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मेरा यह ब्लॉग - क्यों ?

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

"HIS GRACE"- --its identification & means to secure

"प्रभुकृपा" की पहचान और प्राप्ति के साधन. :

हम साधारणतः जीवन में अनुकूल परिस्थियों की प्राप्ति और प्रतिकूल परिस्थियों से मुक्ति को "प्रभु कृपा" का फल मानते हैं.. पर ये तो बहुत छोटी उपलब्धियां हैं जो जीवन में हमारे द्वारा किये उचित/अनुचित कार्यों के फलस्वरूप हमे प्राप्त होती हैं. इन छोटी सफलताओं अथवा असफलताओं को "प्रभु कृपा" कहना उचित नही है. ये तो मात्र "कर्म फल" हैं. प्रियजन, यथार्थ "प्रभु कृपा" इन भौतिक प्राप्तियों से बहुत उंची उपलब्धि है..


जब हमारा मन जड़तासे दूर जाने के लिए और चिन्मयता की प्राप्ति के लिए आकुल हो उठे एवं साधनमें लगने लगे और संत दर्शन तथा सत्संगों में सम्मिलित होने की लालसा मन में तीव्रता से जाग्रत हो जाये तब समझिये की हमे "प्रभुकी अहैतुकी कृपा" मिल रही है. यही है वास्तविक "प्रभुकृपा".


पर यह सब हो कैसे ? इसका एकमात्र साधन है- कुसंग का त्याग एवं सत्पुरुषों और संतों का "समागम" . जिसकी प्राप्ति के लिए भी हमारे लिए आवश्यक है "प्रभुकृपा "का सहारा. तुलसी ने कहा : . .

"गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन, :
बिनु हरि कृपा ना होइ सो गावही बेद पुराण" ,

अन्यत्र भी तुलसी ने इसी विषय में कहा है

"संत बिसुद्ध मिलहिं पर तेही . चितवहिं राम कृपा कर जेही " 


-------क्रमश: ----------

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

Invite HIS GRACE and use your skills judiciously

"प्रभु -कृपा" के साथ समुचित प्रयास ---

"युक्ताहारविहारस्य यु क्तचेष्टस्य कर्मसु , युक्त स्वप्नाव बोधस्य योगो भवति दू:खहा."

योगेश्वर श्री कृष्ण ने, अति "कृपा " कर ,उपरोक्त सन्देश, अपने प्रिय सखा अर्जुन को दिया.और आज उनकी ही "कृपा" से हमे यह प्रेरणा हुई कि हम इस सूत्र में पिरोये उपयोगी तथ्यों पर पुन: विचार करें .

अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में विजयी होने के लिए हमें सर्व प्रथम वैसी ही "प्रभु कृपा " प्राप्त करनी है (जैसी अर्जुन को उपलब्ध थी). हमारा सौभाग्य है कि कलियुग में हम उस कृपा को अति सुगमता से, केवल नामजाप सुमिरन और भजन कीर्तन द्वारा ही पा जाते हैं, जो पार्थ को वर्षों की मित्रता के बाद प्राप्त हुई थी.

पर कृपा प्राप्ति के बाद हाथ पर हाथ डाल कर बैठने से काम नही बनेगा . सफल होने के लिए हमें स्वस्थ तन मन से, "प्रभु" द्वारा, हमारे लिए निश्चित किया कर्म, अपनी समस्त बुद्धि, विवेक और शक्ति का उपयोग करते हुए करना है .हमारे लिए आवश्यक है कि हम श्रीमद भगवत गीता के उपरोक्त आदेश का अक्षरश: पालन करें. हम संतुलित भोजन करें, समुचित व्यायाम आराम , सैर-सपाटा , खेल कूद और मनोरंजन का आनंद ले, .पर यह कभी ना भूलें कि केवल कृपा से ही आपका काम नही बनेगा . प्रभु का वरद हाथ तो आपके साथ सदा ही है . प्रभु द्वारा निर्धारित आपका कर्म --आपको अपनी पूरी क्षमता लगा कर, जितना बन पाए, उतनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार, उचित चेष्टा के साथ करना है. जीवन की महाभारत में तब ही आप विजयी होंगे. |

बहुधा अनियमतता बरतने से हम असफल, निराश और दुखी हो जाते हैं. दोष अपना है. हम अनियमित कार्य करते हैं, आवश्यकता से अधिल या कम चेष्टा करते हैं, खाने पीने में बदपरहेज़ी करते हैं , स्वास्थ्य का ख़याल नही रखते, जिसके कारण आनंद मय जीवन जीने से वंचित रह जाते हें . इस प्रकार हम अपनी ही भूलों के कारण असफल होते हैं, दुखी होते हैं और जैसा कि तुलसी ने कहा है "सो परत्र दुःख पावही सर धुन धुन पछताइ" और फिर काल, कर्म, समय और प्रभु पर मिथ्या दोष लगाते हैं. ऐसी स्थित न आने दें, प्रियजन ."उनकी" कृपा और अपनी समुचित चेष्टाओं के बल पर इस जन्म की महाभारत में हम सब विजयी हों.

"उनकी" कृपा हम पर सदा बनी रहे.

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

हनुमानजी से प्रार्थना

जय श्री हनुमान

चरण शरण में आय के, धरूं तिहारा ध्यान .
संकट से रक्षा करो, पवनपुत्र हनुमान ..

दुर्गम काज बनाय के, कीन्हें भक्त निहाल .
अब मोरी विनती सुनो, हे अंजनि के लाल ..

हाथ जोड़ विनती करूं, सुनो वीर हनुमान .
कष्टों से रक्षा करो, राम भक्ति देहुँ दान,
पवनपुत्र हनुमान ..

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यह "ओम" दादा को बहनों की ओर से सादर आदरांजलि भजन संकलन पुस्तिका का पहला भजन है.

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

The ONE Master EK AUMKAR with several names

"एक ओंकार, सतनाम, कर्ता पुरुख, निर्भय निरवैर अकाल मूरत --- "

ब्रहम अनामय अज भगवंता ब्यापक अजित अनादि अनंता
हरि ब्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रगट होइ में जाना

हम सब पर प्रति पल कृपा करने वाला हमारा परम पिता परमात्मा सर्वदयालु, सर्वसमर्थ, सर्वज्ञ और सर्वत्र है . वह दो ( अथवा अनेक ) हो ही नही सकता. वह एक ही, इस सृष्टि का सिरजनहार, पालनहार, और संहारक है. समस्त जीव जगत का वह एक मात्र आधार है.

यह कहना कि वह किसी एक मंदिर में है अथवा मस्जिद या गिरजा घर में है ही नही, पूर्णत:असत्य है. सच तो यह है कि उस "एक" को ही विभिन्न धर्मावलम्बी विभिन्न नामो से पुकारते हैं, पर वह निरपेक्षता से सब पर अपनी कृपावृष्टि करता रहता है. जैसे पवन बिना किसी भेद भाव के सब प्राणियों को श्वास प्रस्वास द्वारा जीवन दान देता है और सूर्य अपना प्रकाश और उर्जा बिना जाति, धर्म ,रंग-रूप, ऊँच-नीच के भेद का विचार किये, समस्त जगत को निःशुल्क ही प्रदान करता है, वैसे ही हमारा प्रभु भी समस्त सृष्टि पर अपनी कृपामृत की वर्षा निरंतर कर रहा है. आप प्रेम से उसे किसी भी नाम से पुकारें, हाँ, आपकी पुकार में उनके प्रति आपका अखंड विश्वास और आपका साँचा प्यार मुखरित होना चाहिए, वह आपकी सुनेगा अवश्य. प्रभु परम दयालु हैं.

को रघुबीर सरिस संसारा . सील सनेह निबाहन हारा.
कोमल चित अति दीन दयाला. कारन बिन रघुनाथ कृपाला

प्रियजन, तुलसीदास अपने इष्ट श्री राम को रघुनाथ, रघुबीर अदि नामो से पुकारते थे . हम चाहे जिस देवता के नाम से उन्हें पुकारें, राम कहें या रहीम, कृष्ण कहें या करीम, अल्लाह कहें या गोंड, मुहम्मद कहे या ईशु, पुकार सुनने वाला "एक" ही है. सच्चे मन की,भाव भीनी पुकार सुनते ही वह दयालु कृपानिधान आपके सेवार्थ अविलम्ब आ जायेगा. प्रियजन कोशिश कर के देखो तो सही.

कुछ पल ही लगेंगे, रात्रि सोने से पहले, परिवार वालों को "शुभ रात्रि" या "गुड नायीट" कहने के बाद उस "एक" को याद करके, अपने दिन भर के कार्यों का लेखा जोखा करें , भूलों के लिए "उनसे" मुआफी मांगें और अर्ज़ करें की आयन्दा "वह" आपको ऐसी भूल नही करने दें. विश्वास कीजिए आपको अगले दिन ही नहीं वरन आजीवन "वह" आपको सद्बुद्धि देता रहेगा, आप लाख चाहें भी तो आपसे कोई ग़लत काम होगा ही नहीं.

ऐसा चमत्कारी है दो पल स्मरण का प्रभाव .


निवेदक: व्ही एन श्रीवास्तव "भोला"
.

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

प्रभु की महती कृपा-प्रसाद - "सद्गुरु रूपिणी माँ"

The divine gift "Mother" - as "Sadguru"

"हरि अनंत हरि कथा अनंता"

प्रियजन, केवल हरि ही नही, हरि की अनन्य कृपा स्वरुप प्राप्त "माँ" भी अनन्य है, और उनकी महिमा अनंत है. जैसा मैंने अन्यत्र कहा है, "माँ", सत्य, प्रेम तथा करुणा की साकार मूर्ति हैं, "परहित" उनका धर्म है. एकमात्र "हिंदी" के अक्षर-ज्ञान वाली हमारी माँ ने केवल तुलसीदास की रामायण ही पढ़ी तथा उसमें दिए "धर्म" के लक्षणों को अपनी जीवन शैली में ज्यों का त्यों उतार लिया.

जब हम छोटे थे, हमारा सिर अपनी गोद में लेकर वह मानस की इन सारगर्भित पंक्तियों का गायन करती थी और उनका भावार्थ हमें बताती थीं. वह अपने साथ हम से भी उन चौपाइयों का सस्वर गायन करवाती थीं. हमसे "पाठ" सुनकर वह बहुत प्यार से भोजपुरी भाषा में कहतीं, "बबुआ, तोहार गला ता खूब मीठा बा, काल फेर सुनहीआ".

देखा आपने, भारत के सबसे पिछड़े प्रदेश की एक अशिक्षित महिला किस चतुराई से अपने नन्हे बालक को जीवनोपयोगी मानव धर्म के लक्षण सिखा रही है और साथ साथ उसको "गायन" के लिए प्रोत्साहित कर रही है. मानस की जो चौपाइयां उन्होंने बचपन में सिखायीं और जबरदस्ती बार बार गवा कर भली भांति याद करवा दीं _

धरम न दूसर सत्य समाना . आगम निगम पुरान बखाना ..
परम धरम श्रुति बिदित अहिंसा . पर निंदा सम अघ न गरीसा ..
पर हित सरिस धरम नहि भाई . पर पीड़ा सम नही अधमाई ..
अघ की पिसुनता सम कछु आना . धरम की दया सरिस हरि जाना ..

प्रभु कृपा से मिली मेरी "प्यारी माँ" ने इस प्रकार लोरी सुनाते, गाते बजाते, खेल खेल में, हमें मानव "धर्म" के आधार तत्वों सत्य, प्रेम, करुणा तथा सेवा से न केवल परिचित कराया वरन उनकी अमिट छाप हमारे मानस पर अंकित कर दी.

क्रमशः

रविवार, 25 अप्रैल 2010

The only way to pay HIM back - नाम जाप, भजन, कीर्तन

हमारा सौभाग्य है कि हम इस कलिकाल में धरती पर आये हैं. बात यह है की भारत भूमि पर हजारों वर्ष पूर्व प्रगटे युग-दृष्टा मनीषियों - ऋषि मुनियों ने उस काल में ही यह उद्घोषित कर दिया था कि सतयुग, त्रेता एवं द्वापर युग के जीवों के द्वारा मुक्ति प्राप्ति हेतु की जाने वाली कठिन चेष्टाओं - (तपश्चर्या -यज्ञ आदि) से, कलि युग के जीव मुक्त हैं. उन्हें मोक्ष प्राप्ति हेतु उतनी कठिन साधना नही करनी है. भारतीय पौराणिक धर्म ग्रन्थ "श्री मद् भागवत " में इसका उल्लेख है

आधुनिक काल के गोस्वामी तुलसीदास कृत "रामचरितमानस" मे "छहों शास्त्र सब ग्रंथन को रस" समाहित है. युगदृष्टा तुलसी ने इसमें अपने निजी अनुभवों के आधार पर हमे यह विश्वास दिलाया है कि कलि काल के जीवों को गाते बजाते केवल नाम जाप, सुमिरन और भजन , कीर्तन से मुक्ति मिल जायेगी.  उन्होंने कहा है:

"कलिजुग केवल नाम अधारा ,सिमिर सिमिर नर उतरहिं पारा .
चहु जुग चहु श्रुति नाम प्रभाउ ,कलि बिशेस नहीं आन उपाऊ .."

मानस में ही तुलसी ने अन्यत्र कहा है:

"एही कलि काल न साधन दूजा, जोग जग्य जप तप व्रत पूजा.
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि संतत सुनीअ राम गुन ग्रामहि.."

---------------राम भजे गति केहि नही पाई

इस प्रकार हम सौभाग्यशाली जीव, गाते बजाते , ब्लॉग लिखते लिखाते और इसी बहाने अपने इष्ट का स्मरण करते तथा ब्लॉग पढने वालों को उनके इष्ट का स्मरण कराते, स्वयं भी मुक्त हो जायेंगे और सहपाठियों को भी साथ ले जायेंगे..देखिये कितनी बड़ी कृपा की है हमारे प्यारे प्रभु ने हम- कलियुगी जीवों पर..

एक बात और है. प्रियजनों. मैं यह नही चाहता कि आप मेरे कहने पर अपने इष्ट के स्थान पर "मेरे राम'" को भजें. आप अपने इष्ट, जिन पर आपको श्रद्धा है कृपया उन्ही को याद करें, उन्ही का भजन कीर्तन करे, पर प्लीज़ जो भी करिये, पूरी श्रद्धा और पूरे विश्वास के साथ करिये .

फिर देखिये चमत्कार ----- सर्वत्र आनंद वर्षा, परम विश्राम की प्राप्ति

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

How do we pay U back, O Lord for all your GRACE

गतांक से आगे -

हम सब ने बार बार सुना है और अब इस कथन की सच्चाई भली भांति समझ भी गये हैं,
"सात समुद को मसी करों लेखन सब बनराई
धरती सब कागद करों हरि गुन लिखा न जाय."
"विराटस्वरुप" वाला वह "हरि" जिसे कृष्ण-कृपा से अर्जुन ने देखा था हम साधारण प्राणियों को कहाँ, कब दिखेगा? हम इतने भाग्यशाली कहाँ कि हमे श्री कृष्ण मिलें ?

