विशिष्ट पोस्ट

मेरा यह ब्लॉग - क्यों ?

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR(Sep.21,'10)

सब "हनुमत कृपा" से ही क्यों? 
निज अनुभव  
सब हनुमत कृपा से ही क्यो ?
चलिये आपके उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करे। आपको बता ही चुका हू ,श्री हनुमान जी से ह्मारे परिवार का शताब्दियो पुराना सम्बन्ध है।  हमारे पूर्वजो पर पुरातन काल मे और हम सब् पर आज तक भी श्री हनुमान जी अनवरत अपनी कृपा वर्षा कर रहे हैं ।
अभी अभी मन ने निश्चित किया कि परिवार् मे और किसी के बजाय ,मै हनुमत् कृपा के निजी अनुभव ही आप को सुनाऊ और इसके साथ् ये प्रेरणा भी हुई कि सबसे पहले अपने जीवन के मध्य काल का कोई अनुभव पेश करू।तो चलिये २००८ के अनुभव सुन लेने के बाद थोडा पीछे चले और अब १९७५-७६ (लगभग ३०-३५ वर्ष पीछे) का एक अनुभव सुने।
 एक मध्य रात्रि मेरे पास भारत के राजदूत महोदय का फ़ोन् आया कि किसी आवश्यक कार्य के लिये मुझे अगली सुबह् ही  उस देश के मन्त्री के साथ् सुदूर दक्षिण के एक प्रदेश मे टूर पर जाना है।
रात  भर इसी सोच मे पड़ा रहा क़ी कदाचित जिस आवश्यक कार्य के लिए मुझे इतनी शोर्ट नोटिस दे  कर मंत्री महोदय के साथ सुदूर प्रदेश के दौरे पर भेजा जा रहा है ,दोनों ही राष्ट्रों के हित मे किसी महत्वपूर्ण सामरिक स्तर की समस्या को  हल करने के लिए होगा! . 

जैसे तैसे रात कटी! नित्य प्रति के निश्चित कार्यक्रम के अनुसार प्रातकालीन प्रार्थना पूरे  परिवार ने एक साथ की! ह्म सब ने मिलजुल कर ,संकट मोचन श्री हनुमान जी की सेवा मे पुरज़ोर आवाज़ मे अपनी अर्जी लगा दी!  हमारी मांग केवल इतनी सी थी- "हमें ऎसी बुद्धि और शक्ति दो क़ी हम ,अपना कर्तव्यपालन ,लगन उत्साह और प्रसन्न चित्त से अथक करते रहे! हमसे कोई ऐसा कर्म न हो जिसमे ह्मारे विवेक का विरोध हो "
बच्चों को स्कूल पहुचाने लेआने की व्यवस्था पड़ोसियों के सहयोग से हो गयी!चिन्त्मुक्त हो कर मैं वहाँ के सैनिक हवाई अड्डे पर पहुच गया! अन्डर डेवेलपड देश था ,कुछ  वर्ष पहले ही स्वतंत्र हुए थे ! अभी उस देश की वायु सेना का समुचित गठन ही नही हुआ था ! किसी विकसित देश से ,विश्व युद्ध दोयम का एक टूटा फूटा माल वाहक विमान दान मे मिला था ! मिनिस्टर  साहब ने बताया क़ी हमे आज वही जर्जर विमान अपनी यात्रा पर ले जाने वाला था ! उस विमान मे वहाँ  के एक मंत्री एक गवर्नर और अनेक उच्च अधिकारी  मेरे साथ यात्रा करने वाले थे ,डरने की कोई बात न थी !अस्तु मैं निर्भय था !


लेकिन थोड़ी देर में ,एक ट्रेक्टर के द्वारा खिंच कर हेंगर से बाहर होता हुआ विमान देखते  ही हमारा माथा ठनक गया! ऐसा लगा जैसे वह विमान अभी मैदाने जंग से लौटा हो !अभी तक वह अपने सामरिक रंग रूप का ही था ! उसकी चाल देख कर ऐसा लगता था जैसे कोई घायल सैनिक लंगाडाता हुआ "रन वे" पर "वाकर" के सहारे चल रहा हो ! 


आज इतना ही ,शेष कल 
निवेदक :-व्ही . एन. श्रीवास्तव  "भोला"
.

कोई टिप्पणी नहीं: