सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 176

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सब हनुमत कृपा से ही क्यों ?
निज अनुभव 
इधर स्टेज पर बैठा हुआ मैं इस विचार से चिंतित हो रहां था क़ि क्या आज नियति सचमुच मुझसे कोई अनुचित कार्य करवाने वाली है ?  क्या मुझे "बलि का बकरा" बनाया ही जायेगा ?  
प्रियजन ,आपको विदित है क़ि मेरा लालन पालन भारत के घनी आबादी वाले बड़े नगरों में हुआ है जहां रिहायशी मकानों में बड़े जानवरों को रखना कानूनन अपराध है !अस्तु पशु पालन के नाम पर मैंने इस पूरे जीवन में दो-तीन बार श्वान (कुत्ता) पालने का प्रयास
किया और कुछ वर्षों तक बाबूजी की सवारी में जुतने के लिए घर में एक अति सुंदर अरबी घोड़ा भी रखा गया इसके अतिरिक्त हम्रारा पशु धन से और कुछ लेनादेना नहीं था! 
इस विषय में ,एक बात  उल्लेखनीय है ,वह यह है क़ि घर में पलने वाले इन सभी पशुओं से मुझे अतिशय लगाव था ! स्कूल कॉलेज,खेल कूद और गाने बजाने से बचा हुआ समय मैं इन  पशुओं के साथ ही बिताता था ! लेकिन १९४७  में पढ़ाई  के लिए बनारस जाने के साथ साथ मेरा पशु-प्रेम प्रकरण समाप्त होगया !पर १९७६ के उस दिन, लगभग ३० वर्ष बाद, स्थिति यह थी क़ि मैं एक ऐसे समारोह में भाग ले रहा था जिसमे "पशुवध" मुख्यतः "गौ हत्या"  में काम आने वाले ,इंग्लेंड मे बने आधुनिकतम उपकरणों के विषय में चर्चा होनी थी और उनके व्यावहारिक प्रयोग का प्रदर्शन होना था !
नीचे पंडाल के दूसरे छोर पर खूटे से लम्बी रस्सी द्वारा बंधी एक बहुत ही स्वस्थ चमकीले सफेद काले पशम वाली अति सुंदर छोटी सी गाय ,मस्ती से उछल कूद कर रही थी! स्टेज पर आसीन सभी सम्मानित अतिथिगण उस गाय का मनमोहक प्रदर्शन देख कर आनंदित हो रहे थे !
तभी,उस देश के मिनिस्टर साहेब ने गाय के मनोरंजक प्रदर्शन मे रुकावट का खेद प्रकट करते हुए मेज़ पर रखी बंदूक उठा कर मेरी ओर बढ़ा दी और अंग्रेज़ी में एलान किया "Now Comrades ,our chief guest -the Indian lndustrial Advisor- Comrade Srivastav will demonstrate the proper  opertion tchnique of the two machines " मेरे पैरों तले की जमीन सरक गयी ! मैंने मन ही मन कहा ,"आखिर मैं बलि का  बकरा बन  ही गया !" 


कल देखियेगा क़ि आगे क्या हुआ !
निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

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