प्रियजन, इस धरती पर,सर्व प्रथम हमे साक्षात् दर्शन देने वाले - हमारे "माता पिता" ही हैं . हमे उनमें ही "योगेश्वर कृष्ण एवं गुरु सान्दीपन" के स्वरुप का "दर्शन" होता है. ऎसी भगवद रूपिणी माँ के सद्गुण एवं उनसे प्राप्त ज्ञान का लेखा जोखा कौन कर सकता है? फिर भला मैं कैसे जुर्रत करूँ?

प्राचीन काल से आज तक प्रचलित मातृ स्तुतिया "या देवी सर्व भूतेशु मात्रु रूपेण संस्थिता" एवं आधुनिक रहमानी नग़मा "माँ तुम्हे सलाम" - मातृ भक्तों को उनकी अपनी माँ में ही साक्षात् "हरि" का दिव्य दर्शन करा देता है . कलि युग में कितना आसान हो गया है हरि दर्शन.?

मेरे प्रभु, कैसे धन्यवाद दें हम आपको, आपकी इस कृपा के लिए. इस सन्दर्भ में मेरा यह गीत देखें:

दाता राम दिए ही जाता ,
भिक्षुक मन पर नहींअघाता..

देने की सीमा नहीं उनकी ,
बुझती नहीं प्यास इस मन की
उतनी ही बढती है तृष्णा ,
जितना अमृत राम पिलाता

दाता राम दिए ही जाता

कहो उरिन कैसे हो पाऊं ,
किस मुद्रा में मोल चुकाऊं
केवल तेरी महिमा गाऊं ,
और मुझे कुछ भी ना आता

दाता राम दिए ही जाता

जब भी तुझ को गीत सुनाता
जाने क्या मुझ को हो जाता
रुन्धता कंठ नयन भर आते
बरबस मैं गुमसुम हो जाता

दाता राम दिए ही जाता
भिक्षुक मन पर नहीं अघाता

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

हमारी "गुरु- माँ"

प्रभु कृपा का दूसरा दृष्टांत :-

हमे मानव जन्म देने की पहली "कृपा" के बाद "दूसरी कृपा",, जो प्रभु ने हम पर की .वह थी "माँ स्वरूप में गुरु" की प्राप्ति. व्यस्क होने तक "माँ" रूपी "यह गुरु" आजीवन , प्रति पल, हमारा मार्ग दर्शन करती रही .

हमारी "गुरु- माँ" -.

१८९५ में ब्रिटिश सरकार के एक समृद्ध पोलिस अफसर की ज्येष्ठ पुत्री के रूप में जन्मी,अम्मा ,का लालन पालन उनके पिता की सुदूर शहरों में पोस्टिंग के कारण बिहार में उनके पिता के खानदानी गाँव सुहिया में हुआ, जहाँ पहुचने के लिए मीलों तक बैलगाड़ी पर यात्रा करनी पडती थी.

१९३० के दशक में, ७-८ वर्ष की अवस्था में हम भी उस धूल भरी राह से अनेको बार वहां गये थे अम्मा का वह गाँव बिलकुल गंगा तट पर था और कुछ ऐसा अभिशाप था उस गाँव पर की वह वर्ष में दो बार उजड कर दुबारा बसता था ,क्यूंकि बरसात के मौसम में गंगा मईया उसे अपनी गोद में ले लेती थी . ऐसे में कैसी शिक्षा दीक्षा मिली होगी हमारी माँ को आप समझ सकते हैं. एक दिन को भी वह स्कूल नहीं गयीं . गाँव के ही एक साक्षर ब्राह्मण से अक्षर ज्ञान मिला उन्हें - केवल अक्षर ज्ञान. और फिर उस जमाने के रिवाजानुसार १०-१२ वर्ष की अवस्था में ही उनका विवाह हो गया (गवना ४-५ वर्ष बाद हुआ) उनके पति यानि हमारे बाबूजी जो लगभग हमारी अम्मा की ही उम्र के थे, उन दिनों बलिया सिटी के मिडिल स्कूल में पढ़ रहे थे.

"प्रभु" की इस महती कृपा से प्राप्त ,अपनी प्रथम गुरु -"अम्मा" से में आजीवन कुछ न कुछ सीखता ही रहा. पर सबसे महत्वपूर्ण जो सीखा, वह था अपने जीवन में "सत्य, प्रेम, करुणा तथा सेवा" का समावेश.....

क्रमश :.

भजन - संकटमोचन कृपानिधान


संकटमोचन कृपानिधान
जय हनुमान जय जय हनुमान
महावीर अतुलित बलवान
जय हनुमान जय जय हनुमान

अंजनि माता के नयनांजन
रघुकुल भूषण केसरीनंदन
ग्यारहवें रूद्र भगवान


जय हनुमान जय जय हनुमान

संकटमोचन कृपानिधान
जय हनुमान जय जय हनुमान
महावीर अतुलित बलवान
जय हनुमान जय जय हनुमान

सूर्य देव ने शास्त्र पढाया
नारद ने संगीत सिखाया
मारुत मानस की संतान

जय हनुमान जय जय हनुमान

संकटमोचन कृपानिधान
जय हनुमान जय जय हनुमान
महावीर अतुलित बलवान
जय हनुमान जय जय हनुमान

चार अक्षर का नाम है प्यारा
चारों जुग परताप तिहारा
त्रिभुवन को तुम पर अभिमान

जय हनुमान जय जय हनुमान

संकटमोचन कृपानिधान
जय हनुमान जय जय हनुमान
महावीर अतुलित बलवान
जय हनुमान जय जय हनुमान

तुमने राम के काम बनाये
लंका जारि सिया सुधि लाये
राम सिया पितु मातु समान

जय हनुमान जय जय हनुमान

संकटमोचन कृपानिधान
जय हनुमान जय जय हनुमान
महावीर अतुलित बलवान
जय हनुमान जय जय हनुमान

एक ही मंत्र जपो अविराम
श्री राम जय राम जय राम
राम तुम्हारे जीवन प्राण 

जय हनुमान जय जय हनुमान

संकटमोचन कृपानिधान
जय हनुमान जय जय हनुमान
महावीर अतुलित बलवान
जय हनुमान जय जय हनुमान

जो कोई तुम्हरी महिमा गावे
सहज राम के दर्शन पावे
दास को दो चरणों में स्थान 

जय हनुमान जय जय हनुमान

संकटमोचन कृपानिधान
जय हनुमान जय जय हनुमान
महावीर अतुलित बलवान
जय हनुमान जय जय हनुमान

मनोजवं मारुततुल्य वेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं .
वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं
श्री राम दूतं शरणम प्रपद्ये ..

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गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

प्रार्थना का प्रभाव

ईश्वर बिना मांगे ही हमे वह सब देता रहता है जिसकी हमे आवश्यकता होती है. अक्सर प्रार्थना में की गयी हमारी मांगे प्रभु द्वारा पूर्व निर्धारित हमारी आवश्यकताओं से विलग होंती है. जैसे कोई प्रार्थना करता है की उसे एक लाख की लोटरी मिल जाये और प्रार्थना के फल स्वरूप वह दस लाख जीत जाता है अथवा केवल दस हजार ही जीतता है. प्रार्थी अति प्रसन्न होता है अधिक जीत कर और दुखी हो जाता है कम पाकर. स्वाभाविक है ऐसा होना.

