सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

JAI MAA JAI MAA

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जय माँ  जय मा   जय  माँ 

श्री श्री माँ आनंमयी  से अंतिम मिलन 


आज स्मृति बीथियों में सैर करते हुए मेरी आँखों के सामने , वो सभी मनोहर चित्र ,जो पिछले ८०-८२ वर्षों में,उस चतुर चित्रकार ने बड़े प्यार से मेरे जीवन के केनवस पर खीचे हैं एक एक कर के जीवंत हो रहे हैं. ये चित्र मुझको उन सब मधुर पलों की याद दिला रहे हैं जब मेरे प्यारे प्रभू ने "आउट ऑफ़ द  वे " जाकर , बहुत जुगाड़ ,हेरा फेरी और तिकडम कर के हमे वह सब प्रदान करा दिया ,जिसको मैं पाना तो चाहता था ,मगर  जिसकी मांग मैंने अपने प्यारे प्रभु से कभी भी नही की.

बिना मांगे देना उनकी (मेरे प्यारे प्रभू की)फितरत है, इस बात पर हमें माँ आनंदमयी के मुंबई वाले १९७४ के सत्संग से सम्बन्धित एक बात याद आयी. मेरी बड़ी बेटी ,श्रीदेवी ने जो उस शाम ह्मारे साथ भजन के कार्यक्रम मे शामिल थी हमे, ह्म़ारा  ब्लॉग देख कर ,बताया क़ि माँ ने उस प्रवचन में उसके भी एक प्रश्न का उत्तर दिया था. श्री देवी के मन में यह जानने की इच्छा थी क़ि "भगवान अथवा किसी देवी-देवता से प्रार्थना करते समय हमे उनसे क्या मांगना चाहिए." श्री देवी को अभी भी याद है क़ि माँ ने अपने प्रवचन में उसके इस मूक प्रश्न का क्या मुखर उत्तर दिया.माँ ने कहा था "ह्म और तुम उनसे क्या मांग सकते हैं ?  जब सच यह है क़ि ह्म जानते ही नहीं क़ि हमे क्या चाहिए,ह्मारे लिए क्या हितकर है और क्या हमे नुक्सान पहुंचा सकता है, इसलिए उचित यह है क़ि ह्म उनसे केवल "बल.बुद्धि,विद्या ,विवेक तथा सुमति मांगे." यदि ये पञ्चरत्न हमे मिल गये,फिर  हमे उनसे और कुछ मागने अथवा पाने की अभिलाषा ही नही रहेगी."


धर्म पत्नी डोक्टर कृष्णा जी ने भी कुछ अनुभवों की याद दिलायी,एक यह क़ि वह श्री माँ से अपने विवाह से पूर्व ग्वालियर में मिल चुकी थीं. श्री माँ ,राजमाता विजयाराजे सिंदिया के न्योते पर ग्वालियर पेलेस में पधारीं थीं .जहां सबने काफी निकट से उनके दर्शन किये थे .माँ का अति आकर्षक व्यक्तित्व .उनका बहुत कम  बोलना, उनका सुरीला कंठ और सुमधुर भावपूर्ण भजन कीर्तन गायन कृष्णा जी को आज ५०-६० वर्ष के बाद भी अच्छी तरह से याद है, माँ ने तब एक कीर्तन किया था "कृष्ण कन्हइया ,बंसी बजइया ,रास रचइया'" माँ की दिव्य वाणी ने सबको मन्त्र मुग्ध कर दिया था.
   
इसके अतिरिक्त एक और बात उन्हें याद आयी जिससे उनको तभी विश्वास हो  गया था क़ि श्री माँ दिव्य शक्तियुक्त हैं,वह बिना देखे सुने ही यह जान जाती हैं क़ि कहाँ क्या हो रहा है और किस के मन में क्या है ? . आदि ...एक विशिष्ट महिला माँ को विदाई देने स्टेशन नहीं आ सकीं, माँ ने ट्रेन छूटते छूटते किसी को बुला कर कहा की उस महिला से कह  देना की "मैं उसकी मजबूरी जान गयी हूँ.वह दुखी न हो, गोपाल जी सब ठीक करेंगे."

१९५८ में कानपूर के स्वदेशी हाउस में,माँ पधारी थीं.मेरी गैरहाजरी में मेरी बड़ी भाभी जो उन दिनों गर्भवती थीं ,कृष्णा  को लेकर वहां , इस दृढ़ निश्चय  के साथ गयीं कि बिना माँ का प्रसाद और आशीर्वाद लिए वह वहां से नही लोटेंगी. सैकड़ों भक्तों की भीड़ में ये दोनों माँ की चौकी से काफी दूर बैठीं थीं. भक्तगण पुष्पमालाएं चढ़ा रहे थे जिन्हें वह तुरत ही  लौटा देतीं थीं.  एक सज्जन एक टोकरी फूल और एक माला लेकर आये , माँ ने टोकरी तो उन्हें लौटा दी ,पर फूलों की माला अपने हाथ में लेकर ,घुमा कर जनता की और फेंक दी.  हवा में उडती वह माला पंडाल के बीचो बीच बैठी हमारी भाभी जी के गले में आप से आप ही पड़ गयी. भाभी ने जो संकल्प किया था वह पूरा हो गया.. उनको सीधे ,माँ के हाथ से दिया ,प्रसाद मिला. कहने की आवश्कता नही है कि माँ के उस आशीर्वाद से भाभी को कितना आत्मिक आनंद और भौतिक सुख मिला. आज भी वह उस आनंद के नशे में डूबी दिन रात, कृष्ण भक्ति के भजन रचतीं और गुनगुनाती  रहती हैं.  .


श्री माँ की कृपा एवं आशीर्वाद जनित आत्मिक आनंद के छोटे बड़े अनुभव, माँ भक्तों को अभी भी होते रहते हैं.आज ,जब उनकी स्थूल काया हमारे बीच नहीं हैं.,सूक्ष्म रूप में अब भी वह हर पल हमारे अंगसंग हैं. एक सुरक्षा कवच के समान वह हमे सभी संकटों से बचा
रही हैं.  


जय माँ, जय माँ, जय जय माँ 


निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"                 दिनांक .२९,/ ३० जूलाई , २०१० 

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