सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
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आज का आलेख

सोमवार, 12 जुलाई 2010

MAA ANANDMAYII's GRACE

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श्री श्री माँ आनंदमयी की कृपा 

गतांक से आगे 

माँ के उस दिन के प्रवचन में उपस्थित हज़ारों साधकों में शायद मैं ही एक ऐसा व्यक्ति था  जो उन दिनों नियमित रूप से प्रति दिन सैकड़ों ,एक विशेष प्रकार के प्रमाण पत्रों पर अपना  हस्ताक्षर करता था. आपको याद होगा माँ के प्रवचन का पहला वाक्य था, "पिताजी सारा दीन सौई (हस्ताक्षर ) करता हैं . .कीन्तू भूलो होता नहीं   ...."  उस भीड़ में केवल  मैं ही ऐसा था  जो एक वर्किंग दिवस में हज़ारों ऐसे कागजों पर साइन करता था जिससे स्वदेश को  विदेशों से करोड़ो डालर प्राप्त होते थे.प्रमाण पत्र देने में थोड़ी सी देरी होने पर सारी क़ी सारी विदेशी मुद्रा की कमाई घुल जाती थी. ऐसा न हो इस लिए मेरे लिए डे टु डे बेसिस पर काम निपटाना अनिवार्य था. जल्दबाजी में असावधानी से बहुत भूल हो सकती थी. क्यूंकि भारत भर में मैं एक अफसर था जिसके हस्ताक्षर मान्य थे अस्तु मुझे अकेले ही सारा काम निपटाना पड़ता था. कोई अन्य अफसर चाह कर भी मेरी मदद नहीं कर सकता था. लेकिन उस समय मैं ऐसा सोच भी  नहीं सकता था. प्रियजन. कैसे यह  सोंचता क़ी मुझ साधारण प्रानी पर जिसे उस दिन तक माँ के सन्मुख होने का कोई अवसर भी नहीं मिला था आज माँ के इतने समीप बैठ कर माँ के मनोहारी विग्रह का साक्षात दर्शन कर रहा है ,यह़ी नहीं मैं  आज माँ के प्रवचन का प्रसंग बन गया हूँ  कैसे विश्वास होता मुझे. आप ही सोंच कर देखिये. 

लेकिन मुझे विश्वास करना पड़ा जब माँ के एक बंगाली शिष्य जो उस साधना सत्संग में शामिल होने कोल्कता  से आये थे,माँ के प्रवचन की समाप्ति पर मुझे गले से लगा कर अति भावुकता से बोले ." ओ रे भोला, चीन्हेशी आमाय ?"(तुमने मुझे पहचाना) कैसे  न पहचानता उसे.वह कानपुर के मानू दा का छोटा भाई था जो मेरे साथ इंटर में एक वर्ष पढ़ा था.आज ३० वर्ष बाद मिला था.  वह आगे बोला " तुमने कभी नहीं जानाया क़ी तू भी माँ का शिष्य है "मैं कुछ बोलता उसके पहले ही वह पुनः बोला " आश्चर्यो, भीषण आश्चर्यो - आज का पूरा प्रवचन माँ ने तेरे को संबोधित करके ही बोला" मैंने पुनः उनसे पूछा "तुम्हे कैसे पता चला.".

उन्होंने कहा "जितना समय तुम भोजन कीर्तन गाया, माँ तुमको देखता रहा - एक टक और तुम्हारे साथ साथ माँ ने शोब भोजन गाया भी.और माँ ने  प्रवचन में जो पहला प्रश्न पुछा वो भी तुमसे ही पूछा था.. मैंने उनसे  फिर प्रश्न किया "तुम्हे कैसे पाता चला", वह बोला " बाबा, तुम कितना लकी है, तुम ठीक माँ के आगे बैठा था, माँ और तुम्हारे बीच और कोई नहि था. माँ शुदु (केवल) तुम्हारी और देखकर प्रवचन कर  रही थी और कभी कभी हाथ से तुम्हारी ओर इशारा भी कर  रही थी. तुम बड़ा भाग्यशाली है, रे भोला - आई ऍम जेलस ऑफ़ यू" .कुछ  अन्य साधकों ने भी ऎसी ही  बात मुझ से  कही, तब विश्वास करना ही पड़ा.

प्रियजन,पहले बता चुका हूँ क़ी माँ के सन्मुख बैठने मात्र से मै अपने तन मन क़ी सुध बुध खो बैठा था.मेरी आँखे माँ के पूरे प्रवचन में बंद रहीं थीं  .मुझे वो सब ,जो अन्य लोगों को दिखा था , बिलकुल ही दिखाई नहीं दिया था.पर अंततः विश्वास करना ही पड़ा क़ी माँ ने मुझ पर विशेष कृपा कर के मुझे ही संबोधित करके प्रवचन का पहला वाक्य कहा था  "पिताजी,सारा दीन सोई करता है ,किन्तु एकता ऊ भूलो होए ना" माँ के इस कथन ने मुझे आश्वस्त कर दिया क़ी उस दिन टक के मेरे काम में मुझसे कोई भूल नही हुई है.और आगे भी नही होगी. माँ ने एक सूत्र भी उस दिन दिया " विशुद्ध मन से ,अहंकार शून्य हो कर पूरे आत्म विश्वास और ईमानदारी के साथ,सेवा की भावना से किया हुआ कर्म कभी विफल नहीं होता . ऐसे कर्म का कर्ता कभी कोई भूल  कर ही नहीं सकता. प्रभु स्वयम उसके सुरक्षा कवच बन जाते हैं. और उसे उत्तम प्रेरणाएं देते रहते हैं ."

हाँ एक और विश्वास दृढ़ हो गया क़ी गुरुजन अपने प्रिय साधकों के मन की बात ,उनकी शंकाएं और समस्याएँ जानते हैं और वह शिष्यों को बिना जनाए ही उनकी समस्याएँ  हल भी  कर देते हैं.

शेष कल .

निवेदक- व्ही .एन .श्रीवास्तव "भोला "

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