अब आप मेरा निजी अनुभव सुने.. आज लगभग ६३ वर्ष बाद उन घटनाओं का वर्णन कर रहा हू, केवल एक उद्देश से कि, आप सब मेरे प्रियजन मेरे उपरोक्त कथन को सत्य मान कर, अति तल्लीनता और लगन के साथ प्रार्थना करे इस अडिग विश्वास के साथ कि परम कृपालु प्रभु हमारी प्रार्थना अनसुनी नही करेगा. उतना ही देगा हमारे कल्याण के लिए, जितने की हमे आवश्यकता है.

अस्तु हम मन वांछित फल न मिलने से दुखी न हो. और अधिक पा जाने पर अपना संतुलन न खोएं . वह पुरानी कहावत - "होइ ही सोई जो राम रची राखा" और वह उर्दू की कहावत जो हमारे परिवारों में बहुत प्रचिलित है "वही होता है जो मंज़ूरे खुदा होता है" सदा याद रखे.

निजी अनुभव अगले ब्लॉग में लिखूंगा

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

"संकटमोचन महाबीर हनुमान" से प्रथम परिचय

छुटपन में ही जान गया हनुमान जी की महत्ता .

१९२९ में जब मेरा जन्म हुआ बलिया सिटी में बिजली नही थी और उसके बाद भी १०-१२ वर्षो तक वहां बिजली नहीं आयी. .अपना परिवार वकीलों और जज मजिस्ट्रेटों का था. अपनी बैठक आगन्तुको से भरी रहती थी, दरबार सा लगा रहता था. इसलिए रात के समय बाहर मर्दानखाने में तो लेन्टर्न और पेट्रोमेक्स की रोशिनी होंती थी पर भीतर जनानखाने के कमरों में या तो मिटटी के तेल की ढिबरियां या सरसों के तेल के मिटटी के दिए ही जलाये जाते थे..आंगन गलियारा बिलकुल अँधेरा रहता था. पर बच्चो का भीतर बाहरआना जाना लगा ही रहता था. बेचारे कभी दादी जी का संदेश दादा जी को देने जाते तो कभी चाची के आदेश से चाचा को जर्देवाला पान पहुचाते . उन्हें घने अँधेरे में जाना होता था.

बचपन में हम हर गर्मी के अवकाश में बलिया सिटी जाते थे.और वहां कभी कभार मुझे भी यह ड्यूटी बजानी पडती थी. हम कानपूर से जाते थे जहाँ बिजली ही बिजली थी (आज नही, उन दिनों). आप समझ सकते हैं कि  एक शहरी बालक उस अँधेरे घर में कैसे बिना डरे रह सकता था. सो मै भी अंधकार से भयभीत हो कर वह सेवा करने से कतराता था.

मेरी प्यारी अम्मा मेरी कमजोरी भांप गयीं. उनके भोला की बदनामी हो रही थी .गोरखपुर, इलाहबाद, मैंनपुरी के बच्चे दौड़दौड़ कर बड़ों की सेवा कर रहे हैं, भोला डरकर अम्मा से चिपके बैठे हैं. अम्मा ने तभी हमारा परिचय हमारे "कुलदेवता" महावीर जी से कराया. ऊँगली पकड़ कर वह हमे घर के एक पक्के आँगन में ले गयीं. जहाँ चबूतरे के बीचोबीच एक बहुत ऊँचा हरे बांस का झंडा गडा था जो अपने घर की ऊँचाई से भी ऊँचा था . उस बांस की चोटी पर लहरा रही थी एक लाल रंग की पताका जिस पर हनुमान जी का अति चमकीला सुनहरा कट आउट सिला हुआ था.

अम्मा ने कहा जिस घर में ऐसी महाबीरी ध्वजा लहराती है उस घर मे "भूत पिशाच निकट नहीं आवे , महावीर जब नाम सुनावे" उन्होंने आश्वस्त किया कि महावीर जी के सिमिरण मात्र से "नाशे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत वीरा"

उस दिन हीअम्मा ने हमे कंठस्थ कराया "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीश तिहु लोक उजागर" . इस प्रकार हमारी अम्मा ने ही हमे हमारा प्रथम गुरुमंत्र दिया . भारत में माता-पिता को संतान का प्रथम गुरु माना जाता है.


क्रमशः

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

राम नाम से मुक्ति

जीव की एकमात्र मांग है "मोक्ष" -- बार बार के आवागमन से सदा सदा की "मुक्ति" तथा "परमविश्राम" की ,  प्राप्ति.  नीलकंठ शंकर ने विष कंठ में रोका,राम नाम का उच्चारण किया, "विष एवं राम" के मिलन से शंकर को परम विश्राम मिला.हम भी इस कलिकाल में केवल नामोच्चारण तथा राम गुण गान द्वारा परम विश्राम पा सकते हैं. आपने सुना ही होगा-

"कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना
एक अधार राम गुन गाना
" . 

हमारे कुलदेवता श्री महावीर हनुमानजी के मतानुसार हम "उनके" स्वामी श्री राम जी को मनाये बिना "उनकी" कृपा नहीं पा सकते. अस्तु हम "चालीसा" गायन के साथ राम धुन और "मानस" का निम्नांकित अंतिम छंद अवश्य गाते हैं. चमत्कार होता है. आप भी प्रयत्न करे उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होगी.

पाई न केहि गति पतित पावन राम भज सुनु शठ मना .
गनिका अजामिल व्याध गीध गजादि खल तारे घना..

आभीर यमन किरात खस स्वपचादि अति अघ रूप जे .
कही नाम वारक तेपि पावन होइं राम नमामि ते..

रघुवंश भूषण चरित जे नर कहाहि सुनहि जे गावहीं.
कलिमल मनोमल धोय बिनु श्रम राम धाम सिधावही ..

सत पञ्च चौपाई मनोहर जानि जे नर उर धरें.
दारुण अविद्या पञ्च जनित विकार श्री रघुबर हरें..

सुंदर सुजान कृपानिधान अनाथ पर कर प्रीति जो.
सो एक राम अकाम हित निर्वाण पद सम आन को ..

जाकी कृपा लव लेस ते मतिमंद तुलसीदास हूँ.
पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाहीं कहूँ ..

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मो सम दीन न दीन हित तुम समान रघुबीर ,
अस बिचारी रघुबंस मनी हरहु बिसम भव भीर ..

कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम .
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम..

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आइये, मिल कर गायें -  MP3 Audio

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता

गतांक से आगे -

केवल तन ही नहीं "प्रभु" ने, अतिशय कृपा कर, हमें मन, बुद्धि, अहंकार आदि अन्य सुविधाओं से भी अलंकृत किया.जिसका प्रदर्शन हम आजीवन करते रहते हैं .इसके अतिरिक्त उनकी सबसे महान कृपा जो हम सब को यथा समय प्राप्त होती है वह है सद्गुरु मिलन.

तुलसी के शब्दों में "बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता" . इस प्रकार हरि कृपा से संतों के दर्शन होते हैं . सत्संगों से साधना प्रेरित होती है और अन्ततोगत्वा सच्चे साधकों को, प्रभु की कृपा से, सद्गुरु मिल ही जाता है और "गुरु पद पंकज सेवा " करके उन्हें "नवधा भक्ति" का एक और लक्ष्य प्राप्त हो जाता है.

