गुरुजनों का सुझाव है कि श्रीकृष्ण का जीवन अथवा उनके द्वारा किये हुए कर्म अनुकरणीय नहीं हैं , स्वयं वैसे कर्म करने की कोशिश  न करें !
  • क्रमशः 
  • निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

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