देखा सच्चे साधकों पर कितनी कृपा करते हैं "भगवान्" ! अब तो केवल एक यही आरजू है की प्रभु हमें सच्चा साधक बनाएं . आइये हम समवेत स्वरों में, श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के शब्दों पर आधारित यह प्रार्थना प्रभु के श्री चरणों पर अर्पित करें : -

"हे प्रभु मुझको दीजिये अपनी लगन अपार
अपना निश्चय अटल और अपना अतुल्य प्यार .

शरणागत जन जान कर मंगल करिए दान
नमो नमो भगवान तू मंगल-दयानिधान "

रविवार, 18 अप्रैल 2010

"उनकी" कृपा की गणना

गतांक से आगे -

प्रभु कृपा का प्रत्यक्ष दर्शन हमें अपने जन्म पर हुआ. उसके बाद भी,जीवन में,पल पल हमें, अपने कृपा स्वरुप "इष्ट" का दर्शन होता ही रहा.. आइये जन्म से ही शुरू करें अपने ऊपर हुई "उनकी" कृपा की गणना अपने ही शब्दों में - -------

"लाखों योनि घुमा कर प्रभु ने दिया हमें यह मानव चोला .
बुद्धि विवेक ज्ञान भक्ति दे दरवाज़ा मुक्ति का खोला .

ऐसे कुल में जन्म दिया जिस पर प्रभु तेरी कृपा बड़ी है .
"महावीर" रक्षक हैं, जिसके आगन उनकी ध्वजा गड़ी है .

प्रातः सायं नित्य प्रति प्रभु होती जहां तुम्हारी पूजा .
बिना मनाये तुमको हनुमत होता कोई काम न दूजा .."

प्रियजनो. ज़रा सोंचिये उपरोक्त सब क्या मेरे प्रयास से हुआ? एक ही जवाब है "नहीं". प्रज्ञाचक्षु  श्री स्वामी शरणानंद जी के शब्दों में-------- "मैं नहीं ,मेरा नहीं, ये तन किसी का है दिया"

क्रमशः

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

उन्हें" याद अवश्य करें

गतांक के आगे :

प्रियजन:

यूँ तो "सहज आनंद निधान-परमपिता परमात्मा, सच्चे ह्रदय से की गयी एक ही प्रार्थना से द्रवित हो जाते हैं पर आप दिन में ,जितनी बार आपको सुविधा हो, उन्हें याद करिये और अपनी निम्नांकित अर्जी अपने इष्ट को सुनाते रहिये. वो आपकी प्रत्येक प्रार्थना अभिषेक की भांति स्वीकारेंगे और आपको अधिक से अधिक कृपा प्राप्त होगी, सफलता मिलेगी एवं आप का मन सदा आनंदित रहेगा.

कृपया कोशिश कर के देखें . आप अपने नित्य प्रति की आराधना/पूजा/अर्चना अवश्य करते रहें, केवल प्रात उठते ही करने वाली यह प्रार्थना न भूलें :

"धन्यवाद तुझको भला कैसे दूँ भगवान्
तूने ही सब कुछ दिया यह काया यह प्रान 
प्रति पल रक्षा कर रहा देकर जीवन दान
क्षमा करो अपराध सब मैं बालक नादान"

नोट : अपनी रूचि अनुसार शब्दों में हेर फेर कर लें . पर "उन्हें" याद अवश्य करें. वह कृपा करेंगे ही ..........

क्रमश:

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

प्रतिदिन प्रातः धन्यवाद दें

गतांक के आगे :

प्रातः उठते उठते ही, अविलम्ब, केवल एक मिनिट, मन ही मन अपने इष्ट का सिमरन करें और उनकी कृपा से प्राप्त सब भौतिक व दैविक उपलब्धियों के लिए उनके प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करें भावाद्र वाणी में कहें -

"धन्यवाद तुझ को भला कैसे दूँ भगवान ,
तूने ही सब कुछ दिया यह काया यह प्रान,
प्रति पल रक्षा कर रहा देकर जीवन दान,
क्षमा करो अपराध सब मैं मूरख नादान,
मुझपर कृपा करो भगवान"

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कैसे दें धन्यवाद

गतांक से आगे :

मानव जन्म देकर "प्रभु" ने जो महती कृपा हम पर की है,  उनकी एक मात्र उस कृपा का मोल चूका पाना हमारे लिए असंभव है .पर इतना ही नहीं ,प्यारे प्रभु तो आजीवन हम पर अपनी कृपा वृष्टि करते रहते हैं और जैसा मैंने अन्यत्र कहा है की हम भूले से भी उनके इस अनुग्रह के लिए अपना आभार नही जताते और न किसी प्रकार उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ही व्यक्त करते हैं.

प्रियजन:  इधर हम इतने एहसानफरामोश हैं, Thankless. हैं.  उधर "उनकी " उदारता देखिये की वह फिर भी हमें अपनी कृपामृत वर्षा से वंचित नहीं रखते. . .

प्रश्न उठता है की कैसे हम प्रियतम प्रभु की दयालुता /कृपालुता के लिए उन्हें धन्यवाद दे , कैसे उनके प्रति अपना आभार व कृतज्ञता व्यक्त करे ? हमारी यह उलझन भी उनकी कृपा से ही सुलझेगी क्यों न हम आँख मूंद कर केवल एक मिनिट के लिए ही मन ही मन उन्हें धन्यवाद दे और देखें आगे क्या होता है .......... .

क्रमशः

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

मेरे दो निहित स्वार्थ

गतांक से आगे :

जन्म से लेकर आज तक हम केवल उस प्रभु की कृपा के सहारे ही जी रहे हैं और उस पल तक जीते रहेंगे जिस पल तक वह पालनहार हमें जीवित रखना चाहता है. परमात्मा द्वारा निश्चित पल के बाद हम एक सांस भी नहीं ले पाएंगे , प्राण पखेरू अविलम्ब नीड़ छोड़ उड़ जायेगा, सब हाथ मलते रह जायेंगे.

अपना यह जन्म मरण का चक्र चलता ही रहेगा. पिछले जन्मों के प्रारब्धों का बोझ ढोते ढोते हम थक गए हैं. हमें इससे छुटकारा पाना है . इसके लिए विशेष प्रयास करने हैं. ये प्रयास कैसे होंगे आधिकारिक तौर पर मैं (-आप जेसा ही एक साधारण मानव ) कुछ भी कह पाने की क्षमता नहीं रखता. इस समस्त जीवन में बचपन से आज ८१ वर्षा की अवस्था तक जो कुछ भी गुरुजनों से सुना है, सीखा है उसमे से जितना कुछ अभी तक याद है वह सब का सब आप की सेवा में पेश करना चाहता हूँ .

इसमें मेरे दो निहित स्वार्थ हैं..
  • पहला ये कि आप से बात करने में मैं असंख्य बार अपने प्यारे प्रभु को याद करूँगा और" हमारी याद "उनकी दया" में रूपांतरित हो मुझे प्राप्त होगी.
  • मेरा दूसरा स्वार्थ है कि इसे पढने वाले जब पढ़ते पढ़ते "अपने प्रभु" को याद करेंगे उनका भी कल्याण होगा ही होगा .

क्रमशः .

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

JAI JAI JAI KAPI SUR 180

सब हनुमत कृपा से ही क्योँ?
निज अनुभव

मैं अनमना ,हाथ में वह यंत्र थामे धीरे धीरे गन्तव्य की ओर बढ़ रहा था! पर मेरे मन में मेरी पारिवारिक मान्यताओं ,जन्मजात आस्थाओं और सांसारिक कर्तव्यों में भयंकर युद्ध चल रहा था ! महापुरषों का वह कथन याद कर के क़ि"भावना से कर्तव्य ऊंचा है" मैंने वह यंत्र उठा लिया था ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में योगेश्वर श्री कृष्ण का आदेश मान कर अर्जुन ने गांडीव उठाया था ! पर मेरी स्थिति वैसी  नहीं थी ! भाई  मैं न तो अर्जुन सा शिष्य था और न मेरे सन्मुख योगेश्वर श्रीकृष्ण सा सद्गुरु ही था !

आसमान से उतरे उस नन्हे फरिश्ते का मुझसे बार बार यह इसरार करना क़ि मैं उसे वह मशीन दे कर ,वह कार्य करवालूँ जिसे करने से मैं झिझक रहा हूं , मुझे अच्छा तो लग रहा था पर ऐसा करना नियम के विरुद्ध होता ! दूसरी ओर उस बच्चे की आँखों से झांकती उसके आत्म विश्वास की प्रचंड  ज्योति और उसके शारीरिक हाव भाव मे झलकती विलक्ष्ण इच्छा शक्ति ने मुझे  भरोसा दिला दिया क़ि शरणागत वत्सल मेरे प्रियतम प्रभु ने उस विषम परिस्थिति में मेरी रक्षा करने के लिए ही इस देवदूत को भेजा है !
 
अंततोगत्वा भावनाओ ने कर्तव्य बोध को पछाड़ दिया ! मैंने वहीं माँइक मंगवाकर एलान किया क़ि " अत्यंत गौरव की बात है क़ि इस प्रगतिशील देश का यह नन्हा नागरिक यह आधुनिक मशीन चलाने को प्रस्तुत है !हमे इसे चांस देना चाहिए" मैंने एलान समाप्त भी  नही किया था क़ि उसने मेरे हाथ से माइक लेकर उसपर अपना पूरा परिचय बताया और प्रार्थना की क़ि उसे वह मशीन चलाने दी जाय !

क्र्मश:
निवेदक:- वह.एन. श्रीवास्तव "भोला":













. कौन हमारी रक्षा कर रहा है? भयंकर जानलेवा महामारिओं तथा आकस्मिक विपदाओं से कौन हमें बचा रहा है ?
कौन हमारे अंग संग अभेद कवच बना कुसमय के घातक प्रहारं से हमारी रक्षा किये जा रहा है?. कौन इतनी कृपा कर रहा है हम पर?

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

सिमरन से उपासना

गतांक के आगे

हमारा मानव-जन्म हमारी इच्छा से नहीं हुआ ,"उनकी "कृपा से हुआ है . यह हम सब पर प्रभु की पहली अहैतुकी कृपा है. अब ये प्रश्न उठते हैं कि हमारा जन्म कहाँ हुआ?, कैसे परिवार में हुआ? संत-असंत, धनाढ्य -निर्धन, विद्वान-निरक्षर ? क्या ये सब हमने निश्चित किया ? नहीं, ये सब भी "उन्ही"की कृपा से हुआ.

अब ज़रा सोंचें क्या कभी हमने "प्रभु"को उनकी इन महती कृपा के लिए धन्यवाद दिया?

नहीं, हम तो इन बातोको कभी याद भी नहीं करते.

मेरा दृढ विशवास है की यदि हम दिवस में एक बार भी प्रभु की अनंत कृपाओं में से एक दो को ही याद कर लें ओर उनके लिए उन्हें हार्दिक धन्यवाद दें तो केवल "सिमरन" मात्र से ही हमारी उस दिन की उपासना संपन्न हो जायेगी. हमें इस कर्म का यथोचित फल प्रभु यथासमय देगा ही.

क्रमशः

रविवार, 11 अप्रैल 2010

अपनी बातें पहले

गतांक से आगे:


मेरे पास प्रियजनों के अनुरोध आ रहे हैं कि दूसरों के दृष्टांत जानने से पहले मैं पहले अपने जीवन में घटी अथवा अपने पूर्वजों को प्राप्त हुई कृपा-उपलब्धियों का उल्लेख करूँ. जानता हूँ कि ऎसी अनुभूतियों को जग जाहिर करना उचित नही है. क्यों कि नाना प्रकार के आक्षेपों का कारण बन सकती हैं ये बातें .

लेकिन मुझे आज अपने इस मानव जीवन के अंतिम पड़ाव में , ८१ वर्षा की प्रौढ़ अवस्था में, अब भय से अधिक इसकी उत्सुकता है कि मैं ये सारी बातें अपने सभी प्रियजनो से शेअर करूँ- जिससे लाभान्वित हो मेरे सभी स्वजन उस करुना सागर -कृपानिधान के कृपा पात्र बन सकें.

यूँ तो संपूर्ण मानवता प्रभु की कृपा का अनुभव अपने जन्म से मृत्यु तक प्रति पल ही करती रहती है लेकिन बिरले ही यह स्वीकार करते हैं. प्रभु की पहली कृपा तो यह ही है की हमें नर तन मिला है, हमें कीड़े मकोड़ों ,पशुओं पंछियों अथवा वनस्पतियों की योनि नहीं प्राप्त हुई. कितनी कृपा है उनकी. कोटिश धन्यवाद प्रभु तेरा.

मानस में तुलसी ने कहा है :-

"कबहुक करि करुना नर देही देत ईश बिनु हेत सनेही,
बड़े भाग मानव तन पावा सुर दुर्लभ सब ग्रंथिहि गावा"


क्रमशः

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

परमात्मा की कृपा के दृष्टान्त

जब कठिन परिस्तिथियों में हमारे घनिष्ट साथी भी हमारा हाथ छोड़ कर हमें असहाय कर देते हैं परमात्मा दोनों बांह पसारे हमारी सहायार्थ दौड़ पड़ता है .कभी कभी तो हमारे पुकारने के पहले ही"प्रभु" हमारा हाथ झपट कर पकड़ लेता है .इस प्रकार 'सर्व समर्थ-सर्व शक्तिमान "परमेश्वर स्वयं उंगली थाम कर हमारा मार्ग दर्शन करता है और हमें. हमारे लक्ष्य तक पहुचा देता है.

हमारी हर उपलब्धि के पीछे "प्रभु" की अहैतुकी कृपा का अदृश्य हाथ होता ही होता है. हमारा सारा जीवन,इसी प्रकार की प्रभुकृपा- जानित चमत्कारिक सफलताओं से भरपूर है. पर यदि हम कभी उन उपलब्धियों को याद करने का प्रयास करते हैं तो उनमे से एक भी ऎसी नहीं लगती जो मेरे निजी प्रयास के कारण न प्राप्त हुई हो. हर सफलता का श्रेय हम अपने आप को ही देते हैं.हम उन अदृश्य हाथों को भूल जाते हैं जिनकी सहायता से हमें वो सफलता मिली.

दुख तो इसका है की हम अपनी उपलब्धियों के नशे में, "प्रभु" के उन वरद हस्तों का सहयोग बिलकुल ही भूल जाते हैं जिनके सहारे हमें सफलताएँ मिलीं हैं. हमें याद रहती है केवल अपनी असफलताओं की.जो हमें आजीवन रुलाती रहती हैं. और ऐसे में हम अपनी कार्य शैली में सुधार लाने की जगह केवल "प्रभु" को कोसने में जुट जाते हैं तुलसी के शब्दों में :"कालहि कर्महि ईश्वरहि मिथ्या दोष लगाहिं".

कितने नाशुक्रे हैं हम "इंसान " .हम उस प्यारे प्रभु को जिनकी कृपा से हम न केवल यह जीवन जी रहे हैं वरन जीवन में नाना प्रकार की सफलताएं पा रहे हैं , "उनकी" कृपाओं के लिए धन्यवाद देने के बजाय "उन्हें" अपनी असफलताओं के लिए दोषी ठहराते रहते हैं.

हम साधारण मानव,प्यारे प्रभु को, उनकी कृपा से प्राप्त अपनी "जीत" के लिए धन्यवाद तो नही देते पर अपनी "हार "के लिए उन पर दोषारोपण करना नही भूलते .अवसर मिलते ही हम उन पर आरोपों की बोछार करने से नहीं चूकते. कितने दुःख की बात है .

"लाखों योनि भटक कर हमने यह मानव तन पाया ,
यह दुर्लभ जीवन भी हमने यूँ ही व्यर्थ गंवाया .

कभी न आया संत शरण में कभी न हरिगुन गया.
जीत गया तो ढोल बजाया,हारा तो कुम्हलाया,

फिर कैसे पाता ज्ञान की करता है केवल भगवान
किया न हरि गुण गान
वो कभी न पाया जन कि वो है कठपुतली नादान
डोर जिसकी थामे भगवान."

(क्रमशः)

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

राम कृपा के दृष्टान्त याद करें

परम प्रिय स्वजन,
जय जय श्री राम,

ज़रा सोंचिये , हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि परमपिता परमात्मा ने हमें यह सुर दुर्लभ-मानव शारीर दिया है .इतना ही नहीं, हमारे जन्म से आज तक वह करुनानिधान लगातार हमारे ऊपर अपनी अहैतुकी कृपा वृष्टि किये जा रहे हैं . वह पग पग पर हमारा मार्ग दर्शन कर रहे हैं, हमे सद्बुद्धि ,विवेक और बल प्रदान क्रर रहे हैं जिसके द्वारा हम अपना यह जग-जीवन सफल कर रहे हैं. इसके अतरिक्त वह अपने वरद हस्त की क्षत्र -छाया में हमारे जीवन में समय समय पर आने वाली आपदाओं विपदाओं की अग्नि वर्षा से उसी प्रकार हमारी रक्षा कर रहे हैं जैसे अबोध बालक अपनी माँ की आँचल तले सुरक्षित रहते हैं ,

प्रियजनों, आइये हम अपने अतीत के पन्ने पलट कर देखे कि परमकृपालु परमात्मा ने (जिन्हें अपनी अपनी रूचि एवं श्रद्धानुसार हम श्री राम, श्री कृष्ण, शिव-शंकर-महादेव, वाहेगुरु, अथवा किसी अन्य नाम से पुकारते हैं), प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में , हमारे ऊपर कैसी कैसी कृपा की है.- कहाँ उन्होंने अंगुली पकड़ कर हमें सही मार्ग पर चलाया, हमें सफलता दिलायी और कहाँ उन्होने भयंकर आपदाओं से हमारी रक्षा की.

सांसारिक काम काज से संपूर्ण अवकाश पा लेने के बाद प्रभु की कृपा से अब हम दोनों को "संत वाणी श्रवण" का अखंड आनंद मिल रहा है. हाल में एक संत से सुना " दिवस में एक बार भी यदि हम प्यारे प्रभु से प्राप्त असंख्य अनुकम्पाओं में से केवल एक को भी याद करलें और उसके लिए प्रभु के प्रति अपना अनुग्रह व्यक्त करें और उन्हें भाव पूर्ण धन्यवाद दे तो समझ ले की हमारी उस दिन की पूजा पूरी हो गयी"..


बस एक बार प्यारे कर दिल से शुक्रिया ,
तुझको दुआ मिलेगी पांचो नमाज़ की .
क्यूँ कर रहा है फिक्र तू, कल औरआज की.

इस पत्र द्वारा हमारा आप से अनुरोध हैं कि हो सके तो दिन में केवल एक बार कुछ पलों के लिए आप अपने जीवन में घटी कोई ऎसी घटना याद करें जिसमे आपको आपके ऊपर हुई प्रभु की अहैतुकी कृपा के प्रत्यक्ष दर्शन हुए हैं . इस बहाने आप, अपने प्रियतम इष्ट को , उनकी करुणा के लिए धन्यवाद देने और अनुग्रह पूर्वक याद करने का एक अवसर अनायास ही पा जायेंगे और आप तो जानते ही हैं , आपकी "याद" पलट कर उनकी "दया" बन जायेगी और आपके जीवन में सतत आनंद वर्षा करती रहेगी.

हम यदा कदा अपने निजी अनुभवों से आपको अवगत कराते रहेंगे, आप भी यदि अपने अनुभव हमारे साथ बाँटे तो हम लाभान्वित होंगे, हमारा प्रभु -प्रेम सुद्रढ़ होगा. अंततोगत्वा हमारा भी कल्याण होगा.. .

स्नेहिल शुभकामनाओं सहित ,
भोला - कृष्णा

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

भजन: अंजनि सुत हे पवन दुलारे

अंजनि सुत हे पवन दुलारे
हनुमत लाल राम के प्यारे

अतुलित बल पूरित तव गाता
असरन सरन जगत विख्याता
हम बालक हैं सरन तुम्हारे
दया करा हे पवन दुलारे
अन्जनि सुत हे पवन दुलारे

सकंट मोचन हे दुख भजंन
धीर वीर गम्भीर निरन्जन
हरहु कृपा करि कष्ट हमारे
दया करा हे पवन दुलारे
अन्जनि सुत हे पवन दुलारे

राम दूत सेवक अनुगामी
विद्या बुद्धि शक्ति के दानी
शुद्ध करो सब कर्म हमारे
दया करा हे पवन दुलारे

अन्जनि सुत हे पवन दुलारे
तुम बिन को सागर तर पाता
लंका जारि सिया सुधि लाता
राम लखन का को धीर बंधाता
कैसे होते सब सुखियारे
दया करा हे पवन दुलारे

अन्जनि सुत हे पवन दुलारे
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बड़े भैया द्वारा सूटर गंज कानपूर के आगंन में लगाई श्री हनुमान जी की ध्वजा से प्रेरणा मिली
आरै यह हनुमान वन्दना १९८३ में बनी

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

महावीर बिनवौं हनुमाना

युगों युगों से असंख्य विश्वासी आस्तिकों को अपनी कृपा दृष्टि से अनुग्रहित कर उन्हें सभी दैहिक, दैविक भौतिक तापों से मुक्ति प्रदान करवाने वाले संकट मोचन, दुःख भंजन , "श्री हनुमान जी" को गोस्वामी तुलसीदास ने "राम चरित मानस " के बालकाण्ड के वन्दना प्रकरण में "महावीर" नाम से संबोधित किया हैI उन्होंने श्री हनुमान जी की वन्दना में कहा है की मैं उस महावीर हनुमान की वंदना करता हूँ जिस की यशगाथा का गायन स्वयं मर्यादा- पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र जी ने अनेकों बार किया है - "राम जासु जस आप बखाना "

सुंदर काण्ड के आरंभिक श्लोकों में तुलसी ने स्पष्ट शब्दों में हनुमान जी के , उन गुणों का उल्लेख किया है जिन के कारण वह एक साधारण कपि से इतने पूजनीय हो गये.

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजबनकृशानुम ग्यानिनामअग्रगण्यम
सकल गुण निधानं वानारानामधीशं
रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि

तुलसी ने कहा "अतुलित बल के धाम, स्वर्ण के समान कान्तियुक्त कायावाले , दैत्यों के संहारक (दैत्य वन के लिए दावानल के समान विध्वंसक ), ज्ञानियों में सर्वोपरि , सभी श्रेठ गुणों से युक्त समस्त वानर समुदाय के अधीक्षक और श्री रघुनाथ जी के अतिशय प्रिय भक्त महावीर हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ".

अन्यत्र भी उनके स्थूल रूप की व्याख्या करते हुए तुलसी ने कहा कि हनुमान जी देखने में कपि - एक अति चंचल पशु हैं, उछलते कूदते वृक्षों की एक शाखा से दूसरी शाखा पर सुगमता से जा सकते है . मानस के उत्तर -काण्ड में हनुमानजी ने स्वयं ही अपना परिचय देते हुए भरत जी से कहा है:

"मारुत सुत मै कपि हनुमाना
नाम मोर सुनु कृपा निधाना "

सराहनीय है “महावीर विक्रमबजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी”, कपि-तन-धारी हनुमान जी का यह विनय और उनकी यह नम्रता . उनके अनेक सद्गुणों में यह एक विशेष गुण है जिसने उन्हें देवतुल्य बना दिया. हनुमान जी के सभी गुण अनुकरणीय हैं . आज का मानव जिसका जीवन मूल्य कहीं कहीं पशुता के स्तर से भी बहुत नीचे गिर चुका है, अपना स्वरुप सुधारने के लिए हनुमान जी के इन सद्गुणों को यदि अपनी जीवन शैली में उतार सके तो मानवता का कल्याण हो जाए. .

रविवार, 4 अप्रैल 2010

हनुमान जी के अनुकरणीय सद्गुण

हनुमान जी "अहंकार" मुक्त हैं . कर्तापन का "अभिमान" उन्हें कभी हुआ ही नहीं . उन्हें जीवन में जो कुछ कार्य करने को मिले उन्होने सभी कार्य "राम काज" समझ कर किये ." कर्ता " वह केवल अपने स्वामी "श्री राम " को ही मानते थे और स्वयं को "राम काज करिबे को आतुर" एक आज्ञाकारी सेवक! अपने स्वामी की क्षमताओं में उन्हें पूरा भरोसा था .

रीछराज जामवंत के प्रेरणाप्रद प्रोत्साहन से की "हे बलवान हनुमान , तुम क्यों चुप साधे बैठे हो ? तुम्हारा बल-"पवन" के समान है ! "राम काजि लग तव अवतारा " सुनते ही वह पर्वताकार हो गए. अपने से जेष्ठ- वयस्क गुरु जनों की मंत्रणा "बिनहि बिचारि "स्वीकार कर लेना भी भारतीय संस्कृति की एक अनुकर्णीय परम्परा है.

और वह स्वयं अडिग "आत्मविश्वास" और "सकारात्मक सोच" के धनी थे. हनुमान ने सीताजी की खोज प्रारंभ करने से पहले भरपूर आत्मविश्वास से सिंहनाद किया "मै इस खारे सागर को खेल खेल में ही लांघ सकता हूँ, पर गुरुजन उचित सलाह दें की मैं क्या करूँ". विभिन्न परिस्थियों में उनके स्वभाव की शालीनता और सौम्यता सराहनीय है .

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में हनुमान जी को "बुद्धि विवेक विज्ञानं निधाना" की उपाधि दी है और "हनुमान चालीसा" के प्रारंभिक दोहे में "पवन कुमार "का सुमिरन करते हुए उनसे प्रार्थना की है : "बल बुधि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेश विकार " .

अवश्य ही श्री हनुमान जी के पास "बल,बुद्धि,विद्या, विवेक और विज्ञान" तथा "रिद्धि सिद्धि " का अनंत भण्डार हैं तभी तो युगों युगों से संतजन उनसे इन सद्गुणों की मांग करते जा रहे हैं और "वह" उनकी यह मांग अविलम्ब पूरी किये जा रहे हैं. प्रत्येक हनुमान भक्त को जीवन में कभी न कभी हनुमान जी की ऐसी अहेतुकी कृपा का अनुभव होता ही होता है. इसमें कोई संदेह नहीं .

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

भजन - लंक में हनुमत त्राहि मचायी

लंक में हनुमत त्राहि मचायी

पहले तो बाटिका उजारी
मारे रक्षक भारी भारी
जाय चढ़ा फिर कनक अटारी
और फूंक दी लंका सारी
सब जन चले परायी ।
लंक में हनुमत त्राहि मचायी

राम दूत बानर ने भैया, लंका दयी जरायी
लंक में हनुमत त्राहि मचायी


हाथ जोड़ कर कहत विभीषण
भाई ठान न तपसिन सों रन
सीता दे लौटायी ।
लंक में हनुमत त्राहि मचायी

कहत मंदोदरि सुनु प्रिय स्वामी
शंकर भगत परम विग्यानी
मति तोरी भरमायी ।
लंक में हनुमत त्राहि मचायी

अन्त काल जब आवत नेरे
मति भ्रम जात कुसंकट प्रेरे
सोइ गति रावन पायी ।
लंक में हनुमत त्राहि मचायी
----------
अपने पहले डबल एल पी अल्बम श्री राम गीत गुन्जन के लिये १९७३ में लिखा .

यह भजन 'अंतर्ध्वनि' पुस्तिका में हनुमान भजनों के अंतर्गत संकलित है .

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

ईश्वर की कृपा

इस सृष्टि का सिरजनहार,पालनहार और एक मात्र आश्रय - "परमपिता परमात्मा" जो कहीं राम कहीं रहीम , कहीं कृष्ण कहीं करीम, कहीं अल्लाह कहीं ईश्वर, कहीं होली फादर कहीं वाहे गुरु, के नाम से पुकारा जाता है, समस्त जीव जगत पर, बिना किसी भेद भाव के, अपनी अहेतुकी " कृपा - वर्षा" अनवरत कर रहा है. खेद है की हम मंदबुद्धि, अज्ञानी मानव अहंकार वश इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते.

प्रियजनों "हमारे जीवन में जो भी हो रहा है वह सब केवल उस "पालनहार" की कृपा, करुणा और प्रेम के कारण ही हो रहा है". इस प्रामाणिक सत्य को झुठला कर हम अहंकारवश स्वयं को ही अपनी सब सफलताओं का श्रेय देते रहते है, दुनिया भर में अपनी उपलब्धियों का ढोल पीटते फिरते हैं. और अपनी सब असफलाताओं का दोष भागवान के सिर मढ़ देते हैं. कैसी विडम्बना है यह ?

विगत हज़ारों वर्षों में भारत भूमि पर जन्मे महऋषि वेदव्यास से लेकर आज तक के विश्व के असंख्य मनीषियों ने हमें यही बताया है .

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

Praise Ram to Please Hanuman

जय जय राम !

That day we recited "श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन" followed by श्री हनुमान चालीसा (with हमारे रामजी से) and finally recited the closing couplets of मानस "पाई न केहि गति पतित पवन राम भज सुनु शठ मना" which we always recite as a suffix to चालीसा .

I realized the importance of पाई न केहि गति in 1947 during my B H U days when one TUESDAY at संकट मोचन मंदिर there, it dawned to me that to please HIM and get परम विश्राम one has to sing in praise of राम जी , the इष्ट of हनुमान जी . Only that satisfies श्री हनुमान जी . I adopted the practice and enjoyed विश्राम / आनंद as much as I deserved there after.

I have a big list of occasions when महावीर जी rescued me from calamities. Shall talk about them later.

GOD Bless you!